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"मुंबई में 20 रुपए में मैंने एक हफ्ता निकाला", जानिए, एक अभिनेता के संघर्ष की कहानी

5th Nov 2016
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बड़े सपने देखना अच्छी बात है. लेकिन सपनों का टूटना या हकीकत में बदलना निर्भर करता है आपके जुनून, ज़रूरी क़ाबलियत और बार-बार गिरकर भी सँभलने की आपकी मंशा पर. आखिर में जीत उन्हीं की होती है जो मुश्किलों से हार नहीं मानते और अपने सपने को जुनून बनाकर दिन-रात उसे जीते हैं. बालिका वधु...इस धारावाहिक और इसकी लोकप्रियता के बारे में ज्यादा बताने की ज़रूरत नहीं है. इसने ना सिर्फ टेलीविजन के इतिहास में सबसे ज्यादा एपिसोड पूरे करने का रिकॉर्ड बनाया बल्कि छोटे पर्दे पर कामयाबी की नई दास्तान लिखी और कई नए कलाकारों को चर्चित चेहरों के बीच ला खड़ा किया. आनंदी और जगदीश की कहानी जब बचपन से जवानी की दहलीज पर पहुंची तो बड़े जगदीश ने शो में कदम रखा. मीडिया से लेकर घर-घर में इस बात की चर्चा और काफी उत्सुकता थी की आखिर ये नए चेहरे कौन होंगे. शशांक ने कभी नहीं सोचा था की एक दिन वो खुद को इस जगह पाएंगे. शशांक, स्कूल के दिनों में छोटे-मोटे नाटक किया करते थे और दूसरे कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे. लेकिन एक्टिंग को फुल टाइम करियर बनाने के बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा था.


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योर स्टोरी से बातचीत में शशांक ने बताया, 

"मैं एक साधारण परिवार से हूँ. पिता सरकारी नौकरी में थे और उनके रिटायरमेंट का समय भी नजदीक आ रहा था. घर की पूरी ज़िम्मेदारी आगे मुझे ही संभालनी थी. मैंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया. कॉलेज के आखिरी साल में मैं एमबीए की तैयारियों में जुट गया. लेकिन काफी मेहनत के बाद भी इतने अंक नहीं मिले कि मुझे अपनी पसंद के एमबीए कॉलेज में दाखिला मिलता. मैं काफी निराश हो गया. मैं एक क्रिएटिव बंदा हूँ. मुझे एक्टिंग का शौक था और 9 से 5 की नौकरी मैं करना नहीं चाहता था"

जिंदगी में आगे क्या करना है, कैसे करना है, शशांक अकेले बैठे-बैठे इन्ही सवालों के जवाब ढूंढते रहते. इस उधेड़बुन में उलझे उनके मन ने उन्हें एक्टिंग की याद दिलाई. इसी दौरान वो साइबर कैफे भी जाते थे. एक दिन यूँ ही इंस्टिट्यूट की लिस्ट देखते-देखते उन्होंने एक्टिंग इंस्टिट्यूट के बारे में खोजना शुरू किया. उन्हें मुंबई के अनुपम खेर एक्टिंग इंस्टिट्यूट, ‘एक्टर प्रीपेयर्स’ के बारे में पता चला और उन्होंने अपने माता-पिता को इसके बारे में बताया. पिता ने तो हामी भर दी लेकिन उनकी माँ को जैसे सदमा लग गया.


