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प्रेरणा

छुआछूत, गरीबी, बाल-विवाह, घरेलु हिंसा और शोषण का शिकार एक महिला की प्रेरक कहानी

Geeta Parshuram
23rd Jan 2015
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हालात इतने बुरे हुए थे कि ख़ुदकुशी की कोशिश भी कर डाली...

गिरकर उठने के बाद फिर नहीं रुका कामयाबियों का सफर...

कामयाबियों और समाज-सेवा के लिए मिला "पद्मश्री" सम्मान...

दलित महिला कल्पना सरोज की कहानी है अकल्पनीय...


कल्पना सरोज की गिनती भारत के सफल उद्यमियों और उद्योगपतियों में होती है । वे कई कम्पनियाँ चलाती हैं और करोड़ों रुपये की धन-संपत्ति की मालिक हैं। समाज-सेवा की वजह से उनकी शोहरत को चार-चाँद लगे हैं।

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लेकिन, कल्पना सरोज की कहानी में जो घटनाएं हुई हैं वो अकल्पनीय हैं। कहानी में फर्श से अर्श का सफर है। गोबर के उपले बेचने वाली एक दलित लड़की के आगे चलकर मशहूर कारोबारी और करोड़पति बनने की अनोखी दास्तान भी है।

छुआछूत, गरीबी, बाल-विवाह, ससुराल वालों के हाथों शोषण, अपमान, निंदा - ये सब कुछ अनुभव किया है कल्पना ने। कल्पना ने एक बार तो परिस्थितियों से तंग आकर खुदखुशी तक की कोशिश की।

कई लोगों की राय में कल्पना सरोज की कहानी फ़िल्मी कहानी जैसी लगती है। लेकिन इस बात में किसी को भी दो राय नहीं कि दुःख-दर्द और पीड़ा से शुरू होकर बड़ी कामयाबी और ऊँचे मुकाम हासिल करने की ये कहानी लोगों को प्रेरणा देने वाली है।

कल्पना सरोज का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के रोपरखेड़ा गाँव में रहने वाले एक गरीब दलित परिवार में हुआ। कल्पना के जन्म के समय दलितों की हालत ठीक नहीं थी। दलितों के साथ गाँवों में भेद-भाव किया जाता था और अक्सर वो शोषण का शिकार होते थे। छुआछूत भी थी।

कल्पना के पिता पुलिस विभाग में कांस्टेबल थे। वो अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे और चाहते थे कि उनकी बेटी खूब पढ़े और लिखे। पिता ने कल्पना का दाखिला एक स्कूल में करवा दिया। दलित होने की वजह से कल्पना के साथ अलग-सा व्यवहार किया जाता। उसे उसके कई दोस्तों के घर में आने नहीं दिया जाता। स्कूल के कई कार्यक्रमों में भी उसे शामिल नहीं किया जाता। कुछ बच्चे तो कल्पना को छूने भी कतराते थे। इस भेद-भाव पर कल्पना को बहुत गुस्सा आता, पर वो कुछ नहीं कर पाती। अपमान के घूँट पीकर उसे चुप ही रहना पड़ता। बचपन में परिवार की मदद करने और रुपये जुटाने के मकसद से कल्पना ने गोबर के उपले भी बेचे।

लेकिन , दूसरे परिवारालों और रिश्तेदारों के दबाव में आकर कल्पना की शादी कर दी गयी। १२ साल की उम्र में ही कल्पना का विवाह कर दिया गया। उसकी शादी उससे १० साल बड़े एक आदमी से की गयी थी। शादी की वजह से कल्पना को स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

कल्पना का पति उसे अपने साथ मुंबई ले गया। मुंबई पहुँचने के बाद ही कल्पना ने ये जाना कि उसका पति झुग्गी बस्ती में रहता है। समस्या उस समय और बड़ी हो गयी जब जेठ और जेठानी ने उसके साथ बदसलूकी करना शुरू किया। छोटी-छोटी बातों पर जेठ-जेठानी कल्पना को मारने-पीटने लगे।

