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हाइब्रिड बीजों को छोड़कर परंपरागत बीजों से खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं किसान

14th Sep 2017
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आंकड़े बताते हैं कि धडगांव और जौहर जिलों में फसलों की कई नस्लें ऐसी हैं जो कि कीटों के प्रति प्रतिरोधी हैं, ये खराब मिट्टी में भी पैदा हो जाती हैं और बदली हुई जलवायु परिस्थितियों में पनप जाती इनमें पोषकता के कई महत्वपूर्ण तत्व भी विद्यमान होते हैं। 

महाराष्ट्र के किसान (फोटो साभार- विलेज स्क्वायर)

महाराष्ट्र के किसान (फोटो साभार- विलेज स्क्वायर)


महाराष्ट्र में जनजाति समुदाय के लोग चावल की 300 विभिन्न प्रकार की प्रजातियों की खेत करते हैं। इनमें से सबका खाने का उद्देश्य अलग अलग होता है। मसलन कोई प्रजाति सिर्फ पेट भरने के काम आती है तो किसी चावल को औषधीय वजहों से खाया जाता है।

जैविक खेती की बदौलत ही आज ये किसान कीटनाशक और दवाओं के साथ साथ हाइब्रिड बीजों के इस्तेमाल से कोसों दूर हैं। किसानों ने इनपर अपनी निर्भरता खत्म कर दी है।

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कोंभालने गांव की रहने वाली राहीबाई सोमा पोपरे कृषि जैव विविधता, पशु प्रजनन और धान उगाने की नवीनतम तकनीकों के बारे में अच्छे से जानती हैं। ऐसा नहीं है कि उन्होंने कहीं से कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली है, बल्कि यह सब उनके अनुभव पर आधारित है। इसीलिए जब वे अपनी महादेव कोली ट्राइबल लहजे में बात करती हैं तो बड़े-बड़े एक्सपर्ट भी उन्हें बड़ी गंभीरता से लेते हैं। 54 वर्षीय रमा के पास 17 अलग-अलग फसलों की 48 प्रजातियां संरक्षित हैं। इसमें धान, सेम, बाजरा, दाल और तेल के बीज शामिल हैं।

देश के 16 राज्यों में जनजातियों के बीच काम करने वाले पुणे के एक एनजीओ BAIF डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन के संजय पाटिल ने बताया, 'जनजातियों वाले इलाके में लोगों के घर के पीछे एक छोटा सा बगीचा होता है जिसमें स्वदेशी पेड़, पौधे, जड़ी बूटियां और सब्जियां भी उगाई जाती हैं। इस बगीचे से उगने वाली सब्जियों से पूरे परिवार की खाने पीने की जरूरतें पूरी हो जाती हैं। बगीचों में सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ उगाने का सिलसिला पूरे साल भर चलता रहता है।'

महाराष्ट्र में जनजातियां चावल की 300 विभिन्न प्रकार की प्रजातियों की खेत करते हैं। इनमें से सबका खाने का उद्देश्य अलग अलग होता है। मसलन कोई प्रजाति सिर्फ पेट भरने के काम आती है तो किसी चावल को औषधीय वजहों से खाया जाता है। ये प्रजातियां खासतौर पर इसी इलाके में पैदा होती हैं क्योंकि यहां का पर्यावरण इन फसलों के लिए अनुकूल होता है। बाजार में हाइब्रिड प्रजाति के बीज आने के बाद पूरे देश में परंपरागत बीज धीरे-धीरे विलुप्त के कगार पर पहुंच रहे हैं। उसकी भी साफ वजह है क्योंकि परंपरागत बीजों से पैदावार काफी कम होती है और इन में कीट लगने का खतरा भी होता है। इसके बाद किसानों को कीटनाशक और दवाइयों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