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योर स्टोरी से बातचीत में शशांक ने बताया, 

"किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार के इकलौते बेटे को लेकर पूरा परिवार काफी सपने देखता है. मेरे माता-पिता को भी मुझसे काफी उम्मीदें थीं. पापा ने फिर भी हौसला रखा और मुझे मुंबई जाने की अनुमति दे दी. लेकिन इतने बड़े शहर में बिना किसी जान-पहचान के अपनी पहचान बनाना, कुछ ऐसे सवाल थे जिनसे मैं तो जूझ ही रहा था, माँ काफी परेशान थी. लेकिन मैंने मन ही मन फैसला कर लिया था"

एक्टिंग के गुर सिखने के बाद वो 2009 में मुंबई आ गये. वो पहले ही एक्टिंग कोर्स के लिए तक़रीबन सवा लाख रुपये खर्च कर चुके थे इसलिए उन्होंने आगे अपने ही दम पर मुंबई जाने और कुछ बनने का फैसला किया. वो घर से और पैसे नहीं ले सकते थे. लेकिन मुंबई में कदम रखते ही उनका सामना जिंदगी की कड़वी सच्चाई से हुआ...

शशांक कहते हैं, 

"मैं 2009 में मुंबई आया और मैंने दादर स्टेशन से ही अपने दोस्त को फोन लगाया जो एक्टिंग इंस्टिट्यूट में मेरे साथ ही था. लेकिन उसने अपने साथ रहने से मना करा दिया. वो किसी लड़की के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहता था. मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन निकल गई. नए शहर में कहाँ रहूँगा..क्या करूँगा ये सोच कर मैं काफी परेशान था...फिर किसी ने मुझे स्टेशन के पास ही गुरूद्वारे के बारे में बताया. मैं सामान लेकर वहां पहुँच गया. मेरे पास कुछ पैसे थे लेकिन मैं होटल में रहना नहीं अफोर्ड कर सकता था. मुझे ये पैसे बहुत संभाल के खर्च करने थे. मैंने सात दिन गुरूद्वारे में ही बिताये...रोज़ सुबह-सुबह ही ऑडिशन देने निकल पड़ता था. इस बीच मेरी एक और दोस्त से बात हुई...उसने मुझे आपने साथ रहने के लिए कहा ताकि उनके घर का किराया शेयर हो जाये. मैं सामान लेकर वहां पहुंचा तो देखा की वो कोई बिल्डिंग नहीं बल्कि चौल में रहता था. रोज़ सुबह पानी के लिए हमें लंबी लाइन लगानी पड़ती थी"

शशांक का संघर्ष अपने चरम पर था तभी एक और बुरी खबर से उनका सामना हुआ. उनकी माँ का देहांत हो गया. शशांक अपनी माँ के सबसे करीब थे और इस सदमे ने उन्हें झकझोर दिया. वो उज्जैन वापस चले गये और उन्होंने एक्टिंग छोड़ देने का फैसला किया. लेकिन पिता ने हौसला दिया और वो वापस मुंबई आ गये.

शशांक कहते हैं, 

"मैं जब दोबारा मुंबई आया तो मुझे नए सिरे से फिर शुरुआत करनी पड़ी. मैने एक साल में करीब 275 ऑडिशन दिए. दादर से रोज़ मैं लोकल ट्रेन के धक्के खाकर अँधेरी, सान्ताक्रुज़ जाता था. एक वक़्त ऐसा भी था जब मैंने बीस रुपये में पूरा हफ्ता निकाल दिया. किराये का घर था और बारिश के मौसम में छत से पानी टपकता था. हमने अपने मकान-मालिक को जब इस बारे में बताया तो उसने छत से एक प्लास्टिक बाँध दिया. लेकिन उस प्लास्टिक में बारिश का पानी जमा हो जाता. पानी में मच्छर पनपने लगे और एक दिन पता चला की मुझे डेंगू हो गया है. मैं वापस उज्जैन चला गया. पापा को मेरी देखभाल करनी पड़ी और मैं ठीक होने का इंतज़ार करने लगा"

इन तमाम परेशानियों के बीच भी शशांक ने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया. संघर्ष का दौर जारी था. आर्थिक तंगी भी बार-बार उन्हें वापस लौट जाने का इशारा करती. लेकिन बीच-बीच में मिलने वाले छोटे-मोटे काम से ना सिर्फ थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते बल्कि ये उनके लिए उम्मीद की रौशनी की तरह थी. कुछ ऐसे रोल मिले जिसमे पीछे की भीड़ में खड़े रहना पड़ता था. लेकिन पैसे की मजबूरी के चलते शशांक ने वो रोल्स भी किये ताकि घर का किराया दे सकें.


