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सपनों को जिया और बन गए देश के प्रसिद्ध कार्टुनिस्ट, लेखक और स्क्रिप्ट राइटर- आबिद सूर्ती

मुंबई से एक ट्रेन चलती थी जिसमें फौजियों को ले जाया जाता था। आबिद और उनके कुछ मित्र उस ट्रेन के पीछे भागा करते थे और फौजी, बच्चों की ओर चॉकलेट, सैंडविच और बिस्कुट के पैकेट फेंका करते थे। बच्चों में फौजियों द्वारा दी गई खाने की चीजों को लेने की होड़ मच जाती थी। एक दिन एक फौजी ने मिक्की माउज की एक कॉमिक्स फेंकी। जिसका एक पन्ना ही आबिद के हाथ लग सका। लेकिन इस एक पन्ने ने आबिद की जिंदगी बदल दी।

19th May 2015
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क्या आप कभी किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें हैं जो कई विधाओं में निपुण हो और उसने इन सभी विधाओं को अपनी आजीविका का सहारा भी बनाया? जी हां, आज हम आपको ऐसी ही एक व्यक्ति के जीवन और उनके कार्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जो कई रचनात्मक विधाओं के धनी हैं। नाम है आबिद सूर्ती। आबिद सूर्ती का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ। लेकिन उनके परिवार को अचानक भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा जिसके कारण बचपन से ही उनका जीवन बहुत संघर्षपूर्ण हो गया।

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द्वितीय महायुद्ध से शुरु हुआ सफर -

एक कार्टुनिस्ट के तौर पर उनकी यात्रा देखी जाए तो वह द्वितीय महायुद्ध का समय था। मुंबई से एक ट्रेन चलती थी जिसमें फौजियों को ले जाया जाता था। आबिद और उनके कुछ मित्र उस ट्रेन के पीछे भागा करते थे और फौजी, बच्चों की ओर चॉकलेट, सैंडविच और बिस्कुट के पैकेट फेंका करते थे। बच्चों में फौजियों द्वारा दी गई खाने की चीजों को लेने की होड़ मच जाती थी। एक दिन एक फौजी ने मिक्की माउज की एक कॉमिक्स फेंकी। जिसका एक पन्ना ही आबिद के हाथ लग सका। लेकिन इस एक पन्ने ने आबिद की जिंदगी बदल दी। आबिद ने जब उस पन्ने को देखा तो उसमें एक कार्टून बना था। आबिद को इस कार्टून ने बहुत प्रभावित किया और फिर आबिद का भी मन हुआ कि वे इसे कॉपी करें। जब कॉपी किया तो कार्टून बिल्कुल वैसा ही बन गया जैसा कॉमिक्स के पन्ने पर बना हुआ था। इस घटना के बाद आबिद की इस कला के प्रति रुचि बढऩे लगी। इस तरह वे कई तरह के और कार्टून भी बनाने लगे। चूंकि वे उस समय बच्चे थे इसलिए इसे शौकिया ही बनाते थे। कार्टून बनाकर पैसे भी कमाए जा सकते हैं, ऐसा वे उस समय नहीं जानते थे। लेकिन एक बार उनके स्कूल में एक इवेंट हुआ जिसमें हर बच्चे को अपने हुनर से पैसे कमाने को कहा गया। कुछ बच्चे बूट पॉलिश करने लगे तो सामान बेचने लगे। कुछ बच्चों ने फूल बेचने का काम भी किया। आबिद को लगा कि वे क्या बेच सकते हैं जो उनके हुनर का हिस्सा हो। तभी उनके दिमाग में आया कि वे इतने मन से यह कार्टून तैयार करते हैं क्यों न इन्हें बेचकर देखें। आबिद के स्कूल के पास ही टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार का कार्यालय था। आबिद वहां पहुंच गए और अपने बनाए कार्टून संपादक जी को दिखाए। संपादक जी को वे कार्टून इतने पसंद आए कि उन्होंने उसमें से कुछ कार्टून खरीद लिए। और तब से आबिद का यह सफर शुरु हो गया।

