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क्या असल में पिछड़ों को मिल पाएगा आरक्षण का वास्तविक लाभ?

वंचित एक हजार पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ देने की पहल

25th Nov 2018
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राष्ट्रपति के निर्देशानुसार गठित पिछड़ा वर्ग पैनल की एक ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि ओबीसी आरक्षण का लाभ सिर्फ दस जातियों को मिल रहा है। बाकी एक हजार जातियां इससे वंचित हैं। प्रधानमंत्री संकेत दे चुके हैं कि पैनल बनाने का मकसद सभी पिछड़ी जातियों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना है।

पीएम मोदी (फाइल फोटो)

पीएम मोदी (फाइल फोटो)


डेढ़ हजार जातियों में से 994 जातियों को पचीस प्रतिशत में से केवल 2.68 फीसद को ही आरक्षण का लाभ मिल रहा है। सूची की बाकी 983 जातियां लाभ से पूरी तरह वंचित हैं। देश के अकादमिक संस्थानों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।

ओबीसी कोटे तहत न्यायसंगत वितरण व्यवस्था के लिए राष्ट्रपति के निर्देशानुसार पिछड़ा वर्ग पैनल गठित किया गया है। इसी साल अगस्त में रिटायर्ड जज जी. रोहणी की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय पैनल को ओबीसी की केंद्रीय सूची को उप-वर्गीकृत करने का काम सौंपा गया था। इस उप-वर्गीकृत सूची में 2633 प्रविष्टियां शामिल हैं। पैनल की एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल विभिन्न समुदायों में लाभ के वितरण में भारी असमानता है।

केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को मिलने वाले आरक्षण के लाभों का एक चौथाई हिस्सा केवल 10 जातियों को मिल रहा है। लगभग एक हजार जातियां इस लाभ से वंचित कर दी गई हैं। पैनल का काम वर्गीकरण की एक सूची तक ही सीमित है, जो 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित है, जहां ओबीसी आरक्षण लागू है।

आरक्षण में लाभ के वितरण को समझने के लिए पैनल ने ओबीसी के लिए निर्धारित कोटा के अंतर्गत केंद्र सरकार की शैक्षिक संस्थानों में पिछले तीन सालों के दौरान लिए गए प्रवेश पर जाति-वार डेटा एकत्र किया और सेवाओं एवं संगठनों में पिछले पांच सालों में हुई भर्ती के आंकड़ों की भी मांग की तो पता चला कि अधिकांश संगठन ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत लाभ लेने वाली जातियों का अलग रिकॉर्ड नहीं रखते हैं। सामान्य तौर पर रिकॉर्ड एससी, एसटी और ओबीसी के नाम पर मिले। इसके बाद पैनल ने लाभार्थियों की जाति का डेटा उनके जाति प्रमाण पत्रों के माध्यम से जुटाए।

उपलब्ध डेटा से पैनल ने निष्कर्ष निकाले हैं कि आरक्षण के लाभ का एक चौथाई हिस्सा मात्र दस जातियों को, दूसरा चौथाई अड़तीस जातियों को, तीसरा चौथाई एक सौ दो जातियों को और अंतिम चौथाई करीब डेढ़ हजार जातियों को मिल रहा है। हालात की बदइंतजामी इस कदर है कि डेढ़ हजार जातियों में से 994 जातियों को पचीस प्रतिशत में से केवल 2.68 फीसद को ही आरक्षण का लाभ मिल रहा है। सूची की बाकी 983 जातियां लाभ से पूरी तरह वंचित हैं। देश के अकादमिक संस्थानों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।

भारत में सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने के लिए कोटा प्रणाली लागू की है।

मौजूदा हालात में ओबीसी आरक्षण का लाभ अत्यंत पिछड़ी जातियों तक पहुंचाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा स्वागत योग्य है। प्रधानमंत्री संकेत कर चुके हैं कि ओबीसी यानी अन्य पिछड़े वर्गों के कोटे के अंदर अत्यंत या अति पिछड़ी जातियों के लिए अलग से आरक्षण देने के प्रस्ताव पर सरकार काम कर रही है। इसके लिए सरकार ने एक कमीशन का गठन किया है। इस विभाजन का मकसद अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण का ज्यादा लाभ पहुंचाना है। 1978 में मंडल कमीशन के गठन और 1990 में कमीशन की रिपोर्ट लागू करने और ओबीसी जातियों को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण देने की तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की घोषणा के बाद, राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण की नीतियों में बदलाव की यह सबसे बड़ी घोषणा है।

उल्लेखनीय है कि आरक्षण का अर्थ होता है, अपना स्थान सुरक्षित करना। प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा हर स्थान पर अपनी जगह सुरक्षित करने या रखने की होती है, चाहे वह रेल के डिब्बे में यात्रा करने के लिए हो या किसी अस्पताल में अपनी चिकित्सा कराने के लिए, विधानसभा या लोकसभा का चुनाव लड़ने की बात हो तो या किसी सरकारी विभाग में नौकरी पाने की। हमारे देश में आरक्षण का इतिहास बहुत पुराना है। आजादी मिलने से पहले ही नौकरियों और शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने की शुरुआत हो चुकी थी। इसके लिए विभिन्न राज्यों में विशेष आरक्षण के लिए समय-समय पर कई आंदोलन हुए हैं, जिनमें राजस्थान का गुर्जर आंदोलन, हरियाणा का जाट आंदोलन और गुजरात का पाटीदार (पटेल) आंदोलन प्रमुख हैं।

देश में आरक्षण की शुरुआत 1882 में हंटर आयोग के गठन के साथ हुई थी। उस समय विख्यात समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले ने सभी के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा अंग्रेज सरकार की नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

पहली बार सन् 1901 में महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण की शुरुआत की गई। वह अधिसूचना ही भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है। सन् 1908 में अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया। इसके बाद 1909 और 1919 में भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया। सन् 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

सन् 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, (पूना समझौता) कि दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र होना चाहिए। इसके बाद 1935 के भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया था। सन् 1942 में बी. आर. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, जिसमें सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए संविधान में आरक्षण आदि की विशेष व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं।

मंडल कमीशन की ही एक और सिफारिश को लागू करते हुए मनमोहन सिंह सरकार ने 2006 में केंद्र सरकार के शिक्षा संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की थी। उसके बाद से ओबीसी आरक्षण को लेकर देश में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ था। मंडल कमीशन की रिपोर्ट में ओबीसी को सिर्फ एक सामाजिक समूह के रूप में देखा गया है। इसमें पिछड़ा, अति पिछड़ा या अत्यंत पिछड़ा जैसा वर्गीकरण नहीं है। इस रिपोर्ट के आधार पर बना राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग हर राज्य की ओबीसी जातियों की लिस्ट बनाता है और ऐसी एक ही लिस्ट अब तक मौजूद है।

हालांकि मंडल कमीशन ने विभिन्न राज्यों में आरक्षण की स्थिति के अध्ययन के दौरान यह पाया कि कई राज्यों में पिछड़ी जातियों को एक से अधिक समूह में बांटा गया है। ऐसे राज्यों में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार शामिल हैं लेकिन आयोग ने अब तक राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी जातियों की अलग-अलग लिस्ट बनाना उचित नहीं समझा था। अब इस दिशा में मोदी सरकार की पहल वंचित एक हजार पिछड़ी जातियों के लिए एक सकारात्मक एवं अत्यंत महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।

यह भी पढ़ें: गरीब महिलाओं के सपनों को बुनने में मदद कर रहा है दिल्ली का 'मास्टरजी'

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