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शशांक कहते हैं, मेरे दोस्त मुझसे कहते थे कि ये मैं क्या कर रहा हूँ. क्या मैं ये सब करने के लिए मुंबई गया हूँ. लेकिन मुझे छोटे-मोटे रोल करने से कोई परहेज़ नहीं था. कम से कम इससे मेरा खर्चा तो निकल जाता था. और मैं पापा से पैसे नहीं ले सकता था. इस बीच मेरे ऑडिशन का दौर भी जारी था. एक दिन मुझे बालिका वधु के प्रोडक्शन हाउस की तरफ से ऑडिशन के लिए बुलाया गया. मुझे एक महीने तक ये नहीं बताया गया की शो में लीप आनेवाला है और मुझे बड़े जगदीश के रोल के लिए चुन लिया गया है. मैंने कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिया था इसलिए कहीं और ऑडिशन भी नहीं दे सकता था. मेरे बचाए पैसे भी ख़त्म हो रहे थे. मुझे नहीं समझ आ रहा था कि आखिर ये शो वाले कुछ बता क्यों नहीं रहे. एक दिन मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैं काफी गुस्से में उनसे सवाल-जवाब करने लगा. तब उन्होंने बताया कि मुझे बड़े जगदीश के रोल के लिए चुना गया है. ये एक बिजली के झटके जैसा था. मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

शशांक की ख़ुशी इसलिए भी ज्यादा थी क्योंकि शो काफी लोकप्रिय था और इसमें छोटे पर्दे के मंजे हुए कलाकारों जैसे सुरेख सिकरी, अनूप सोनी और स्मिता बंसल के साथ उन्हें अभिनय करना था. लेकिन अगले ही पल उन्हें खयाल आया कि उन्हें बहुत कुछ साबित भी करना होगा. बस इसी खयाल ने उन्हें नर्वस कर दिया. उनका पहला शूट बड़ी आनंदी यानी प्रत्युषा के साथ जोधपुर में था. ये लगभग पांच दिनों का शिडयूल था.


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शशांक कहते हैं...

"जब मैं सेट पर पहुंचा तो मेरे चेहरे की घबराहट देखकर सबको ये समझते देर नहीं लगी कि मैं नर्वस हो रहा हूँ. लेकिन फिर मैंने अपने आप को संभाला और पहला शॉट दिया. मेरा पहला शॉट ख़त्म होते ही मुझे तालियों की आवाज़ सुनाई दी. बस फिर क्या था. टीम की शाबाशी ने मेरा हौसला बढ़ाया और वो शिडयूल अच्छी तरह पूरा हो गया"

इसके बाद बालिका-वधु की टीम मुंबई लौट आई. अपने काम से खुश शशांक को लगने लगा कि अब उनके दुःख के दिन बीत गये. लेकिन अभी तो कई और चुनौतियाँ उनका इंतज़ार कर कर रही थी.

शशांक बताते हैं, "जिंदगी में कॉन्फिडेंट होना अच्छा है लेकिन ओवर-कॉन्फिडेंस का शिकार होना अच्छी बात नहीं है. कुछ यही मेरे साथ भी हुआ. थोड़ी सी शाबासी से मेरा हौसला इतना बढ़ गया कि मैं सब हल्के में लेने लगा. लेकिन जब मुंबई के नायगाँव सेट पर शूट की बारी आई तो मेरे पसीने छूटने लगे. बड़े कलाकारों के बीच मैं काफी नर्वस हो गया और अपने डायलॉग्स भूलने लगा. मुझे क्रिएटिव से काफी फटकार भी मिलती. मेरा कॉन्फिडेंस डगमगाने लगा. एक वक़्त ऐसा आया जब मुझे लगा, ये और मुझसे नहीं होगा. मैंने पापा को फोन करके कहा की मैं सब छोड़कर वापस आना चाहता हूँ. फिर उन्होंने समझाया कि काम को लेकर बहुत ज्यादा सोचना या हल्के में लेना दोनों गलत है. काम को सीरियसली नहीं सिनसियरली करना चाहिए. इस बात से मुझे काफी हौसला मिला और मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया. मैं सेट पर माहौल हल्का करने के लिए सबके साथ बातें करता और जोक्स भी सुनाता"

