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जेब में 30 रुपए लेकर मुंबई आने वाला लड़का कैसे बन गया बॉलीवुड का 'देव'

देव आनंद ने बॉलीवुड में दो दशक तक राज किया। अभिनय के साथ ही उन्होंने लेखन, निर्देशन, फिल्म निर्माण में न केवल अपना हाथ आजमाया बल्कि सफलता के शिखर को भी छुआ और यहां तक पहुंचने के लिए देव ने अथक मेहनत और निरंतर काम किया था..

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3rd Jul 2017
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फिल्म मैग्जीन मायापुरी के 1975 में छपे अंक में देव के बारे में एक काफी रोचक और प्रेरक घटना का ब्यौरा है, 'कुछ ही दिनों पहले की बात है एक करोड़ रूपयों से भी अधिक लागत की, तेरह हजार फुट ऊंची हिमालय की बर्फीली चोटियों पर फिल्मायी गयी देव आनंद की आकांक्षापूर्ण फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ फ्लॉप हो गयी तो एक ज्योतिषी महाराज जंत्र-मंत्र का कुछ टोटका लेकर देव साहब के पास पहुंचे। उन्होंने देव साहब पर प्रभाव ड़ालने की पूरी कोशिश की थी, पर देव साहब ने बड़ी फुर्ती से उनकी छुट्टी करते हुए कहा, मैं गीता के कर्म में विश्वास करता हूं, फल की चिंता नही करता और न कभी पीछे मुड़ कर देखता हूं मेरा काम है काम करते रहना, जो मैं कर रहा हूं कुछ और सेवा हो तो बताइये।'

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देवानंद और क्लास एक दूसरे के समानुपाती शब्द हैं। न सिर्फ व्यक्तित्व बल्कि देवानंद का कृतित्व भी देवत्व को छूता है।' यथा नाम तथा गुणे' को अगर किसी ने चरितार्थ किया है, तो वो हैं देवानंद हैं।

देव आनंद ने हमेशा जिंदगी को आनंद के रूप में लिया। उनके भीतर की जिंदादिली ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया। उनका अंदाज उनके हजारों-लाखों चाहने वालों के भीतर आज भी जवान है।

हिंदी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता देव आनंद को उनके खास अंदाज के लिए जाना जाता है या कहें कि यही अंदाज उन्हें देवानंद बनाता है। उन्होंने हमेशा जिंदगी को आनंद के रूप में लिया। उनके भीतर की जिंदादिली ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया। उनका अंदाज उनके हजारों-लाखों चाहने वालों के भीतर आज भी जवान है। समचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में देव आनंद ने कहा था, 'मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता हूं क्योंकि वक्त बहुत तेजी से फिसलता जा रहा है और मैं उसके पीछे भाग रहा हूं। मेरे पास बताने को बहुत सी कहानियां हैं लेकिन वक्त नहीं। काश मैं एक बार फिर देव आनंद बन कर जन्म लेता और आप लोगों से 25 साल बाद एक युवा अभिनेता के रूप में मिलता।

देव आनंद ने बॉलीवुड में दो दशक तक राज किया। अभिनय के साथ ही उन्होंने लेखन, निर्देशन, फिल्म निर्माण में न केवल अपना हाथ आजमाया बल्कि सफलता के शिखर को भी छुआ और यहां तक पहुंचने के लिए देव ने अथक मेहनत और निरंतर काम किया था। फिल्म मैगज़ीन मायापुरी के 1975 में छपे अंक में देव के बारे में एक काफी रोचक और प्रेरक घटना का ब्यौरा है, 'कुछ ही दिनों पहले की बात है एक करोड़ रूपयों से भी अधिक लागत की, तेरह हजार फुट ऊंची हिमालय की बर्फीली चोटियों पर फिल्मायी गयी देव आनंद की आकांक्षापूर्ण फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ फ्लॉप हो गयी तो एक ज्योतिषी महाराज जंत्र-मंत्र का कुछ टोटका लेकर देव साहब के पास पहुंचे। उन्होंने देव साहब पर प्रभाव ड़ालने की पूरी कोशिश की थी, पर देव साहब ने बड़ी फुर्ती से उनकी छुट्टी करते हुए कहा, मैं गीता के कर्म में विश्वास करता हूं, फल की चिंता नही करता और न कभी पीछे मुड़ कर देखता हूं मेरा काम है काम करते रहना, जो मैं कर रहा हूं कुछ और सेवा हो तो बताइये।'