अपशब्द कहना तो आम बात हो गयी थी। जेठ-जेठानी का सलूक इतना बुरा होता कि वो कल्पना ने बाल पकड़कर नोचते और उसे बुरी तरह मारपीट कर ज़ख़्मी कर देते। कल्पना को खाने के लिए भी समय पर भोजन नहीं दिया जाता। उसे परेशान करने लिए भूखा रखा जाता। कल्पना के लिए वो दिन पीड़ा और दुःख से भरे थे।

कल्पना के पिता जब उससे मिलने मुंबई गए तो उसकी हालत देखकर उन्हें एक बहुत बड़ा झटका लगा। उन्हें भी बहुत दुःख और पीड़ा हुई। अपनी प्यारी बेटी को फटे -पुराने कपड़ों और उसके शरीर पर शोषण के निशान देखकर वो सहम गये। उन्होंने फैसला कर लिया वो एक पल भी अपनी बेटी को मुंबई में नहीं रखेंगे। वो कल्पना को अपने साथ वापस गाँव लेकर चले गए।

कल्पना ने सिलाई , बुनाई जैसे काम कर अपना समय काटना शुरू किया। उसने स्कूल में फिर से दाखिला लिया। उसने पुलिस विभाग में नौकरी पाने की भी कोशिश की परन्तु कामयाब नहीं हुई। कुछ दिनों बाद गाँव में भी कल्पना के लिए हालात बिगड़ने लगे । गाँव की कई लडकियां और महिलाएं कल्पना पर ताने कसती और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करतीं। इन सब से तंग आकार कल्पना के एक दिन आत्म-हत्या करने का फैसला किया। उसने कीटनाशक पी लिया। इसके बाद वो ज़मीन पर गिर गयी और उसे मुँह से झाग निकलने लगा। तभी कल्पना की एक रिस्तेदार ने उसे इस हालत में देख लिया और दूसरों को सूचना दी। कल्पना को अस्पातल ले जाया गया जहाँ उसकी जान बचा ली गयी।

अस्पताल से लौटने के बाद कल्पना ने एक संकल्प लिया। उसने फैसला किया कि वो अपनी ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जिएगी और दुनिया में कुछ बड़ा हासिल करके ही रहेगी। अपने फैसले को साकार करने के लिए उसने गाँव छोड़ने और फिर से "सपनों की नगरी" मुंबई जाने का फैसला किया। वो अब नहीं चाहती थी कि अपने माँ-बाप पर बोझ बनी रही। वो चाहती थी कि स्वंतत्र रूप के काम करे, अपने खर्चों के लिए खुद कमाए।

कल्पना ने इस बार मुंबई आने के बाद अपने एक भरोसेमंद रिस्तेदार के यहाँ रहना शुरू किया। उसने सिलाई मशीन को कमाई का जरिया बनाया। कुछ दिनों तक एक होश़री शॉप में काम किया। इस स्टोर में काम के लिए कल्पना को हर दिर सिर्फ दो रुपये दिए जाते।

काम ऐसे ही चल रहा था कि कल्पना की एक बहन बीमार पड़ गयी। कल्पना की कमाई के रुपयों से भी उसकी बहन की जान नहीं बच पाई। इस बार उसने फिर एक बड़ा फैसला लिया। उसने ठान ली कि पैसे कमाने के साथ-साथ उसे कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे ख़ुशी और संतुष्टि मिले।

उसने खुद कारोबार करने का मन बना लिया और कारोबार के साधन तलाशने शुरू किये। उसने फर्नीचर का कारोबार शुरू किया। इस कारोबार के दौरान उसकी मुलाक़ात एक ऐसे फर्नीचर कारोबारी से हुई जिसने उसका मन जीत लिया। कल्पना ने इस कारोबारी से शादी की। दोनों को दो बच्चे भी हुए। लेकिन, ज़िंदगी में एक बार फिर कल्पना को बड़ा झटका लगा। १९८९ में उसके कारोबारी पति की मौत हो गयी।