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एक लेखक के तौर पर आबिद का सफर -

जब आबिद कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे तब उन्हें पहली बार प्यार हुआ। क्योंकि वे बहुत एक्सपे्रसिव नहीं थे इसलिए अपने मन की बात किसी को बता नहीं सके। लेकिन अपने भावों को उन्होंने लेखनी के माध्यम से व्यक्त किया। इस तरह उन्होंने अपना पहला उपन्यास 'टूटे हुए फरिश्ते' लिखा। इस दौरान वे मुंबई में एक चॉल में रहा करते थे और लिखने का काम करते थे। एक कबाडी वाले को उनके लेखन के विषय में पता था और वह एक प्रकाशक को भी जानता था। उसने प्रकाशक से आबिद जी की मुलाकात करा दी और इस प्रकार उनका यह उपन्यास हिंदी और गुजराती भाषा में प्रकाशित हुआ। तब से लिखने का सफर भी जारी है और आज आबिद एक लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। इस प्रकार कार्टुनिस्ट के साथ-साथ लेखक के तौर पर उन्हें पैसा कमाने का अपना दूसरा जरिया भी मिल गया। फिर उन्होंने तरंग मैगजीन के लिए कई धारावाहिक उपन्यास लिखे। अब तक आबिद सूर्ती पैंतालीस से अधिक उपन्यास लिख चुके हैं। सात नाटक और दस लघु कहानी संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं।

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आबिद और फिल्म लेखन -

जीवन यापन के लिए आबिद ने कई तरह के कार्य किए। जिसमें से एक काम था स्पॉट बॉय का। एक बार अस्सिटेंट डारेक्टर ने आबिद को सुभाष बाबू की किताब पढ़ते हुए देखा तो उन्हें बड़ी हैरानी हुई। लेकिन जब उन्हें पता चला कि आबिद एक लेखक भी हैं तो उन्होंने आबिद को स्पॉट बॉय से अस्सिटेंट डायरेक्टर का काम सौंप दिया। उसके बाद आबिद पटकथा लेखन भी करने लगे और फिर फिल्म एडिटिंग का काम भी आबिद ने किया। फिल्म एडिंटिंग के दौरान ही उन्हें फिल्म का फ्लो समझ आने लगा जिसने उनकी लेखनी को और समृद्ध किया। आबिद ने महसूस किया कि किसी भी उपन्यास और फिल्म की शुरुआत बहुत महत्वपूर्ण होती है। उसी से किसी किताब या फिल्म का पता चल जाता है कि वह पाठकों व दर्शकों को बांध कर रख सकती है या नहीं।

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बहादुर कॉमिक्स का सफर -

साठ और सत्तर के दशक में भारत के कई राज्यों में डकैतों का बहुत आतंक था। आबिद ने चंबल जिले का दौरा किया और लोगों से डकैतों के काम करने के तरीके को जानने का प्रयास किया। उन्होंने शोध किया कि आखिर लोग डकैत क्यों बनते हैं। इससे कई चीजें सामने आईं। इस दौरान उन्होंने तरुण कुमार भदूरी की डकैतों पर आई एक किताब भी पढ़ी और वहीं से उन्हें बहादुर सीरीज लिखने की प्रेरणा मिली।

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आबिद सूर्ती को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। वे एक उम्दा लेखक, कार्टुनिस्ट व कलाकार हैं। इस साल उन्हें कॉमिककोन इंडिया ने लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा है।

आबिद ने बहादुर कॉमिक्स सीरीज़ की नीव रखी, जिसे खूब सराहा गया। इन दिनों आबिद जल और जल संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं और 'ड्रॉप डेड' नाम से एक कैंपेन भी चला रहे हैं।

मूल- सिंधु कश्यप

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