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जिसने की 30 रुपए से शुरूआत उसने आगे चलकर किया करोड़ो दिलों पर राज

देव की अदा इतनी आकर्षक थी कि लोग उनकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे। लेकिन देवानंद को एक्टर बनने के ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। जब देवानंद मुंबई पहुंचे थे तब उनके पास मात्र 30 रुपये थे। 26 सिंतबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे धर्मदेव पिशोरीमल आनंद उर्फ देवानंद ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर गवर्नमेट कॉलेज में पूरी की। देवानंद इसके आगे भी पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने साफ शब्दों में कह दिया कि उनके पास उन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है और अगर वह आगे पढ़ना चाहते हैं तो नौकरी कर लें। देवानंद ने निश्चय किया कि अगर नौकरी ही करनी है तो क्यों ना फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाई जाए।

1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिए जब देव आनंद मुंबई पहुंचे तब उनके पास मात्र 30 रुपये थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। देवानंद ने यहां पहुंचकर रेलवे स्टेशन के समीप ही एक सस्ते से होटल में कमरा किराए पर लिया। उस कमरे में उनके साथ तीन अन्य लोग भी रहते थे जो देवानंद की तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। जब काफी दिन यूं ही गुजर गए तो देवानंद ने सोचा कि अगर उन्हें मुंबई में रहना है तो जीवन यापन के लिए नौकरी करनी पड़ेगी चाहे वह कैसी भी नौकरी क्यों न हो। 

अथक प्रयासों के बाद देव आनंद को मुंबई के मिलिट्री सेंसर ऑफिस में लिपिक की नौकरी मिल गई। यहां उन्हें सैनिकों की चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़कर सुनाना होता था। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में देवानंद को 165 रुपये मासिक वेतन मिलना था। इसमें से 45 रुपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज देते थे। लगभग एक साल तक मिलिट्री सेंसर में नौकरी करने के बाद वह अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए जो उस समय भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े हुए थे। उन्होंने देवानंद को भी अपने साथ ‘इप्टा’ में शामिल कर लिया। इस बीच देवानंद ने नाटकों में छोटे मोटे रोल किए। देव के भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक थे। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां हैं।

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देव आनंद को फिल्म में पहला मौका 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ में मिला। हालांकि फिल्म फ्लॉप होने से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके। इसी फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी दोस्ती गुरुदत्त से हो गई। दोनों में तय हुआ कि जो पहले सफल होगा, वह दूसरे को सफल होने में मदद करेगा, और जो भी पहले फिल्म निर्देशित करेगा, वह दूसरे को अभिनय का मौका देगा। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म ‘जिद्दी’ देव आनंद के फिल्मी करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और ‘नवकेतन बैनर’ की स्थापना की। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म ‘अफसर’ का निर्माण किया, जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी-मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया, जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रही और इसके बाद उन्हें गुरुदत्त की याद आई। देव आनंद ने अपनी अगली फिल्म ‘बाजी’ के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरुदत्त को सौंप दी। ‘बाजी’ फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म उद्योग में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे।

जब बनी आइकॉनिक फिल्म गाइड

देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर.के. नारायण से काफी प्रभावित थे और उनके उपन्यास ‘गाइड’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर.के. नारायणन की स्वीकृति के बाद उन्होंने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म ‘गाइड’ का निर्माण किया, जो देव की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म में जोरदार अभिनय के लिए देव को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। वर्ष 1970 में फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह विफल रही, बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 1971 में उन्होंने फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का निर्देशन किया और इसकी कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन किया।

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देव को वर्ष 1993 में फिल्मफेयर ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ और 1996 में स्क्रीन वीडियोकॉन ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। देव को अभिनय के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘काला पानी’ के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में ‘गाइड’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार उन्हें मिला। देव आनंद को वर्ष 2001 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। 

हिन्दी सिनेमा में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2002 में देव आनंद को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देवानंद का 3 दिसंबर, 2011 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अंदाज, जिंदादिली लोगों के जेहन में जिंदा है।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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