कल्पना को अपने पति से विरासत में अलमारी बनाने वाला एक कारखाना मिला था । लेकिन, ये कारखाना घाटे में चल रहा था। अपने बच्चों की खुशियों, उनकी पढ़ाई-लिखाई और दूसरी ज़रूरतों के लिए कल्पना ने बीमारू कारखाने को फिर से मुनाफे में लाने के लिए पूरी ताकत लगा थी।

कल्पना ने १९९५ में ज़मीन-ज़ायज़ात का भी कारोबार शुरू किया। १९९७ में एक वित्तीय संस्थान की मदद से कल्पना ने ४ करोड़ ररुपये की लागत से एक कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया। कुछ दिनों बाद इस कॉम्प्लेक्स को बेचकर मुनाफा कमाया।

धीरे-धीरे कल्पना ने कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री और रियल एस्टेट में भी अपने पैर जमा लिए।

मुनाफे की एक बड़ी रकम उसने गन्ना उद्योग में भी निवेश की। उसने अहमदनगर के साईं कृपा शक्कर कारखाने के शेयर खरीदे जिससे वो कम्पनी की डायरेक्टर बन गयी । कल्पना ने जल्द ही एक सफल कारोबारी और उद्यमी के रूप में नाम कमाया और अपनी अलग पहचान बना ली।

और इसी दौरान आया ज़िंदगी और कामयाबी को एक नए मुकाम पर ले जाने का मौका।

२००६ में कल्पना की कंपनी कल्पना सरोज एंड एसोसिएट्स से कमानी ट्यूब्ज़ को टेकओवर कर लेने की पेशकश की गयी। कल्पना सरोज की शोहरत कुछ इस तरह की हो चुकी थी कि कमानी ट्यूब्ज़ के मालिकों को लगा कि घाटे में चल रही इस बीमारू कंपनी को कल्पना ही ले सकती हैं।

कमानी ट्यूब्ज़ की शुरुआत प्रसिद्ध उद्योगपति रामजी कमानी ने की थी। रामजी कमानी भारत के पहले प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बहुत ही करीबी थे। कमानी परिवार में उभरे मतभेदों का कंपनी के कामकाज और कारोबार पर बुरा असर पड़ा था। एक समय तो कंपनी बंद होने के कगार पर पहुंच गयी थी। लेकिन, कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मज़दूर यूनियन ने कंपनी चलायी। लेकिन, कंपनी कामयाब नहीं रही। १९९७ तक कंपनी का घाटा बढ़कर १६० करोड़ हो गया था। २००६ में कल्पना सरोज के हाथों कंपनी की जिम्मेदारी आयी तो दिन फिर गए। कल्पना सरोज ने कमानी ट्यूब्ज़ को दोबारा मुनाफे में लाने को एक चुनौती के तौर पर लिया। अपने नए-नए विचारों, प्रयोगों , मजदूरों के मेहनत और मदद से कल्पना ने कमानी ट्यूब्ज़ की काया ही पलट कर रख दी। अब कंपनी मुनाफे में है। कमानी ट्यूब्ज़ को जिस तरह से कल्पना सरोज ने एक बीमारू और घाटे में चल रही कंपनी से मुनाफे वाली कंपनी बनाया , वो आज भारतीय उद्योग जगत में एक मिसाल के तौर पर पेश की जाती है।

धन-दौलत और संपत्ति की मालिक बनने के बाद कल्पना ने समाज-सेवा में भी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। वो महिलाओं, आदिवासियों , दलितों , गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों की मदद के लिए कई तरह के कार्यक्रम आयोजित करती हैं। हज़ारों ज़रूरतमंद बच्चे , महिलाएं उनकी मदद से चलने वाली संस्थाओं से उठा चुके हैं।

कल्पना सरोज आज एक नहीं कई कारोबार कर रही हैं। कई कंपनियों की वो मालिक हैं। करोड़ों की संपत्ति उनके नाम है। वो भारत की सफल उद्यमी, उद्योगपति और कारोबारी हैं। उन्होंने कई पुरस्कार जीते हैं। भारत सरकार ने उन्हें "पद्मश्री" भी नवाज़ा हैं।

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