धीरे-धीरे शशांक की मुश्किलें कम होने लगीं. जगदीश के किरदार ने उनके अभिनय की कला को और निखारा और इस दौरान उन्हें अभिनय के कई रंगों से रूबरू होने का मौका मिला. शशांक ने 2010 से 2015 तक, पांच साल शो में काम किया. उन्हें उनके अभिनय के लिए 2012 में ग्लोबल फिल्म एंड टीवी ऑनर्स की तरफ से बेस्ट मेल डेब्यूटेंट का अवार्ड मिला और गोल्डन पेटल अवार्ड्स में, जगदीश के किरदार के लिए बेस्ट कैरक्टर के अवार्ड से नवाज़ा गया. फिलहाल शशांक ने बालिका वधु को अलविदा कह दिया है और उनके पास दूसरे शो के ऑफर्स हैं लेकिन वो सोच-समझकर आगे बढ़ना चाहते हैं. शशांक मानते हैं की नाम और शोहरत को संभालना भी एक कला है और कभी भी सफलता को सिर चढ़ने नहीं देना चाहिए और नाकामयाबी को दिल से नहीं लगाना चाहिए. ग्लैमर की दुनिया के चकाचौंध में असली रिश्तों की चमक नहीं खोनी चाहिए.


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शशांक कहते हैं, 

"लेस पीपल, लेस ड्रामा. भले आपके फेसबुक मैं 5000 दोस्त होंगे लेकिन जब मन की बात करनी होती है तो एक भी नहीं मिलता. मैं रिश्तों के मामले में थोड़े पुराने खयाल का हूँ. मेरे जितने दोस्त बनने थे वो स्कूल और कॉलेज के दिनों में ही बन गये. वो आज भी मेरे दोस्त हैं अब मुझे नए दोस्तों की ज़रूरत नहीं है. जहाँ तक करियर का सवाल है तो अगर आप में बार-बार ठोकर खाकर भी आगे बढ़ने का दम है और एक्टिंग का पैशन है तभी इसे बतौर करियर बनाने के बारे में सोचे. सिर्फ अच्छी बॉडी और अच्छी शक्ल से कुछ नहीं होता. और हाँ कई बार ऊपरवाले का आशीर्वाद भी बहुत ज़रूरी होता है. मुझे लगता है मेरी माँ के आशीर्वाद से ही ये सपना सच हुआ है"

शशांक व्यास, आज नई पीढ़ी के कलाकारों में एक जाना-माना नाम है. ज़ाहिर है आज लोग उनसे पूछते हैं की ये सब उन्होंने कैसे किया. सच तो ये है कि धीरज, सच्ची लगन और हिम्मत नहीं हारने के ज़ज्बे ने ही उन्हें आज सफल बनाया है. छोटे पर्दे की चमक-धमक से हजारों आकर्षित होकर मुंबई आ तो जाते हैं लेकिन कई बार निराशा या ज्यादा कामयाबी दोनों ही सूरत में खुद को संभाल नहीं पाते. शशांक के मुताबिक काम की कमी नहीं है इसलिए छोटी-मोटी असफलताओं से घबराने की ज़रूरत नहीं है. और ये बेहद ज़रूरी है की आप अपने करीबी रिश्तों को संभाल कर रखें और उन्हें कभी निराश ना करें जो आपके अपने हैं.


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संघर्ष की खूबसूरत ग़ज़ल का नाम है रणजीत रजवाड़ा

  

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