लेकिन इन सभी जनजातीय इलाकों के किसानों ने अपने परंपरागत बीजों पर ही भरोसा किया और उसी को उगाया। वह भी पूरे जैविक तरीके से। जैविक खेती की बदौलत ही आज ये किसान कीटनाशक और दवाओं के साथ साथ हाइब्रिड बीजों के इस्तेमाल से कोसों दूर हैं। किसानों ने इनपर अपनी निर्भरता खत्म कर दी है। किसानों को परंपरागत बीजों से खेती करने के लिए राहीबाई ने काफी मदद की। उन्होंने लोबिया के 5,000 बीज संरक्षित किए और 25 गांवों के किसानों को इन्हीं बीजों को बोने को दिया। लगभग 89 एकड़ पर इन परंपरागत लोबिया के बीजों को बोया गया। राहीबाई के बीजों में कोलभात जैसा धान का बीज शामिल है जिससे काफी लंबा चावल पैदा होता है। एक और धान का बीज है 'गोडवाल'- जो कि काफी कम पानी में भी अच्छी पैदावार देता है।

सेम की डाली के साथ राहीबाई (फोटो साभार- विलेज स्क्वायर)

सेम की डाली के साथ राहीबाई (फोटो साभार- विलेज स्क्वायर)


54 वर्षीय राहीबाई रमा के पास 17 अलग-अलग फसलों की 48 प्रजातियां संरक्षित हैं। इसमें धान, सेम, बाजरा, दाल और तेल के बीज शामिल हैं।

राहीबाई ने इन परंपरागत बीजों को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कलसूबाई बियानी संवर्धन समिति का गठन किया। समिति पारंपरिक किस्मों की फसलों के संरक्षण और प्रचार की दिशा में काम करती है। समिति के द्वारा अहमदनगर जिले के विभिन्न हिस्सों में बीज की विविधता और उनके संरक्षण की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए स्वदेशी बीज मेला आयोजित किया जाता है। राहीबाई की तरह ही पास के जवाहर ताल्लुक में सुनील कामड़ी द्वारा बीज संरक्षण के ऐसे ही प्रयास किए जा रहे हैं। बीज संरक्षण किसानों के समूह के सक्रिय सदस्य, कामड़ी, इलाके में फसल की विविधता के संरक्षण में किसानों की सहायता करते हैं और फसलों के लिए बीज चयन में विशेषज्ञ माने जाते हैं।

कामड़ी और पवार को कृषि मंत्रालय द्वारा 2011-12 के लिए जीनोम संरक्षण किसान पुरस्कार भी मिल चुका है। कामड़ी को उनकी धान की प्रजाति अश्विनि के लिए पुरस्कार मिला था। वहीं पवार ने कमल, कृति और साधना जैसी प्रजातियां विकसित कीं जिसके लिए उन्हें पुरस्कार मिला। बीज प्रदर्शनियों और उत्पादकों के साथ व्यक्तिगत बातचीत के माध्यम से, BAIF टीम ने फसल विविधता को प्रभावित करने वाले कारकों के अलावा विभिन्न प्रजातियों के विलुप्त होने, मौजूदा फसल और उनकी विशिष्ट गुणों के कारण होने वाले संभावित कारणों पर डेटा एकत्र किया है। 

आंकड़े बताते हैं कि धडगांव और जौहर जिलों में फसलों की कई नस्लें ऐसी हैं जो कि कीटों के प्रति प्रतिरोधी हैं, ये खराब मिट्टी में भी पैदा हो जाती हैं और बदली हुई जलवायु परिस्थितियों में पनप जाती इनमें पोषकता के कई महत्वपूर्ण तत्व भी विद्यमान होते हैं। वर्तमान में, गढ़चिरौली के 15 गांव, नंदुरबार में 12, पालघर और अहमदनगर में 10, और पुणे के 5 गांव, बीज उत्पादन और पारंपरिक फसल किस्मों के संरक्षण के लिए बीज बैंक का संचालन कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें: विश्व की सबसे बड़ी बीयर कंपनी भारत में लगा रही है पानी के एटीएम

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