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पत्रकारिता छोड़ रोटी बैंक से भर रहे हैं भूखों का पेट

9th May 2016
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देश और दुनिया में भूखमरी की समस्या पर नोबल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था, 

"लोग भूख इसलिए नहीं मर रहे हैं कि दुनिया में खाद्यानों की कमी है बल्कि भूखमरी की समस्या खाद्यानों के असमान वितरण से उत्पन्न एक वैश्विक संकट है। इसे दूर कर इस धरती से भूखमरी को मिटाया जा सकता है।" 

सेन की इस बात के सालों बाद भी इस समस्या को काबू में नहीं किया जा सका है। भूख से निपटने के तमाम सरकारी प्रयास और योजनाएं नाकाफी साबित हो रही है। देश और दुनिया में अभी भी लोग भूख से मर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के फू ड और एग्रीकल्चर संगठन के वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी का 11 प्रतिशत यानि 794.6 मिलियन लोग आज भी भूखमरी की मार झेल रही है। भूखे मरने वाले दुनिया की कुल 11 प्रतिशत आबादी में अकेले भारत का हिस्सा 15.2 प्रतिशत है। भूखमरी के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, बांगलादेश और यहां तक कि दक्षिण अफ्रिकी देश इथोपिया और नाईजीरिया से भी आगे हैं। यानि देश में 194.6 मिलियन लोगों को दो वक्त भरपेट खाना नहीं मिल पाता है। 

भूखों का पेट भरना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन एक दिलचस्प और काफी संतोषजनक बात ये है कि निजी तौर पर एक शख्स के जरिए भूखमरी दूर करने की पहल पूरे देश में आकार ले रही है। भूख से आजादी के लिए सामूहिक जिम्मेदारी से बुंदेलखंड इलाके के महोबा जिले में शुरू किए गए ‘रोटी बैंक’ की अवधारण पूरे देश में फैल रही है। पत्रकार और समाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकर द्वारा साल भर पहले शुरू किए गए रोटी बैंक से प्रेरणा लेकर वर्तमान में देश भर में सौ से अधिक रोटी बैंक खुल चुके हैं। लोग सामूहिक स्तर पर अपने घरों से रोटी दान कर भूखों का पेट भर रहे हैं। रोटी बैंक का कांसेप्ट देने वाले तारा पाटकर चाहते हैं कि इस मुल्क में रहने वाला कोई आदमी भूखा न रहे। जिन लोगों के खाने की कोई व्यवस्था नहीं है उनके लिए समाज के सक्षम लोगों को अपनी जिम्मेदारी उठानी चाहिए। पाटकर ने रोटी बैंक का अभियान चलाने के अलावा भी कई सफल आंदोलनों का संचालन किया है। पर्यावरण संरक्षण का मसला हो या फिर बुंदेलखंड के किसनों की आवाज उठाने का मामला। वह हमेशा से जनता की आवाज बनते हैं। उनके हक की लड़ाई लड़ते हैं। वह पिछले 39 दिनों से अकालग्रस्त बुंलेदखण्ड के किसानों के बिजली मांफी के लिए भूख हड़ताल पर हैं। योर स्टोरी से उन्होंने साझा किए अपने रोटी बैंक के शुरूआत के तजुर्बे और सामाजिक संघर्षों की यादें। 

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46 वर्षीय तारा पाटकर यूपी और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के महोबा में पैदा हुए थे। पत्रकारिता और समाज सेवा के जुनून के कारण उन्होंने शादी नहीं की। तारा पाटकर कहते हैं कि इस दिशा में सोचने का कभी मौका ही नहीं मिला। लगभग 20 साल सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद वह समाज सेवा के क्षेत्र में आ गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने स्वराज पार्टी की टिकट पर लखनऊ सीट से चुनाव भी लड़ा था। चुनाव में वह जीत से तो कोसों दूर थे लेकिन उन्हें इस बात का बेहद संतोष है कि चुनाव में वह 12वें स्थान पर थे और 17 उम्मदीवार उनसे भी पीछे थे। पाटकर की भूखों के प्रति उनकी संवेदना काफी गहरी है। वो कहते हैं, 

"मैं अकसर सड़कों, चौराहों और बाजारों में फिरने वाले लावारिस लोगों के बारे में सोचा करता था कि वह खाना कहां से खाते हैं। रोज़-रोज़ कौन उन्हें मुफ्त में खाना देता होगा। ऐसे लोगों के भोजन के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए।"
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महोबा में शुरू किया देश का पहला रोटी बैंक

तारा पाटकर ने 15 अप्रैल 2015 को महोबा जिला मुख्यालय में पहली बार रोटी बैंक की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने 10 लोगों की एक टीम बनाई। ये लोग अपने-अपने घरों से दो-दो रोटी और सब्जी लेकर एक स्थान पर जमा करते थे। वहां से जरूरतमंद लोगों को रोटी दी जाती थी। तीन माह के अंदर ही शहर के लगभग 500 घरों से खाना जमा होने लगा। लोग स्वेच्छा से खाना दान कर इस काम में सहयोग करने लगे। अब शहर के कई जगहों पर ये काउंटर हैं, जहां से भूखों को मुफ्त में खाना दिया जाता है। दो शिफ्टों में खाना उपलब्ध कराया जाता है। सुबह 7 से 10 के बीच और शाम 7 से रात 12 बजे तक। खास बात ये है कि किसी को भी बासी खाना नहीं दिया जाता है। सुबह का बचा खाना शाम को और शाम का बचा खाना अगले दिन गायों और अन्य आवारा पशुओं को खिला दिया जाता है। रोटी बैंक के संचालक तारा पाटकर कहते हैं, 

