संस्करणों

लाइफ स्किल ट्रेनिंग और प्रयोगात्मक शिक्षा का पर्याय बनी श्वेता, अनुकृति और अमृता की'अपनी शाला'

- श्वेता, अनुकृति और अमृता ने रखी अपनी शाला की नींव। - अकादेमिक विकास और लाइफ स्किल्स ट्रेनिंग के बढ़ते गैप को कम कर रही है अपनी शाला। - स्टोरी टेलिंग, रोल प्ले और विभिन्न तरह के गेम्स के माध्यम से देते हैं लाइफ स्किल ट्रेनिंग।

25th Jun 2015
Add to
Shares
21
Comments
Share This
Add to
Shares
21
Comments
Share

नेल्सन मंडेला ने कहा था - 'शिक्षा ही एक ऐसा हथियार है जिससे विश्व में सकारात्मक बदलाव आ सकता है', लेकिन क्या उनकी कही यह बात केवल अकादेमिक शिक्षा तक सीमित है? एक बच्चा जिंदगी जीने की कला और अनुभव से प्राप्त शिक्षा कहां से सीखता है? किसी भी बच्चे के लिए पढ़ाई के अलावा दूसरे स्किल भी बदलाव लाने के लिए उतने ही जरूरी हैं जितनी की शिक्षा। बहुत दुख की बात है कि हमारे देश में लाइफ स्किल्स ट्रेनिंग के विषय में कोई गंभीरता से नहीं सोचता। जब बात गरीब और निचले तबके की आती है तो यह चीज़ें उनमें बहुत कम पाई जाती हैं।

अकादेमिक विकास और लाइफ स्किल्स ट्रेनिंग के बढ़ते गैप को कम करने के लिए तीन सहेलियों ने एक ऐसा कदम उठाया जोकि इस दिशा में लोगों का ध्यान मजबूती से दिलवाने में सफल प्रयास रहा। श्वेता, अनुकृति और अमृता ने मिलकर 'अपनी शाला' की नीव रखी। बच्चों में सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए अपनी शाला गरीब बच्चों की मदद करती है।

जहां विद्यालय गणित, विज्ञान, इतिहास और भाषा ज्ञान पर जोर देते हैं वहीं वे लाइफ स्किल ट्रेनिंग और प्रयोगात्मक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण पक्ष को नज़रअंदाज कर देते हैं। आज के बच्चों के लिए जरूरी है कि उनका सामाजिक विकास हो। वे व्यवहार कुशल बनें। उनके अंदर किसी समस्या का समाधान करने की क्षमता हो और साथ ही निर्णय लेने की क्षमता भी हो। यह चीज़ें केवल किताबी ज्ञान से अर्जित नहीं की जा सकतीं।

image


श्वेता, अनुकृति और अमृता ने अपने अथक प्रयास से इस बदलाव की नीव रखी। श्वेता ने थोड़ा समय बच्चों को पढ़ाया है। उस दौरान एक घटना ने उनके सोचने का नज़रिया ही बदल दिया। जब वे 'ईच वन टीच' में पढ़ा रही थीं तब वहां एक बच्चा आता था जोकि बहुत अग्रेसिव था। उसके कोई दोस्त नहीं थे और उनकी सोच भी बहुत नकारात्मकता से भरी हुई थी। उसके बारे में जब श्वेता ने जानना चाहा कि आखिर उसकी इन हरकतों के पीछे असल वजह क्या है तो श्वेता को पता चला कि उस बच्चे के पिता बहुत शराब पीते हैं और बच्चे को गालियां देते हैं। इसके अलावा बच्चा स्कूल के बाद काम भी करता है। इस घटना ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि भले ही वह बच्चा वही शिक्षा ले रहा है जो बाकी छात्र ले रहे हैं लेकिन उसके अंदर लाइफ स्किल्स की कमी है। उसके बाद श्वेता ने तय किया कि वे इस दिशा में कुछ न कुछ काम करेंगी। जहां वे इस प्रकार के बच्चों की मदद कर सकें। इसके बाद उन्होंने एक संस्था 'प्रथम' ज्वाइन की। साथ ही उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से पढ़ाई करने लगीं। कुछ समय बाद ही उन्होंने टीआईएसएस से एमए सोशल एंथ्रप्रेन्योरशिप में भी प्रवेश ले लिया। यहां श्वेता की मुलाकात अमृता और अनुकृति से हुई। वे काफी अच्छी दोस्त बन गईं। अनुकृति हमेशा से एक उद्यमी बनना चाहती थीं। वहीं अमृता मनोवैज्ञानिक थीं और काउंसलिंग करती थीं। तीनों को पता था कि वे कुछ नया करना चाहते हैं। जिसमें बच्चे और टीचिंग का समावेश हो। तीनों सहेलियों की सोच और इरादा एक सा था इसलिए तीनों ने साथ काम करना शुरु कर दिया। तय किया कि वे लोग बच्चों को लाइफ स्किल की ट्रेनिंग देंगे।

लक्ष्य तय हो चुका था लेकिन रास्ता आसान नहीं था। अब उनके लिए सबसे जरूरी था कि वे विभिन्न स्कूलों को लाइफ स्किल की ट्रेनिंग के लिए राजी करें। ताकि वे इन स्कूलों में जाकर बच्चों को ट्रेनिंग दें सकें। यह लोग काफी स्कूलों में गए लेकिन निराशा ही हाथ लगी। फिर इन्होंने तय किया कि क्यों न इस काम में एनजीओ की मदद ली जाए जोकि बच्चों के लिए पहले से कार्य कर रहे हैं। इन एनजीओ का विभिन्न स्कूलों से टाईअप होता है। इस कारण बच्चों तक पहुंचने में आसानी होगी। फिर तीनों ने मिलकर विभिन्न एनजीओ में बात की और उन्हें सफलता भी मिली। लेकिन अभी भी इन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था जैसे - सरकारी अनुमति लेना। इसके अलावा भी छोटी-मोटी दिक्कतें बनी ही हुईं थीं।

जहां एक तरफ इन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था वहीं एक अच्छी खबर यह रही कि इन्हें फंडिंग में डीवीएस का सहयोग मिल गया। अब इनको केवल आगे बढ़कर सेवाएं देनी थीं। फंड की चिंता से अब ये मुक्त हो चुके थे।

यह लोग बच्चों के अंदर प्रयोगात्मक ट्रेनिंग के लिए कई चीजें कराते हैं जैसे स्टोरी टेलिंग, रोल प्ले और विभिन्न तरह के गेम्स। अब यह लोग चाहते हैं कि अपनी शाला जिस तरह के प्रयास कर रही है उस दिशा में व्यापक काम हो। भारत के हर स्कूल में एक्सपेरिमेंटल और लाइफ स्किल ट्रेनिंग को प्राथमिकता मिले। अगले साल अपनी शाला का लक्ष्य 11 सौ बच्चों को ट्रेनिंग देना है। इसके अलावा यह लोग टीचर्स को भी अपने साथ जोडऩा चाहते हैं ताकि यह काम और गति पकड़ सके।

Add to
Shares
21
Comments
Share This
Add to
Shares
21
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags