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अपनी अनोखी मुहिम के जरिए पर्यावरण को बचा रहे ये लोग

6th Jun 2018
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 हर दिन दुनियाभर में लाखों की संख्या में प्लास्टिक स्ट्रॉ का इस्तेमाल होता है। प्लास्टिक स्ट्रॉ से अगर पृथ्वी का सर्कल बनाया जाए तो ये ढाई गुना से अधिक बार सर्कल बनाने के लिए पर्याप्त है! अमेरिका अकेले 500 मिलियन स्ट्रॉ का उपयोग करता है। सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ अब समुद्र तटों पर पाए जाने वाले 'टॉप 10 समुद्री मलबे' में से एक है।

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 कनिष्क के अंदर अपने प्लानेट को साफ रखने का विचार आया। उन्होंने अपने इस विचार के साथ 'स्ट्रॉस सक्स' नाम से एक अभियान शुरू किया। उनका मानना था कि वे एक कदम आगे बढ़कर, दूसरों को बदलाव के लिए प्रेरित कर सकते हैं। 

चाहे कोल्ड ड्रिंक्स, कॉफी,, चाय, लस्सी या गर्म चॉकलेट कुछ भी हो लेकिन दुनिया भर होटल, रेस्तरां और कैफे में अधिकांश ड्रिंक्स के साथ एक स्ट्रॉ जरूर आता है। हर दिन दुनियाभर में लाखों की संख्या में प्लास्टिक स्ट्रॉ का इस्तेमाल होता है। प्लास्टिक स्ट्रॉ से अगर पृथ्वी का सर्कल बनाया जाए तो ये ढाई गुना से अधिक बार सर्कल बनाने के लिए पर्याप्त है! अमेरिका अकेले 500 मिलियन स्ट्रॉ का उपयोग करता है। सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ अब समुद्र तटों पर पाए जाने वाले 'टॉप 10 समुद्री मलबे' में से एक है। लोनली प्लैनेट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक, समुद्र में मछली की तुलना में प्लास्टिक अधिक होगी।

पुरुषों के एथनिक कपड़ों के ऑनलाइन रिटेल चैनल, मालबरी लाइफस्टाइल के डिजाइनर व मालिक 35 वर्षीय कनिष्क पोद्दार कहते हैं, "स्ट्रॉ के साथ एक ड्रिंक को खत्म करने में केवल 200 सेकंड लगते हैं, जबकि उस स्ट्रॉ को नष्ट होने में 200 साल लग जाते हैं।" कनिष्क के अंदर अपने प्लानेट को साफ रखने का विचार आया। उन्होंने अपने इस विचार के साथ 'स्ट्रॉस सक्स' नाम से एक अभियान शुरू किया। उनका मानना था कि वे एक कदम आगे बढ़कर, दूसरों को बदलाव के लिए प्रेरित कर सकते हैं। दरअसल कनिष्क कनाडा स्थित 'सोसाइबल किचन + टेवर्न' रेस्तरां से प्रेरित थे। इस रेस्तरां ने अपने सभी प्रतिष्ठानों में स्ट्रॉ को लेकर एक नीति अपनाई और इसकी मदद से उन्होंने दो साल की अवधि में तीन मिलियन से अधिक स्ट्रॉ को इस्तेमाल में आने से बचा लिया। इस रेस्तरां में स्ट्रॉ केवल उन्हें ही दी जीता जो विशेष अनुरोध करते। खुद से किसी भी ड्रिंक्स में स्ट्रॉ नहीं दी जाती है।

शुरुआत

जनवरी 2018 में, कनिष्क और कनाडा की उनकी मित्र केयाना अहसानी, वियतनाम में ट्रैवल कर रहे थे। यहां वे 'मुई ने' के कई खूबसूरत बीचेस पर गए। लेकिन यहां जाकर उन्हें निराशा हाथ लगी। दरअसल जब वे बीचेस पर पहुंचे तो उन्हें वहां किनारे पर कचरा, विशेष रूप से प्लास्टिक की पानी की बोतलें, प्लास्टिक के ढक्कन, एलास्टिक बैंड, और स्ट्रॉ पड़े मिले। कनिष्क कहते हैं "हमने इसके बारे में कुछ करने का फैसला किया, कचरा बैग मांगे और उसे साफ करने लगे। समुद्र तट पर इतना प्लास्टिक का कचरा देखने को मिला जो बिल्कुल भयभीत करने वाला था, हालांकि हमारे होस्टल के सामने सफाई के बाद, जब हमने बीच को देखा तो हमें प्रसन्नता मिली। ये बीच अब पहले से ज्यादा सुंदर दिख रहा था।"

