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चुनौतियों के मुहाने पर केसरिया सरकार

21st Mar 2017
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योगी आदित्यनाथ की प्रचण्ड हिन्दूवादी छवि है लेकिन, बतौर मुख्यमंत्री हर वर्ग की उनसे अपेक्षाएं भी हैं। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा दिया, तो उनके पीछे एक कारवां बनता गया और जनता की वैसी ही उम्मीद अब योगी के साथ भी जगी है।

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प्रचण्ड जनादेश का ध्वजवाहक अपना ध्वज दण्ड योगी आदित्यनाथ के हाथों में थमा कर ये उम्मीद कर रहा है, कि वे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह सुशासन के साथ विकास की राह प्रशस्त करें। 

हिन्दुत्व को विकास का पर्याय बताने वाले योगी आदित्यनाथ पर प्रदेश के विकास का दारोमदार आ गया है। योगी भी जानते हैं, कि मौजूदा कामयाबी कुछ बुनियादी सवालों के समाधानों की तलाश का पहला पड़ाव है, जो समाधान की शक्ल में जबाव चाहता है। जैसे, क्या 'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहां है कम' का नारा स्वयं को चरितार्थ कर पायेगा? क्या राजधानी का हाई सिक्योरिटी ज़ोन, जो अपराधियों का सफारी ज़ोन बन गया है, वह अपराधियों पर लगाम लगाने का मरकज बन पायेगा? क्या वर्तमान प्रचण्ड बहुमत देश से मुस्लिम तुष्टीकरण की सियासत के ताबूत में पहली कील है? 

यूपी में मुस्लिम (100 सीटों में से 75 सीटों (जिसमें बहुचर्चित देवबंद सीट भी है) पर) भाजपा की जीत नये तरीके के वैचारिक समावेश की अपेक्षा भी करता है? क्या सूबे के नये निज़ाम द्वारा यह कर पाना सम्भव हो सकेगा? क्या समाज का अन्नदाता अब आत्महन्ता बनने के लिए विवश नहीं होगा? आखिर कब तक सरकारी सरमायेदारी के शामियाने में किसान की मौत का तमाशा चलेगा? 

नरेंद्र मोदी के मन्सूबों को आयाम देने की आकांक्षा पाले मतदाता अब योगी से आस लगाए हैं, कि किसानों का भला होगा। बाढ़ बचाव और पशुपालन पर भी उनसे अपेक्षा बढ़ी है, क्योंकि इन दोनों मुद्दों पर वह अब तक सड़क से लेकर संसद तक जूझते रहे हैं। याद हो, कि पीएम नरेन्द्र मोदी ने कई जनसभाओं में कहा था कि उ.प्र. में भाजपा की सरकार बनने के बाद कैबिनेट की पहली बैठक में ही छोटे और मंझोले किसानों का कर्ज़ माफ कर दिया जायेगा।

अपने वादे को अक्षरश: अंजाम देकर सरकार के किरदार को नई ऊंचाइयां देने का अवसर है योगी के पास।

2012 से 2017 के दरम्यान यूपी में संम्पन्न हुए ऐतिहासिक दंगा एक्सपर्ट कारनामों के कारण प्रान्त में कौमी एकता बुरी तरह से दरक गई है। सैकड़ों जले-अधजले मकानों के किस्सों और हजारों लोगों के हताहत होने की अन्तहीन दास्तानों ने तात्कालीन सरकार को उसके कारनामों का अंजाम तो दिखा दिया, लेकिन क्या ई हुकूमत दंगों के फोड़े से रिसते मवाद की बजबजाहट से समाज को बीमार होने से बचा पाएगी? क्या सूबे की मुश्तरका तहजीब फिर परवान चढ़ पाएगी?

विडम्बना है, कि रोजगार की तलाश में भटकते नौजवान कदमों को अभी तक अपनी मंजिल का पता नहीं मिल पाया है। सूबे की नौजवानी को क्या नया निजाम उसकी हसरतों का पता दे पाएगी? यही नहीं सवाल यह भी है, कि शिक्षा के प्राथमिक पायदान पर ही बालिकाओं के जीवन में अंधेरा करने के व्यवस्था के कूट चक्र को तोडऩे में क्या नई सरकार कामयाब हो पाएगी? क्या उनके भविष्य के सामने पहाड़ जैसे अंधेरे के लिए कोई उम्मीद की शमां जला पायेगी नयी हुकूमत? 

उत्तर प्रदेश की नई सरकार के सामने प्रदेश में स्वास्थ्य के स्थापित मूल्यों के विपरीत आचरण कर हांफने वाली सरकारी चिकित्सा सेवा को आक्सीजन देने का काम व प्राथमिकता में अंजाम देने की चुनौती होगी। 

अब यह देखना दिलचस्प होगा, कि सामान्य राजनेताओं से इतर एक राजयोगी कैसे इन विकराल चुनौतियों को जीतने में सफल हो पाता है। 

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