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फुटपाथ पर सोने से लेकर 'मुग़ले आज़म' तक का अमर संगीत रचने वाले संगीतकार 'नौशाद' का सफर

नौशाद 1940 से 2006 तक संगीत की दुनिया में सक्रिय रहे और उनकी अंतिम फ़िल्म, बतौर संगीतकार, साल 2006 में आई 'ताजमहल' थी।

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22nd Jun 2017
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संगीतकार नौशाद अली हिंदी सिनेमा के उन रत्नों में से एक हैं, जिन्होने हिंदी सिनेमा के संगीत को कई क्लासिकल धुनों से नवाजा है। नौशाद के संगीत से सजी मदर इंडिया फिल्म को ऑस्कर के लिए नॉमिनेशन भी मिला था। नौशाद साहब की धुनों में हिंदुस्तानी संगीत का ही राग बसा हुआ है। आईये जानें नौशाद को थोड़ा और करीब से...

मोहम्मद रफी के साथ हारमोनियम पर धुन संभालते नौशान। फोटो साभार: Flicker

मोहम्मद रफी के साथ हारमोनियम पर धुन संभालते नौशान। फोटो साभार: Flicker


संगीत में नौशाद के उल्लेखनीय योगदान के लिए 1982 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड, 1984 में लता अलंकरण और 1992 में उन्हें पद्‌मभूषण से नवाज़ा गया। नौशाद 1940 से 2006 तक संगीत की दुनिया में सक्रिय रहे और उनकी अंतिम फ़िल्म, बतौर संगीतकार, साल 2006 में आई 'ताजमहल' थी।

संगीतकार वो जादूगर होते हैं, जो आपको अपनी धुनों के माध्यम से किसी भी टाइम पीरियड में पहुंचा देते हैं। शब्दों में पिरोया एक गीत जब संगीतकार के पास पहुंचता है तो वो अपनी जादुई धुनों से उस गीत को प्रागैतिहासिक काल का भी बना सकता है और चाहे तो आज अभी डिस्कोथेक में नाचने लायक भी। संगीतकार नौशाद अली हिंदी सिनेमा के उन रत्नों में से एक हैं, जिन्होने हिंदी सिनेमा के संगीत को कई क्लासिकल धुनों से नवाजा है। नौशाद के संगीत से सजी फिल्म मदर इंडिया को ऑस्कर के लिए नॉमिनेशन भी मिला था। नौशाद साहब की धुनों में हिंदुस्तानी संगीत का ही राग बसा हुआ है। आज की तारीख में कोई भी संगीतकार मुगल-ए-आज़म जैसी एल्बम तैयार नहीं कर पाए। नौशाद ने जिन फिल्मों में संगीत तैयार किया उनकी संख्या भले ही कम हो किंतु उनके संगीत के चाहने वालों की कमी नहीं रही है। उमादेवी, सुरैया, मोहम्मद रफी और शमशाद बेगम जैसी आवाज़ों को पहला ब्रेक देने वाले नौशाद एक मात्र संगीतकार हैं, जिन्होंने कुंदन लाल सहगल से लेकर कुमार सानू तक को प्लेबैक का मौका दिया।

26 दिसंबर, 1919 को जन्में नौशाद ने संगीत की तालीम उस्ताद गुरबत अली, उस्ताद यूसुफ अली, उस्ताद बब्बन साहेब से ली। वे मूक फिल्मों के समय से सिनेमा पसंद करते थे।

19 साल की उम्र में यानी 1937 में नौशाद संगीत की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई आए थे। मुंबई आने के बाद वे कुछ दिन अपने एक परिचित के पास रुके, उसके बाद वे दादर में ब्रॉडवे थिएटर के सामने रहने लगे। नौशाद की जिंदगी में एक ऐसा वक्त भी आया जब वे फुटपाथ पर भी सोए। उन्होंने सबसे पहले म्यूजिक डायरेक्टर उस्ताद झंडे खान को असिस्ट किया था और इस जॉब के लिए उन्हें 40 रुपए तनख्वाह मिलती थी। फुटपाथ पर सोना, 40 रुपए महीना पगार पर काम स्वीकार कर लेना, फ़िल्म मिलना पर रिलीज़ न होना, नौशाद ने सभी कुछ देखा। 1940 में बनी 'प्रेम नगर' में नौशाद को पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का मौका मिला और फिर 1944 में आई 'रतन' फिल्म के संगीत से नौशाद ने लोकप्रियता हासिल की। साल 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' में नौशाद का संगीत लाजवाब रहा और इसके लिए उन्हे 1954 में बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। ये नौशाद के संगीत का ही जादू था कि 'मुगल-ए-आजम', 'बैजू बावरा', 'अनमोल घड़ी', 'शारदा', 'आन', 'संजोग' आदि कई फिल्मों को न केवल हिट बनाया बल्कि उनके संगीत को कालजयी भी बना दिया।