हालांकि, कनिष्क की प्रसन्नता ज्यादा देर तक नहीं रुक पाई। दरअसल अगले ही दिन 12 घंटों के अंदर वो बीच फिर पहले जैसा हो गया। लेकिन इसके बाद उस बीच को साफ करना इन दोनों दोस्तों के रोज का काम बन गया। इस दौरान उनकी चर्चाओं ने उन्हें इस गंभीर मुद्दे पर लंबा समाधान निकालने के लिए प्रेरित किया। दोनों दोस्त काफी ट्रैवल करते थे। इस दौरान वे कई कैफे और बार में गए जहां उन्होंने देखा कि हर ड्रिंक्स में स्ट्रॉ ऑटोमैटिक दिया जाता है। 

विएतनाम में कनिष्क और मानसी

विएतनाम में कनिष्क और मानसी


कनिष्क कहते हैं कि, "हमें कभी भी मौका नहीं मिला कि हम स्ट्रॉ को न कह पाएं। जब भी हमें ड्रिंक्स दी जाती थी तब उसमें स्ट्रॉ पहले से पड़ी होती थी।" अपनी छुट्टियों के बाद दोनों ने सोशल मीडिया पर बातचीत जारी रखी। साथ ही अपनी-अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने उन लोगों के समूहों से जुड़ना जारी रखा जो लाइफस्टाइल परिवर्तन के माध्यम से पर्यावरण को बचाने में मदद कर सकते हैं। इसके बाद कनिष्क अपनी दोस्त मान्सी जैन के पास चले गए। 32 वर्षीय लेखक, निदेशक मांन्सी भी लोगों द्वारा पैदा कचरे को देखते हुए टूट जाती थीं। वे इस बात से भी काफी परेशान रहतीं थी कि लोग अपनी जिम्मेदारी को लेकर गंभीर नहीं हैं।

वियतनाम यात्रा के बाद मान्सी और कनिष्क के बीच बातचीत के दौरान 'स्ट्रॉस सक्स' का आइडिया आया। जिसके बाद मान्सी ने एक दोस्त की सहायता से तम्बू कार्ड के पहले सेट को डिजाइन करने में मदद की, इस तम्बू कार्ड की मदद से लोगों को सिंगल-यूज प्लास्टिक के खतरों के बारे में जागरुक किया जाता है। साथ ही उपभोक्ताओं से जहां भी संभव हो, स्ट्रॉ के उपयोग से बचने के लिए कहा जाता है।

सिंगल प्लास्टिक के खतरे को लेकर शमियाना होटल के मालिक पदमवीर कहते हैं कि, "हमारे देश में जहां कचरा निपटान और सार्वजनिक स्वच्छता एक बड़ी समस्या है, ऐसे में इस तरह के कदम न केवल लोगों और व्यवसायों को संवेदनशील बनाने में काफी लंबा रास्ता तय कर सकते हैं बल्कि एक बहुत ही आवश्यक सकारात्मक परिवर्तन लाने का मार्ग भी ला सकते हैं।" कचरे की समस्या भयानकरूप से चारो ओर फैली हुई है। फैक्ट यह है कि स्ट्रॉ व्यावहारिक रूप से सभी समुद्री प्रजातियों को चोट पहुंचाते हैं। न केवल वे समुद्र स्तनधारियों को उलझन में डाल सकते हैं, बल्कि क्योंकि वे हल्के और रंगीन होते हैं, इसलिए वे कई प्रजातियों को खाने के लिए लुभाने लगते हैं। कनिष्क बताते हैं, "आपने 2015 में दिल तोड़ देने वाले एक समुद्री कछुए का वीडियो देखा होगा जिसमें उसकी नाक में स्ट्रॉ फंसा हुआ है। वैज्ञानिकों और मछुआरों को कई मछलियां और समुद्री पक्षी मिले हैं जो स्ट्रॉ खाने से मर चुके हैं।"

