ये 10 अधिकार समझ लिए तो औरतों को किसी के सामने झुकना नहीं पड़ेगा

देश में औरतों से जुड़े कई क़ानून हैं, लेकिन उन्हें अक्सर सबके बारे में पता नहीं होता.
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भारत में लगभग हर मिनट महिलाओं के साथ किसी न किसी तरह की हिंसा होती है. रोज़ अखबार से लेकर टीवी तक चल रही ख़बरें साबित करती हैं कि महिलाएं जितनी असुरक्षित सड़कों पर हैं, उतनी ही अपने घर और दफ्तर में भी हैं. समाज में एक महिला के तौर पर अपने अधिकार समझना और जानना बेहद ज़रूरी है. एक मां, पत्नी, बेटी, इंप्लॉई के साथ-साथ एक महिला होते हुए ये 10 भारतीय क़ानून हैं जिनकी जानकारी आपको होनी चाहिए. 

1. द प्रॉहिबिशन ऑफ़ चाइल्ड मैरिज एक्ट, 2006

इंटरनेशनल रिसर्च सेंटर फॉर वीमेन के मुताबिक, भारत में लगभग 47% लड़कियों की शादी बालिग होने, यानी 18 की उम्र के पहले ही कर दी जाती है. बाल विवाह की बात करें तो भारत दुनिया में 13वें नंबर पर है. चूंकि बाल विवाह सैकड़ों साल से हमारे कल्चर में धंसा हुआ है, इसे एकदम से निकाल फेंकना मुश्किल है.

मगर 2007 में आया बाल विवाह एक्ट इससे लड़कियों को प्रोटेक्शन देता है. लड़की अगर 18 से कम और लड़का अगर 21 से कम उम्र का है तो शादी को गैर कानूनी बताया जा सकता है. साथ की शादी करवाने वाले माता-पिता को जेल हो सकती है.

2. स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954

इस एक्ट का लक्ष्य ख़ास तरह की शादियों और तलाक को जगह देना है. भारत जैसे देश में जहां धर्म और जाति के बाहर शादी करना लोगों में मसला बन जाता है, कानून ये इजाज़त देता है कि लड़का और लड़की वयस्क होने के बाद अपने मन से शादी करें. हालांकि ये कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं है. लेकिन विदेश में रह रहे भारतीय नागरिक इसका लाभ उठा सकते हैं.

3. डाउरी प्रॉहिबिशन एक्ट, 1961

इस एक्ट के मुताबिक़, शादी के समय दहेज लेना या देना गैरकानूनी है जिसकी सज़ा दहेज लेने और और देने वाले, दोनों को मिल सकती है. सदियों से चली आ रही मान्यता कि महिला को जीवनयापन के लिए पुरुष पर ही निर्भर रहना होगा, दहेज की जड़ है. शादी के समय औरत को पैसों और गहनों के साथ ये कहकर भेजा जाता है कि ससुराल में उसका 'रख-रखाव' हो सके.

समाज में महिलाओं की जगह तो बदल गई लेकिन न ये रिवाज बदला, न लोगों की सोच. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2020 के डाटा के मुताबिक़, भारत में हर दिन 20 औरतों की दहेज के लिए हत्या की जा रही थी.

4. इंडियन डिवोर्स एक्ट, 1869

इंडियन डिवोर्स एक्ट के मुताबिक़ दो शादीशुदा लोग कानूनी तौर पर अलग होने की अर्जी डाल सकते हैं. साथ ही अपनी संतान की कस्टडी की मांग कर सकते हैं. देश के तमाम फैमिली कोर्ट्स इस केस की फाइलिंग, हियरिंग और फैसला देने में मदद करते हैं.

5. मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1861

इस एक्ट के मुताबिक़ कोई भी महिला जो किसी भी संस्थान के साथ अपनी अपेक्षित डिलीवरी डेट के पिछले एक साल के अंदर कम से कम 80 दिन काम कर चुकी है, उसे मैटरनिटी लीव, स्तनपान कराने के लिए अतिरिक्त समय, और मेडिकल अलाउंस की सुविधा मिलेगी.

6. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971

इस एक्ट के मुताबिक़ शादीशुआ और गैर-शादीशुदा, दोनों ही महिलाओं को अबॉर्शन की सुविधा और अधिकार होगा. पुराने नियमों के तहत महिलाएं केवल 20 हफ्ते तक की उम्र के भ्रूण का अबॉर्शन करवा सकती थीं. लेकिन इस एक्ट में लगातार महिलाओं के हक़ के बदलाव आए हैं. अब 24 हफ्ते तक महिलाएं अपनी प्रेगनेंसी ख़त्म कर सकती हैं, अगर भ्रूण मेडिकली स्वस्थ नहीं है तो.

इसके साथ की अगर किसी महिला की प्रेग्नेंसी रेप का नतीजा है तो वो भी अबॉर्शन करवा सकती है. अगर बच्चा प्लान नहीं किया और प्रेग्नेंसी 'फेल्ड कॉन्ट्रासेप्शन' का नतीजा है, या फिर बच्चे के पैदा होने से महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान का खतरा है तो भी अबॉर्शन करवाया जा सकता है.

इस अधिनयम का एक महत्वपूर्ण पहलू ये भी है कि नाबालिग लड़कियां भी गार्डियन की सहमति से अबॉर्शन करवा सकती हैं. हालांकि गार्डियन को प्रेग्नेंसी ख़त्म करने या जारी रखने के लिए लड़की को फ़ोर्स करने का अधिकार नहीं है.

7.सेक्शुअल हैरासमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रॉहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट, 2013

इस एक्ट के मुताबिक़ कोई भी संस्थान जहां 10 या उससे अधिक लोग काम करते हैं, वहां एक ICC (इंटरनल कम्प्लेंट्स कमिटी) बनाना आवश्यक है. इस कमिटी की हेड संस्थान की सीनियर महिला पदाधिकारी होंगी. अगर संस्थान में ऐसी कोई महिला नहीं होती है तो संस्थान को बाहर से किसी महिला को अपॉइंट करना आवश्यक होगा. ये कमिटी महिलाओं की शिकायतों की सुनवाई करेगी.

एक्ट के मुताबिक़ सेक्शुअल हैरासमेंट में गलत तरीके से या बिना इजाज़त किसी महिला को छूना, उसके साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना, प्रमोशन या दूसरे बेनेफिट्स के वादे से शारीरिक संबंध बनाना, अश्लील तस्वीरें/वीडियो/ऑडियो दिखाना/सुनाना जैसे कई पॉइंट शामिल हैं.

8. इंडीसेंट रिप्रजेंटेशन ऑफ़ वीमेन (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986

इस एक्ट के मुताबिक़ प्रिंट, वीडियो या ऑडियो, किसी भी रूप में किसी भी महिला का अश्लील चित्रण नहीं किया जा सकता. इस चित्रण का डिस्ट्रीब्यूशन यानी इसे एक बड़ी जनता तक पहुंचाने का काम करने वाला भी आरोपी होगा.अश्लीलता का अर्थ किसी भी ऐसे चित्रण से होगा जो महिला या उसके शरीर के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करता हो या एक महिला के तौर पर उसकी गरिमा को ठेस पहुंचता हो.

9. नेशनल कमीशन फॉर वीमेन एक्ट, 1990

नेशनल कमीशन फॉर वीमेन यानी राष्ट्रीय महिला आयोग 1992 में बना, हालांकि इसे बनाने के लिए अधिनियम और दिशा-निर्देश 1990 में ही तय कर दिए गए थे. इस अधिनियम के मुताबिक़ केंद्र सरकार को महिला आयोग की एक अध्यक्ष नियुक्त करना होगा, जो महिला होंगी. महिला के चुनाव का अधिकार सरकार के पास ही होगा.

महिला आयोग का काम महिलाओं से जुड़े सभी कानूनों को लागू करवाने में सरकार की मदद करना है. साथ ही महिलाओं के साथ हो रहे किसी भी तरह के अन्याय या अश्लील चित्रण का संज्ञान लेते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करवाना है. साथ ही साथ महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक डेवलपमेंट की ओर काम करना है.

10. इक्वल रेमनरेशन एक्ट, 1976

1976 में पास हुए इस अधिनियम के मुताबिक़ कोई भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान दो व्यक्तियों में लिंग के आधार पर सैलरी देने में भेदभाव नहीं कर सकता. अगर कोई इंप्लॉयर ऐसा करता पाया जाता है तो उसे फाइन भरने के साथ-साथ जेल भी जाना पड़ सकता है.

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