प्रेरणा

दुनिया को मुट्ठी में करने के लिए चाहिए ‘संकल्प’,NIT के छात्रों ने दिखाई सैंकड़ों बच्चों को नई राह

Harish Bisht
6th Dec 2015
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3 राज्यों में संकल्प की शाखाएं....

उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं कई छात्र...

पढ़ाई का खर्च उठाते हैं एनआईटी के पूर्व छात्र...


कहते हैं किसी चीज़ की शुरूआत करना बड़ी चीज़ है। और अगर एक बार हिम्मत और मेहनत से आप अपनी राह पर चल पड़े तो समझिए की आपने आधी बाज़ी मार ली। करीब सात साल पहले जमशेदपुर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी यानी एनआईटी के पूर्व छात्रों की एक छोटी सी कोशिश आज इस आदिवासी इलाके में रहने वाले बच्चों में नई ऊर्जा भर रही है। कभी एनआईटी के मेस में काम करने वाले छोटे बच्चे आज विभिन्न सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले जिन छात्रों से इन बच्चों ने कल तक शिक्षा हासिल की थी आज वो खुद इंजीनियरिंग और दूसरी उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। शिवेंद्र श्रीवास्तव जो एनआईटी के पूर्व छात्र और ‘संकल्प’ के संस्थापक भी हैं उनका कहना है कि “हम लोगों की इस तरह की कोई योजना नहीं थी, लेकिन आज हम तीन राज्यों में काम कर रहे हैं।”

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यूपी के गोरखपुर में रहने वाले शिवेंद्र श्रीवास्तव का बचपन मुफलिसी में बीता, लेकिन पढ़ाई में होशियार शिवेंद्र का दाखिला एनआईटी, जमशेदपुर में हो गया। यहां से उन्होने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद टाटा स्टील में नौकरी की। शिवेंद्र बताते हैं कि जब वो एनआईटी में पढ़ाई कर रहे थे उस वक्त खाली वक्त में ये अपने दोस्तों के साथ आसपास के आदिवासी इलाके में चले जाया करते थे। जहां उन्होने देखा कि इस इलाके में काफी गरीबी है और यहां के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। तब इऩके दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न इन बच्चों के लिए कुछ किया जाए। इस बात का जिक्र शिवेंद्र ने अपने दोस्तों स्वीकृति और विक्रांत से की। इसके बाद शिवेंद्र ने कॉलेज कैंपस से बाहर रहने वाले बच्चों की जगह कॉलेज की विभिन्न मेस में काम करने वाले छोटे बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचा। जिसके बाद उन्होने करीब 30 बच्चों को इकट्ठा कर ‘संकल्प’ नाम से अपनी मुहिम शुरू की।

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इन बच्चों को पढ़ता देख उनके माता पिता काफी खुश हुए जिसके बाद उन्होने शिवेंद्र और उनके दोस्तों से कहा कि उनके गांव में भी बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं जो पढ़ना चाहते हैं इसलिए वो कैंपस के साथ-साथ उनके गांव में आकर भी बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू करें। इस तरह साल 2008 में इन्होने मोहन नगर इलाके में उन बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया जिन्होने कभी किसी स्कूल की शक्ल तक नहीं देखी थी। साल 2009 में शिवेंद्र की इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म हो गई थी और उनकी नौकरी टाटा स्टील में लग गई। लेकिन बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला नहीं टूटा। वजह थे शिवेंद्र के जूनियर्स। उनके जूनियर्स ने इस मुहिम को जारी रखने का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया। ये बात शिवेंद्र को काफी पसंद आई और उन्होंने अपने जूनियर साथियों को बताया कि कब और किस तरह बच्चों को पढ़ाना हैंऔर उनकी जरूरतें क्या हैं। इस तरह उन्होंने नौकरी के साथ अपने जूनियर साथियों को दिशा निर्देश देने का काम भी जारी रखा।

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बच्चों का पढ़ाई में मन लगा और उनकी संख्या लगातार बढ़ने लगी तो शिवेंद्र और उनके साथियों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच गया। अबतक 2सौ से ज्यादा बच्चे पढ़े तो रहे थे शिवेंद्र चाहते थे कि ये बच्चे स्कूल भी जाएं ताकि वो कोई डिग्री हासिल कर सकें। लेकिन इस काम में इन बच्चों के माता पिता तैयार नहीं हुए। शिवेंद्र और उनके साथियों के पास अब एक ही तरीका बचा था बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग, जो नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे किसी स्कूल में जाकर पढ़ें। इसके अलावा इन लोगों ने कई आम सभाएं भी की और लोगों को शिक्षा की अहमियत बताने की कोशिश की। उनकी ये मुहिम रंग लाई जिसके बाद इन लोगों ने इस पिछड़े इलाके के बच्चों का अलग अलग स्कूलों में दाखिला कराया। लेकिन शिवेंद्र के साथियों ने बच्चों को पढ़ाने का काम नहीं छोड़ा। इस तरह जो बच्चे स्कूल जाते थे उसके बाद वो इनके पास पढ़ने के लिए आने लगे।