प्रभाव

'स्ट्रॉस सक' ने दुनिया भर में कैफे, रेस्तरां और बार तक पहुंचने के विचार के साथ अपनी शुरुआत की, उन्होंने 'मांगने पर स्ट्रॉ' नीति को अपनाने का अनुरोध किया। अब इसकी टीम भारत, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और थाईलैंड में फैली हुई है। ये टीम किसी भी कैफे, बार या रेस्तरां में मुफ्त तम्बू कार्ड और पोस्टर प्रदान कराती है। ये तम्बू कार्ड और पोस्टर इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि इससे ग्राहक स्ट्रॉ के दुष्परिणाम के बारे में न केवल अच्छे से समझ जाता है बल्कि स्ट्रॉ के लिए पूछने से पहले दो बार सोचता है। कनिष्क कहते हैं "हम इस पतले, हल्के पीने के टूल को क्यों टार्गेट कर रहे हैं? किसी के लिए, ये स्ट्रॉ बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं और उनके आकार और वजन के कारण, उन्हें रिसाइकिल नहीं किया जाता है। बस भारत में किसी भी समुद्र तट पर जाएं और आप तरंगों में तैरने वाले सबूत देखेंगे और उनमें से आधे रेत में दफन होंगे।" पिछले छह महीनों में, पांच सदस्यीय टीम 50 से अधिक प्रतिष्ठानों तक पहुंचने में कामयाब रही है जिन्होंने स्ट्रॉ को 'नो' कहा है। इसके अलावा केयाना अहसानी ने 'स्ट्रॉ सक्स' पर कनाडा में काम करना शुरू कर दिया और 'मांगने पर स्ट्रॉ' नीति को अपनाने के लिए 25 कैफे से मिलने और बात करने में कामयाब रहीं। वह वर्तमान में इस नीति को अपनाने के लिए अन्य कैफे को मनाने के लिए यूरोप में यात्रा कर रही हैं।

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टोरंटो स्थित क्रैमर बार एंड ग्रिल के क्रिश्चियन कहते हैं, "जब तक हमसे मांगा नहीं जाता है, हम तब तक स्ट्रॉ नहीं देते। हमारे पास कुछ नियमित ग्राहक हैं जिन्होंने कई ड्रिंक्स पदार्थों के साथ एक ही स्ट्रॉ का उपयोग शुरू किया। लेकिन अधिकांश ग्राहक स्ट्रॉ मुक्त हैं!" वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया में लंदन के ट्रैवलर एडम गार्डनर ने कनिष्क को अपनी वेबसाइट बनाने में मदद की और ऑस्ट्रेलिया में उनकी परियोजना का नेतृत्व किया। वह लोगों को विभिन्न प्लास्टिक कचरे के लिए 'आसान विकल्प' चुनने के लिए प्रेरित करते हैं। कई ने धातु के स्ट्रॉ में स्विच किया है जबकि कुछ प्रतिष्ठान कार्बनिक बांस के स्ट्रॉ को चुनने की सोच रहे हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में काम करने वाले पेरिस के गीजलेन मेगर ने कनिष्क की टीम को फ्रांस में कैफे और बार तक पहुंचने में मदद की। वह अपने दैनिक जीवन में जीरो अपशिष्ट पर प्रैक्टिस कर रही हैं। भारत की बात करें तो, मान्सी और कनिष्क रांची, उदयपुर, बांधवगढ़ और दिल्ली में 20 से अधिक कैफे / रेस्तरां तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं जिन्होंने उनकी 'मांगने पर स्ट्रॉ' नीति को अपनाया है। रांची के रहने वाले कनिष्क खुद दुनिया भर में कैफे और रेस्तरां में तम्बू कार्ड, पोस्टर और शिपिंग प्रिंट के इंचार्ज हैं।

टीम वर्तमान में दुनिया भर में रेस्तरां और कैफे में अपने कार्यक्रम को बढ़ाने और प्रिंटिंग की लागतों में सहायता के लिए फंड जुटा रही है। हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं और आशा करते हैं कि यह पहल हमें समुद्री जीवन को बचाने और जल निकायों को बचाने के लिए एक कदम आगे ले जाने में मदद करेगी।

यह भी पढ़ें: पर्यावरण दिवस विशेष: सहकार से ही संभलेगा पर्यावरण, साफ होंगी नदियां

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