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गांवों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार करता ‘द माइंड्स फाउंडेशन’

ग्रामीण इलाकों के लोगों में मानसिक व्याधियों के प्रति जानकारी और जागरुकता की कमी के चलते शुरू किया यह कार्यक्रमवर्ष 2010 में रघु किरण अप्पासनी द्वारा प्रारंभ की गई यह पहल अबतक 70 से अधिक रोगियों का कर चुकी है इलाजतीन चरणों के कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीणों को इन रोगों के प्रति शिाक्षित करने के अलावा निःशुल्क इलाज भी किया जाता हैरोगियों के ठीक होने के बाद उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने या नौकरी दिलवाने में भी करते हैं मदद

Pooja Goel
11th Jul 2015
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वर्तमान समय में विकासशील विश्व के सामने मानसिक बीमारी और विक्षिप्तता बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है बल्कि यह एक ऐसी परेशानी है जिसे अबतक आमतौर पर उपेक्षित किया जाता रहा है। चूंकि मानसिक विकारों का पता लगाना और उनका इलाज करना काफी मुश्किल काम होता है इसी वजह से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग अक्सर इस बारे में जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की कमी के चलते इसकी उपेक्षा करते रहे हैं। इन्हीं वजहों के चलते कई मामले उपेक्षित और बिना इलाज के ही रह जाते हैं। कुछ खुशकिस्मत जिन्हें समय से इलाज मिल भी जाता है वे मुख्यधारा में शामिल होने, कोई काम करने औरर यहां तक शादी करने तक से महरूम रह जाते हैं और वे समाज के सबसे निचले भाग में ही फंसकर रहह जाते हैं।

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रघु किरण अप्पासनी ने इस मुद्दे पर गहनता से विचार किया और वर्ष 2010 में इसके एक निदान की दिशा में कुछ सकारात्मक करने के लिये ‘द माइंड्स फाउंडेशन’ की स्थापना की। रघु बताते हैं, ‘‘मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों के बारे में बात करना बहुत कठिन होता है और कई लोगों के लिये तो यह बहुत असुविधाजनक भी साबित होता है। यहां तक कि अमरीका में बसे हुए वे लोग जो हमारी मदद करना चाहते हैं उनके लिये इस विषय में बात करना बहुत कठिन होता है। इसको लेकर समाज के हर वर्ग में भ्रांतियां व्याप्त हैं।’’ विषेशकर ग्रामीण इलाकों में जहां लोगों में मानसिक विकारों को लेकर जागरुकता और जानकारी की बेहद कमी है वहां आम लोगों के बीच जागरुकता पैदा करने के लिये ऐसे कार्यक्रमों की बहुत अधिक जरूरत है ताकि वे लोग उचित मनोरोगी सेवाओं का लाभ उठा सकें।

वक्त के साथ बढ़ती हुई इस जरूरत को पूरा करने के लिये ‘द माइंड्स फाउंडेशन’ ने स्वयं को तीन चरणों वाले कार्यक्रमों के रूप में संयोजित किया है। पहले चरण के दौरान ये ग्रामीण इलाकों में मानसिक विकारों के संबंध में जागरुकता पैदा करने के लिये शैक्षणिक कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। रघु कहते हैं, ‘‘बीते एक वर्ष के दौरान हम 19 विभिन्न गांवों में सामान्य शैक्षणिक कार्यशालाओं का सफल आयोजन कर चुके हैं जिनमें हम करीब 2500 लोगों को चिन्हांकित किया है। लिहाल हम इन गांवों के 70 मरीजों को निःशुल्क इलाज उपलब्ध करवा रहे हैं। फिलहाल हम महिलाओं, बच्चों और इन इलाकों में काम करने वाले सामान्य चिकित्सकों को इन बीमारियों के बारे में जागरुक करने के लिये शिक्षा सत्रों का आयोजन कर रहे हैं।’’


द्वितीय चरण में ‘द माइंड्स फाउंडेशन’ अपनी सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पेशेवर चिकित्सा सेवा की उपलब्धता सुनिश्चित करवाने का काम करती है। गामीण इलाकों में मानसिक व्याधिायों से जूझ रहे रोगियों के लिये समुचित उपचार की कमी न सिर्फ जानकारी के अभाव को बढ़ाती है बल्कि इनके साथ जुड़ी भ्रांतियों को भी एक नया रूप देती है। मानसिक विकार को साध्य बीमारी मानने की जगह लोग से एक निहित कमजोरी का प्रतिरूप मान लेते हैं। हालांकि असल में मुख्य मुद्दा सिर्फ संसाधनों की कमी का ही नहीं है। रघु बताते हैं, ‘‘अगर आप सिर्फ संख्याओं पर ही नजर डालें तो पूरे भारत में मात्र 3500 मनोचिकित्सक। इतने बड़े देश में क्या सिर्फ इतने मनोचिकित्सक काफी हैं? लेकिन जब मैंने इन मनोचिकित्सकों से संपर्क करना प्रारंभ किया तो मुझे समझ के आया कि ऐसा नहीं है कि ये पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इनमें से अधिकतर सिर्फ शहरी इलाकों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। हर जगह पर्याप्त संसाधन तो मौजूद हैं लेकिन ग्रामीण नागरिकों के पास खर्च करने के लिये पैसा नहीं है और जिनके पास पैसा है वे शहरों में स्थित इन चिकित्सा केंद्रों पर इलाज करवाने के लिये जाने को तैयार नहीं हैं।’’