"मैंने एक हेल्पलाईन नंबर भी जारी किया है, जिसपर फोन कर के भी भूखों को खाना पहुंचवाया जा सकता है। भविष्य में मेरी योजना इस रोटी बैंक के कॉंसेप्ट को गांवों तक पहुंचाने की है, ताकि गांवों में भी कोई भूखा न रहे। दिलचस्प बात ये है कि महोबा से शुरू किया गया रोटी बैंक का ये विचार अबतक देश के कई हिस्सों में पहुंच गया है." 

महोबा के बाद इंदौर, छतरपुर, ललितपुर, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, आगरा, हमरीपुर, औरई, हजारीबाग और गुजरात के कुछ इलाकों तक रोटी बैंक लोगों ने खोल दिया है। तारा पाटकर कहते हैं, 

"देश और दुनिया भर में घरों में रोजाना इतना खाना बर्बाद होता है कि उससे दुनिया भर के भूखे लोगों का पेट भरा जा सकता है। महानगरों में बड़े-बड़े फाइव स्टार होटलों में रोजाना हजारों लोगों का खाना फेंका जाता है, जबकि दूसरी ओर उन्हीं शहरों में कुछ गरीब भूखे सो जाते हैं। हमे भोजन की बर्बादी और भूखे लोगों के बीच की इस दूरी को पाटने की जरूरत है। सरकारी गोदामों में सालाना लाखों टन सड़ रहे अनाजों को उन जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना होगा, और ऐसा तभी संभव होगा जब सामाजिक स्तर पर प्रयास किए जाऐंगे।"
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जल प्रदूषण रोकने के लिए कर चुके हैं ‘जल सत्याग्रह’

तारा पाटकर को देश में गरीबी और भूखमरी से जूझते अवाम के फिक्र के अलावा पर्यावरण की भी उतनी ही चिंता है। लखनऊ के हृदय स्थल से बहने वाली गोमती नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए भी उन्होंने आंदोलन चलाया था। वर्ष 2014 में उन्होंने सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए 9 दिनों का जल सत्याग्रह किया। ये सत्याग्रह इस बात के लिए था कि शहर के विभिन्न कल कारखानों से निकलकर गोमती नदी में गिरने वाले 27 गंदे जल निकासों को बंद किया जाए। उनके जल सत्याग्रह के आगे झुकते हुए सरकार ने नदी में गिरने वाले उन सभी गंदे जल स्रोतों को बंद कर दिया।

पर्यावरण संरक्षण के लिए लखनऊ में बनवाया साइकिल ट्रैक

तारा पाटकर आज भी साइकिल से चलते हैं और चप्पल नहीं पहनते हैं। साइकिल से चल कर जहां वह पर्यावरण संरक्षण का लोगों को संदेश देते हैं, वहीं चप्पल उन्होंने तबतक न पहनने का प्रण लिया है, जबतक कि सरकार बुंदेलखंड में एक एम्स की स्थापना को मंजूरी नहीं दे देती है। पाटकर पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दैनिक जीवन में साइकिल के प्रचलन का बढ़ावा देना चाहते हैं। लखनऊ प्रवास के दौरान से ही उनका ये अभियान जारी है। उन्हीं की कोशिशों से लखनऊ के प्रमुख मार्गों पर सरकार ने साइकिल ट्रैक का निर्माण कराया है। उत्तर प्रदेश में पहले साइकिल पर लगने वाला वैट बहुत ज्यादा था, लेकिन पाटकर की मांगों के बाद सरकार ने साइकिल खरीददारी पर वैट की रकम कम कर दी।

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एम्स आंदोलन के लिए रख चुके हैं ‘रोजा’

तारा पाटकर बुंदेलखंड इलाके में एम्स की स्थापना के लिए लम्बे समय से आंदोलन कर रहे हैं। पिछले साल उन्होंने 21 लोगों के साथ रमजान के महीने में रोजा रखा। उन्होंने एम्स की मांग के लिए 18 भाषाओं में लगभग 1.5 लाख पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा था। वह पिछले 39 दिनों से अनशन और 32 दिनों से फिर उपवास पर हैं। इस बार मांग है कि सरकार बुंदेलखंड के किसानों के बिजली का बिल माफ करें, क्योंकि बुंदेलखंड भयंकर सूखे की चपेट में हैं। यहां के खेतों में लगी फसलें सूख गई है। अनाज और पानी के अभाव में लोग इलाके से पलायन कर रहे हैं। ऐसे में किसान बिजली का बिल भरने की स्थिति में नहीं है। तारा पाटकर कहते हैं कि उनकी जिंदगी का बस एक ही मकसद, ‘बुंदेलखंड के गौरव को पुन:स्थापित करना। बुंदेलखंड को भी देश के अन्य हिस्सों की तरह विकास की दौड़ में शामिल कराना और यहां से गरीबी और भुखमरी दूर करना’। 

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