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वाराणसी में पहली बार लड़कियों के लिए खुले अखाड़े के द्वार

31st Jul 2017
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पहले लड़कियों को कुश्ती जैसे खेल से दूर रहने की सलाह दी जाती थी, लेकिन अब वक्त बदल रहा है और इस बदलते वक्त में लड़कियां लड़कों से कंधा मिलाकर उनकी बराबरी कर रही हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लड़कियों ने कुश्ती में अपनी काबिलियत के बल पर देश का नाम गर्व के साथ ऊंचा किया है। दंगल फिल्म ने कुश्ती के इस जज़्बे को और अधिक बढ़ाने का काम किया है। फिल्म से प्रेरणा लेते हुए बनारस के तुलसी घाट पर स्थित स्वामीनाथ अखाड़े में लड़कियों ने पहलवानी करना शुरू कर दी है। आईये जानें पूरी कहानी...

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


आमिर खान की फिल्म 'दंगल' से प्रेरणा लेकर वाराणसी में लड़कियों के लिए खुला अखाड़ा।

तुलसी अखाड़े के स्वामी डॉ. विशम्भरनाथ मिश्र बताते हैं कि इस अखाड़े का निर्माण तुलसीदास जी के समय में हुआ था। वह कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी महिलाओं को सदैव अपने माथे पर रखते थे। 'बेटी-बचाओ बेटी पढ़ाओ' का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि बेटी बचाओ, बेटी लड़ाओ और फिर बेटी पढ़ाओ।

भारत में कुश्ती लड़ने की चाहत रखने वाले युवाओं के लिए अखाड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, लेकिन ज्यादातर अखाड़े केवल पुरुषों के लिए ही होते हैं और वहां महिलाओं के लिए जगह नहीं होती है। पहले तो लड़कियों को कुश्ती जैसे खेल से दूर रहने की सलाह दी जाती थी, लेकिन अब वक्त बदल रहा है और इस बदलते वक्त में लड़कियां लड़कों से कंधा मिलाकर उनकी बराबरी कर रही हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लड़कियों ने कुश्ती में अपनी काबिलियत के बल पर देश का नाम गर्व के साथ ऊंचा किया है।

अभी हाल में आई दंगल फिल्म में भी ऐसी ही दो बहनें गीता फोगाट और बबीता फोगाट की जिंदगी को परदे पर दिखाया गया था, जो रेसलिंग की चैंपियन रह चुकी हैं। फिल्म से प्रेरणा लेते हुए बनारस के तुलसी घाट पर स्थित स्वामीनाथ अखाड़े में लड़कियों ने पहलवानी करनी शुरू कर दी है। बीते शुक्रवार को नागपंचमी के मौके पर लड़कियों ने पहलवानी का प्रदर्शन किया। तुलसी घाट के अखाड़ा स्वामीनाथ पर लड़कियों ने पहलवानों को न सिर्फ धूल चटाई, बल्कि कुश्ती में दूसरे लोगों के लिए एक नई मिसाल भी पेश की। जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। यहां कुश्ती के गुर सीखने वाली एक बेटी पहलवान ने बताया,

'जब हम छोटे थे तब पता नहीं था कि पहलवानी कैसे की जाती थी, लेकिन अंदर एक जुनून था कि बस खेलना है। धीरे-धीरे पता चला कि दांव पेंच क्या होता है। जब कॉम्पिटिशन के लिए बाहर जाने लगी तो घरवालों ने भी सपोर्ट करना शुरू कर दिया। इसी फील्ड में आगे बढ़ना है।'

तुलसी अखाड़े के स्वामी डॉ. विशम्भरनाथ मिश्र बताते हैं कि इस अखाड़े का निर्माण तुलसीदास जी के समय में हुआ था। वह कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी महिलाओं को सदैव अपने माथे पर रखते थे। 'बेटी-बचाओ बेटी पढ़ाओ' का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि बेटी बचाओ, बेटी लड़ाओ और फिर बेटी पढ़ाओ। उनके मुताबिक अगर एक स्वास्थ्य समाज बनाना है तो लड़कियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सबल बनाना होता है। मिश्र का कहना है कि वह लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए लड़कियों को अखाड़े में आने की सलाह देते हैं।

यहां महिला कुश्ती का आयोजन कराने वाले संकटमोचन फाउंडेशन के पदाधिकारियों का कहना है कि उन्होंने आमिर खान की फिल्म 'दंगल' से प्रेरणा लेकर इस अभियान की शुरुआत की है। इस अखाड़े पर आज भी लगभग 40-50 पहलवान रोज कुश्ती कला का अभ्यास करते हैं। अखाड़े की महिला पहलवानों का कहना है कि अगर इस अखाड़े को आधुनिक सुविधाओं से युक्त कर दिया जाये और एक अच्छे कोच की व्यवस्था कर दी जाये, तो यहां से अच्छे पहलवानों को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

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