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एक ओर बच्चे पढ़ रहे थे, इलाके में शिक्षा को लेकर लोगों में जागरूकता भी आ रही थी, तो दूसरी ओर एनआईटी के पूर्व छात्र चाहते थे कि वो भी ऐसा ही कुछ अपने अपने राज्यों में भी करें। इस काम में शिवेंद्र ने उनकी मदद भी की। जिसके बाद जमशेदपुर के अलावा बिहार के मधेपुरा और वाराणसी के बीएचयू में ‘संकल्प’ के सेंटर काम कर रहे हैं। हाल ही में संकल्प ने अपना एक सेंटर धनबाद में भी खोला है। जिसके बाद संकल्प के कुल 8 सेंटर काम कर रहे हैं। हालांकि जमशेदपुर के कुछ सेंटर को छोड़ दूसरी जगह बाहर के टीचर पढ़ाने का काम करते हैं। जबकि जमशेदपुर के 5 सेंटर में ज्यादातर में एनआईटी के छात्र ही पढ़ाने का काम करते हैं।

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‘संकल्प’ के जरिये ना सिर्फ बच्चों को पढ़ाया जाता है बल्कि ये कोशिश भी की जाती है कि उनके यहां आने वाले बच्चों का अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला हो। यही वजह है कि जो बच्चे पढ़ाई में होशियार होते हैं तो ये उनका दाखिला प्राइवेट स्कूल में कराते हैं। इस तरह पिछले तीन सालों के दौरान ये अब तक 54 बच्चों का प्राइवेट स्कूलों में दाखिला करा चुके हैं। इन बच्चों में 28 लड़के और 26 लड़कियां हैं। जिन स्कूलों में इन बच्चों का दाखिला कराया गया है उनमें दिल्ली पब्लिक स्कूल, रामकृष्ण मिशन स्कूल, डीएवी स्कूल और कुछ क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल शामिल हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चों की स्कूल फीस से लेकर उनकी यूनिफॉर्म और किताबों का खर्चा ये खुद उठाते हैं। इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे तीसरी क्लास से लेकर 10 वीं तक की पढ़ाई कर रहे हैं। खास बात ये है कि इन सभी बच्चों को एनआईटी के पूर्व छात्रों ने गोद लिया है और वो ही इनकी पढ़ाई का खर्चा भी उठाते हैं।

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‘संकल्प’ में पढ़ने वाले कई बच्चे ऐसे भी हैं जो अब उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। इनके पढ़ाये बच्चे ना सिर्फ ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं बल्कि कई छात्र अलग अलग जगहों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी कर रहे हैं। इसके अलावा ये लोग समय समय पर पढ़ाई में होशियार बच्चों की परीक्षाएं भी लेते रहते हैं ताकि उनका दाखिला विभिन्न प्राइवेट स्कूलों के अलावा नवोदय स्कूल या दूसरे अच्छे स्कूलों में कराया जा सके। ‘संकल्प’ में पढ़ने वाले 90 प्रतिशत बच्चे पिछड़ी जाति से आते हैं और इनकी पढ़ाई का सारा खर्च एनआईटी के पूर्व छात्र मिलकर उठाते हैं। इसके अलावा एनआईटी में पढ़ने वाला प्रत्येक छात्र हर महीने 10 रुपये ‘संकल्प’ को देता है। ‘संकल्प’ की एक अलग टीम है जो प्रायोजित बच्चों की पढ़ाई पर खास नजर रखती है और जहां पर वो उन बच्चों में कुछ कमी देखती है तो उसे सुधारने का काम करती है।

शिवेंद्र और उनकी संस्था ‘संकल्प’ ना सिर्फ बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रही है बल्कि इनके सेंटर में आने वाले बच्चों की 50 मांओं को भी शिक्षित करने का काम कर रहे हैं। भविष्य की योजना पूछने पर शिवेंद्र का कहना है कि “हमने देश भर के 36 ऐसे जिलों का चयन किया है जहां पर ऐसे बच्चों की संख्या काफी ज्यादा है जो किन्ही वजहों से स्कूल छोड़ देते हैं या फिर जिनके माता पिता मजदूरी करते हैं, ताकि इन बच्चों को कम से कम प्राइमरी शिक्षा दी जा सके।”

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