नौशाद और कुंदन लाल सहगल का मशहूर किस्सा जो लोग अक्सर सुनाते हैं, वो कुछ इस तरह है कि 'शाहजहाँ' फ़िल्म में हीरो कुंदनलाल सहगल से नौशाद को गीत गवाना था, उस समय ऐसा माना जाता था कि सहगल बगैर शराब पिए गाने नहीं गा सकते लेकिन नौशाद ने सहगल से बगैर शराब पिए एक गाना गाने के लिए कहा तो सहगल ने कहा, 'बगैर पिए मैं सही नहीं गा पाऊँगा।' इसके बाद नौशाद ने सहगल से एक गाना शराब पिए हुए गवाया और उसी गाने को बाद में बगैर शराब पिए गवाया। जब सहगल ने अपने गाए दोनों गाने सुने तब नौशाद से बोले, 'काश! मुझसे तुम पहले मिले होते।'

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जब नौशाद की शादी में बजे उन्हीं के बनाए हुए गाने

1944 में नौशाद साहब के संगीत से सजी फिल्म रतन ने तो नौशाद को घर घर फेमस कर दिया। इस फिल्म के गीत सबकी जुबान पर थे। नौशाद को इस फिल्म के लिए 25 हजार रूपये मिले। नौशाद वैसे अपने घर से भागकर आए थे। लेकिन जब हालात सामान्य हो गए तो नौशाद अपने घर आने जाने लगे जब नौशाद के वालिद को पता चला कि नौशाद संगीत में रूचि रखता है। तो वो नाराज हो गए और फिर नौशाद की शादी करवाने के पीछे लग गए। लड़की वालों को बताया कि नौशाद दर्जी का काम करते हैं, जबकि नौशाद तब हिंदी सिनेमा में संगीत की दुनिया का एक उभरता हुआ सितारा थे। बावजूद इसके नौशाद ने अपने वालिद से कुछ नहीं कहा। हद तो तब हो गई जब नौशाद की शादी में नौशाद की ही फिल्म की धुने बैंड वाले ने बजाए।

'मुगल-ए-आजम' में म्यूजिक देने से कर दिया था मना

एक बार तो उन्होंने फिल्म 'मुगल-ए-आजम' डायरेक्टर के. आसिफ को इसी फिल्म में म्यूजिक देने से मना कर दिया था। दरअसल हुआ ये था कि एक दिन नौशाद हारमोनियम पर कुछ धुन तैयार कर रहे थे, तभी के. आसिफ आए और उन्हें फेंककर 50 हजार रुपए दिए। आसिफ की इस हरकत से नौशाद इतने खफा हुए कि उन्होंने उनकी फिल्म में म्यूजिक देने से मना कर दिया। हालांकि, बाद में आसिफ ने नौशाद को मना लिया था और उन्होंने ही फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में म्यूजिक दिया था।

नौशाद लाए थे भारत में वेस्टर्न नोटेशन का कल्चर

नौशाद ने संगीत में कई सारे प्रयोग किए। 1952 में आई फिल्म 'आन' के लिए उन्होंने पहली बार अपने ऑर्केस्ट्रा में 100 म्यूजिशियन शामिल किए थे। वे पहले ऐसे म्यूजिक कम्पोजर थे जो भारत में वेस्टर्न नोटेशन का कल्चर लाए थे। 1955 में आई फिल्म 'उड़न खटोला' के लिए उन्होंने बिना ऑर्केस्ट्रा का यूज किए कोरस से म्यूजिक दिया था। 1960 की फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के गाने 'मोहब्बत जिंदाबाद...' के लिए 100 लोगों की आवाज कोरस में दिलवाई थी। उन्होंने 1963 में आई फिल्म 'मेरे मेहबूब' के टाइटल सॉन्ग के लिए 6 इंस्ट्रूमेंट्स का यूज किया था।

'बैजू बावरा', 'मुगल-ए-आजम', 'मदर इंडिया', जैसी शानदार फिल्मों को अपने कालजयी संगीत से और बेहतरीन बनाने वाले नौशाद अली ने 5 मई 2006 को इस दुनिया से विदाई ले ली। उनका संगीत हमेशा अमर रहेगा और ऐसे ही गूंजता रहेगा।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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