‘‘मैंने ऐसा समय देखा है, जब खाने के लाले थे और जेब में सिर्फ 50 रुपये थे’’

By Pooja Goel
June 04, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
‘‘मैंने ऐसा समय देखा है, जब खाने के लाले थे और जेब में सिर्फ 50 रुपये थे’’
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जब भी मैं अपनी आंखें बंद करके बीते समय को याद करता हूँ तो पुराने समय की यादों के झरोखे से एक स्मृति मेरे सामने आ जाती है। मैं जिंकारपुर में अपने फ्लैट के कमरे में बैठा हूँ और मेरी जेब में इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं रात का खाना खा सकूं। मेरी जेब में सिर्फ एक 50 रुपये का नोट है और मेरे पास जमापूंजी के रूप में सिर्फ यही है। मैं उस समय पूरी तरह से निराशा में घिरा था क्योंकि मैं बकाया बिलों के भुगतान न करने के अलावा बीते एक सप्ताह से अपने मकान मालिक को किराये का भुगतान करने के लिये कोई न कोई बहाना बनाकर टरका रहा था। बिल न जमा होने के कारण मेरे मोबाइल की आउटगोइंग बंद हो चुकी थी और मेरी टीम मुझे पहले ही अकेला छोड़कर जा चुकी थी। ऐसे में अधिकांश लोग मुझे एक मूर्ख समझते थे।

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मुझे लगता है कि वे लोग सही थे और वास्तव में मैं ही दीवाना हूँ। जब मुझे एक अच्छी तनख्वाह वाली ठीक नौकरी मिल सकती है तो क्यों मैं उद्यमशीतला के क्षेत्र में हाथ-पैर मार रहा हूँ? मैं आसानी से एक आरामदायक जीवन जी सकता हूँ और मैं हूँ कि भूखा और निराश एक कमरे में बैठा हूँ और मेरी जेब में इतने पैसे भी नहीं हैं कि मैं एक समय का खाना खरीद सकूं। मैं अपनी जेब में रखा 50 रुपये का वह कीमती नोट खाने पर भी खर्च नहीं कर सकता क्योंकि मुझे अगली सुबह राजपुरा में एक स्कूल के समन्वयक से मिलने जाना है और वह नोट किराये के काम आएगा। मैंने वहां पर एक परिचयात्मक कार्यशाला का आयोजन किया था और मुझे यह भी अच्छी तरह मालूम था कि वे लोग अमूमन पंजीकरण के एक सप्ताह के बाद ही भुगतान करते हैं। मैं खुद में उस समन्वयक को जल्दी भुगतान करने के बहानों के बारे में सोच रहा था।

मैंने अपनी घड़ी में सुबह 6 बजे का अलार्म लगाया और सोने का प्रयास करने लगा। अगली सुबह मैं इस एहसास के साथ उठा कि सबकुछ ठीकठाक है, मैंने ईश्वर से समर्थन और ताकत पाने के लिये हनुमान चालीसा का पाठ किया और तैयार होकर घर से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित बस स्टाॅप की ओर पैदल ही चल दिया। जी हाँ, कुछ पैसे बचाने के लिये पैदल ही चल दिया। मेरे अंदर की ऊजा खत्म हो चुकी थी लेकिन मेरे दिल में उम्मीद थी कि जल्द ही स्थितियां बदलेंगी और हालात बेहतर होंगे। मुझे लगा कि मुझे अपनी बैठक पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

मैं बस में बैठा और राजपुरा का 35 रुपये का टिकट लेने के बाद मेरी जेब में सिर्फ 15 रुपये ही बचे। यह स्कूल शहर के बाहरी इलाके में स्थित है और मुझे उम्मीद है कि बस मुझे स्कूल के गेट पर ही छोड़ेगी।

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अचानक मैं बस को रास्ता बदलते देखकर और भी चिंतित हो उठता हूँ। जब मैंने कंडक्टर से इसकी वजह पूछता हूँ तो वह बस को रुकवाकर मुझे वहीं उतर जाने की सलाह देता है। मैं बस से उतर गया। मैं यहां स्कूल से करीब तीन किलोमीटर दूर एक सुनसान राजमार्ग पर अकेला खड़ा यह सोच रहा था कि मुझे अब आगे क्या करना है। मैंचे सोचते हुए चलना ही शुरू किया था कि तभी मेरी एक मित्र का फोन आया, जो मेरी आर्थिक स्थिति से वाकिफ थी। जब मैंने उसे वस्तुस्थिति से अवगत करवाया तो उसने बेहद दुखी अंदाज में मुझसे पूछा कि मैं आगे की स्थितियों को कैसे संभालूंगा।

मैंने उसे बताया कि अगर स्कूल का समन्वयक जल्द भुगतान की मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लेता है तब तो ठीक है वर्ना मुझे वापस पैदल चलकर चंडीगढ़ जाना होगा और दोबारा अपने भविष्य की योजनाओं पर विचार करना होगा।

यह सुनकर उसने फोन पर ही रोना शुरू कर दिया और मुझे उसे चिंता नहीं करने के लिये समझाना पड़ा।

करीब एक किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुझे एक सहृदय स्कूटर सवार मिला जिसने मुझे खुशी-खुशी लिफ्ट दे दी और उसने मुझे बिल्कुल स्कूल के गेट पर उतारा। भगवान शिव से सबकुछ ठीक करने की प्रार्थना करते हुए मैं भीतर दाखिल हो गया।

मैं भविष्य की रणनीतियां बनाते हुए स्कूल के अंदर दाखिल हो गया। अगर स्कूल का समन्वयक मुझे अगले हफ्ते आकर भुगतान लेने के लिये कहता तो मैं उससे कहता कि मैं अपना बटुआ घर पर भूल आया हूँ और उससे 500 रुपये उधार देने के लिये अनुरोध करता। या मैं उससे यह कहता कि चूंकि स्कूल के आसपास कोई एटीएम नहीं है इसलिये मैं पैसे नहीं निकाल पाया और वह कम से कम मुझे इतने पैसे तो दे दे कि मैं घर तक पहुंच जाऊँ। उनके केबिन में बैठकर उनका इंतजार करते समय मेरे मन-मस्तिष्क में यही सब विचार उथल-पुथल कर रहे थे जब उन्होंने अंदर प्रवेश किया। और उनके कहे पहले शब्दों ने सबकुछ बदलकर रख दिया।

उन्होंने आते ही कहा, ‘‘क्षितिज आप यहां आए, मुझे बहुत अच्छा लगा। हमारे द्वारा अबतक इकट्ठे किये गए 25 हजार रुपये आप ले सकते हैं।’’ यकीन मानिये उस पच्चीस हज़ार ने मेरी ज़िंदगी को एक अलग रूप दे दिया। यह सुनते ही मेरी आंखों में आंसू आ गए।


(मेहमान लेखक क्षितिज मेहरा शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे एक युवा उद्यमी होने के अलावा ‘युवाशाला’ के संस्थापक भी हैं जिसके द्वारा वे छात्रों के लिये करियर परामर्श कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं।)