उपचार के प्रति लोगों की इन मानसिकता को बदलने के लिये इन्होंने दूसरे चरण के दौरान ग्रामीणों को चिकित्सा संबंधी परामर्श देने के लिये उनके गांव से लेकर चिकित्सा केंद्र तक निःशुल्क परिवहन सेवा भी उपलब्ध करवाते हैं। इन चिकित्सा केंद्रों में पेशेवर चिकित्सकों और विशेषज्ञों द्वारा उनकी जांच की जाती है और उसके बाद उन्हें मनोवैज्ञानिकों या मनोचिकित्सकों द्वारा मुफ्त मे दवाएं भी दी जाती हैं।

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शिक्षा, निदान और उपचार के दौर के बाद इनका अंतिम औैर निर्णायक चक्र प्रारंभ होता है जो इस कार्यक्रम के चक्रों को पूरा करते हुए स्थिरता की दिशा में अपने कदम बढ़ाता है। तीसरे और अंतिम चरण में जो सुधार का चरण है, में इलाप पाकर ठीक हुए रोगियों को एक नई भूमिका सौंपी जाती है जिसमें उन्हें व्यवसायिक प्रशिक्षण देते हुए समाज में मौजूद अन्य मरीजों तक अपनी पहुंच बनाने का काम सौंपा जाता है। विभिन्न मानसिक अस्पतालों में पहले से ही संचालित हो रहे व्यवसायिक पुर्नवास कार्यक्रमों के साथ काम करते हुए ‘द माइंड्स फाउंडेशन’ साधारण वस्तुओं के उत्पादन में प्रशिक्षण देने में मदद करत है जिसके फलस्वरूप रोगी अपने समाज में दोबारा सिर उठाकर जीने का जज्बा विकसित कर पाते हैं। रघु कहते हैं, ‘‘ये कार्यक्रम मरीजों को कला या कपड़े या विभिन्न फैब्रिक के अलावा ऐसी चीजें बनाना सिखाता है जिन्ें वे आराम से अपने घर पर बना सकते हैं। दूसरे विकल्प के तौर पर हम कर्मचारी यूनियनों और स्थानीय व्यवसाइयों से बात कर उन युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करवाने के प्रयास करते हैं जो नौकरी करना चाहते हैं।’’

इसके अलावा रोगियों को विभिन्न अभियानों के माध्यम से और प्रथम चरण के दौरान संचालित किये जाने वाले शैक्षणिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के बीच अपने ज्ञान का विस्तार करने के लिये प्रेरित किया जाता है। तीसरे चरण में स्थिरता की ओर प्रदान किये गए इनके अभिनव सामधान के चलते ही ‘द माइंड्स फाउंडेशन’ को अमरीका स्थित ग्रे मैटर्स कैपिटल (जीएमसी) से फंडिग मिलने में कामयाबी मिली है। इस फंडिंग की मदद से रघु भारतीय ग्रामीण इलाकों में मानसिक व्याधियों के प्रति जागरुकता और इलाज के लिये स्वीकार्यता बढ़ाने के काम को गति देने का इरादा है।

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एक तरफ तो जीएमसी द्वारा प्राप्त फंडिंग को इनके द्वारा इस क्षेत्र में की गई कड़ी मेहनत के परिणामों के रूप में देखा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ रघु के लिये उनकी इस सकारात्मक पहल का प्रभाव ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। रघु कहते हैं, ‘‘यह वास्तव में एक कदम पीछे लेकर इस कार्य के करने के पीछे के कारणों के बारे में सोचने का समय है। इसने वास्तव में मुझे उस समय तक प्रेरित नहीं किया था जब मैं एक गांव में था और एक शिक्षण कार्यशाला का भाग बनने के लिये ग्रामीण टूटे पड़ रहे थे। इस प्रकार के क्षण आपको एक बहुत लंबे समय तक आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते रहते हैं ........... और जब भी आप अपने जीवन में कुछ नया करने का विचार कर रहे हों तो आपको ऐसे समय को निश्चित ही याद करने का जरूरत पड़ती है। यह लोग ही हैं जो वास्तव में आपको आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित करते हैं और आपका समर्थन करते हैं।’’

क्या आप भी जागरुकता के प्रयास में सहभागी बनना चाहते हैं?

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