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'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', प्रधानमंत्री मोदी के सपने में रंग भरती बनारस की एक बेटी

3rd Feb 2016
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अपने अस्पताल में बेटी पैदा होने पर मुफ्त इलाज करती हैं डॉक्टर शिप्रा...

शहर की 6 बेटियों को अपने पैसे से दिला रही हैं तालीम...

बेटी बचाओ अभियान के लिए मिल चुके हैं कई सम्मान...


बहुत पुरानी बात है कि जहां बेटियों की, महिलाओं और जननी की इज्जत होती है उस समाज का उत्थान तय है। लेकिन इस जानी-पहचानी बात की जानकारी के बावजूद समाज ऐसा नहीं करता रहा है। पर पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में लगातार काम किया जा रहा है और बेटियों को हर लिहाज़ से बेहतर बनाने की कोशिशें जारी हैं। इस मुहिम का बड़ा श्रेय देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जाता है। बेटियों को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में एक अभियान छेड़ा है। गांव-गांव, शहर-शहर इस अभियान को आंदोलन की शक्ल देने की कोशिश हो रही है। 

बनारस में इसी आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं एक महिला डॉक्टर। नाम है शिप्रा धर। शिप्रा धर के लिए जीवन का एकमात्र लक्ष्य है बेटियों को बचाना। यही उनका मिशन है, जो एक जुनून का रूप ले चुका है। अपने मिशन को पूरा करने के लिए शिप्रा धर जी जान से जुटी हैं। देश के संस्थान और बनारस की शान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय(बीएचयू) से एमडी की डिग्री ले चुकी शिप्रा के लिए डॉक्टरी, कमाने का पेशा नहीं है, बल्कि समाज और बेटियों की सेवा करने का एक बेहतर मौका है। 

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शिप्रा धर ने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद तय किया कि वो किसी सरकारी नौकरी को चुनने के बजाय खुद का अस्पताल खोलेंगीं। लेकिन डेढ़ साल पहले उनके अस्पताल में कुछ ऐसा हुआ, जिसने उनके जीने का अंदाज और नज़रिया ही बदल दिया। शिप्रा धर ने योरस्टोरी को बताया, 

'' लगभग डेढ़ साल पहले एक अधेड़ महिला अपनी गर्भवती बहू के साथ मेरे अस्पताल पहुंची। इलाज के दौरान बहू ने एक खूबसूरत बेटी को जन्म दिया। लेकिन बेटियों को बोझ समझने वाली दादी के दिल में उस बेटी के लिए कोई जगह नहीं थी। खुशी के बजाय वो महिला गुस्से से तमतमाई हुई थी। घर में बेटी पैदा होने की टीस उस महिला के जेहन में कुछ इस कदर थी कि उसने अपनी बहू के साथ ही मुझे भी जमकर ताने मारे। ''

उस महिला के तानों ने अस्पताल की तस्वीर बदल दी। इस वाक्ये के बाद डॉक्टर शिप्रा ने अस्पताल में पैदा होने वाली सभी बेटियों का इलाज मुफ्त करने की ठान ली। तब से लेकर अब तक ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। सिर्फ बेटियों का मुफ्त इलाज ही नहीं डॉक्टर शिप्रा 6 लड़कियों की पढ़ाई का भी खर्च उठा रही हैं। लड़कियों को बेहतर तालीम दिलाने के लिए शिप्रा आने वाले दिनों में एक स्कूल भी खोलने की योजना बना रही हैं, ताकि हर गरीब और बेसहारा बेटी पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो सके। शिप्रा की ये मुहिम शहर के लोगों के लिए मिसाल बन गई है। शिप्रा के इस नेक काम में मदद के लिए कई संस्थाएं भी आगे आ रही हैं। यही नहीं अब उनके अस्पताल में आने वाले लोगों की सोच भी बदल रही है। अस्पताल पहुंचने वाली लीलावती कहती हैं,

''अब लड़का हो या लड़की। कोई फर्क नहीं। बिटिया होगी तो उसे शिप्रा मैडम की तरह डॉक्टरनी बनाउंगी ''
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शिप्रा अब उन बेटियों के लिए काम करती हैं, जिन्हें दुनिया में कदम रखते ही दुत्कारा जाता है, जिनके पैदा होने पर जश्न नहीं मातम मनाया जाता है। अब तक उनके अस्पताल में कुल 90 खुशनसीब बेटियों ने जन्म लिया और डॉक्टर शिप्रा ने सभी बेटियों का मुफ्त इलाज कर उनके परिवार के लोगों को बड़ा गिफ्ट दिया। 

अगर शिप्रा बेटियों के लिए मुहिम चला रही हैं तो इसके पीछे उनके पति मनोज श्रीवास्तव का भी योगदान है। पत्नी के हर कदम पर साथ देने वाले मनोज श्रीवास्तव भी खुद एक डॉक्टर हैं। पत्नी पर फक्र करते हुए मनोज कहते हैं , 

''समाज में हाशिए पर जा चुकी आधी आबादी को सहारे की नहीं बल्कि मजबूत करने की जुटी हैं। बेटियों को बचाने के लिए समाज में बड़े बदलाव की जरुरत है और उनकी पत्नी इसी बदलाव की प्रतीक बनकर उभरी हैं।"
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बेटियों को बचाने के लिए जारी इस मुहिम ने डॉक्टर शिप्रा को नई पहचान दी है। शहर की बेटियों के लिए शिप्रा एक नई संभावना बनकर सामने हैं। यकीनन डॉक्टर शिप्रा की सीमाएं सीमित हैं, लेकिन बेटियों के लिए किए जाने वाले काम को लेकर उनकी इच्छाएं अनंत हैं, उनपर वो काम कर रही हैं। उनकी छोटी सी कोशिश समाज के लिए एक आईना है। उन लोगों के लिए एक नजीर हैं जिनके लिए बेटियां एक बोझ होती हैं।


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