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भूख मुक्त भारत बनाने की कोशिश है “भूख मिटाओ” कैम्पेन, अब तक जुड़ चुके हैं 1800 बच्चे

30th Jan 2016
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हम और आप बाहर घूमने जाते हैं, खाते हैं, पीते हैं और मस्ती करते हैं। क्या हमारी नजर कभी ऐसे बच्चों पर पड़ी है जो कि स्लम इलाके में रहते हैं। जिनकी सारी जिंदगी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाती है। जिंदगी की इस जद्दोजहद में ये लोग दो वक्त का खाना भी ठीक से नहीं जुटा पाते हैं। गरीबों की इन्हीं परेशानियों को करीब से देखा है गुजरात वड़ोदरा के दर्शन चंदन ने।

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दर्शन चंदन कच्छ के रहने वाले हैं और वे एक कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं, उन्होने वड़ोदरा से स्नातक किया है। शिपिंग कंपनी में सेल्स प्रोफेशनल के रूप में कार्य करने वाले दर्शन ने योरस्टोरी को बताया, 

“एक दिन मैं अपने परिवार के साथ बड़ौदा के एक बड़े रेस्टोरेंट में खाना खाने के लिए गया। जब मैंने वहां खाना खाया तो वो खाना मुझे ठीक नहीं लगा, जिसकी शिकायत मैंने मेल के जरिये रेस्टोरेंट वालों से की। रेस्टोरेंट वालों ने गलती मानते हुए मुझे अपने यहां मुफ्त में दोबारा खाना खाने के लिए कहा जिस पर मैंने उनसे कहा कि मुझे खाना नहीं खाना है और अब वो खाना गरीब बच्चों को खिला दें।”

रेस्टोरेंट वालों ने भी ऐसा ही किया उन्होने कुछ गरीब बच्चों को इकट्ठा कर उनको मुफ्त में खाना खिलाया और उसकी तस्वीरें दर्शन को भेजी।

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दर्शन कहते हैं कि 

“मैने जब वो तस्वीरें देखीं तो उन बच्चों के चेहरे पर जो मुस्कान थी उसे देखकर मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितनी खुशी मिली। उसी समय मैंने फैसला कर लिया कि मुझे इन बच्चों के लिए कुछ करना है।” 

इसके बाद दर्शन ने जून, 2015 को “भूख मिटाओ” कैम्पेन अपने 5-7 साथियों के साथ मिलकर शुरू कर दिया। पहले दिन इन्होने करीब 40 बच्चों को खाना खिलाया। धीरे धीरे उनके इस कैम्पेन से लोग जुड़ते गये और आज वड़ोदरा में 500 से भी ज्यादा लोग इस कैम्पेन का हिस्सा हैं। दर्शन और उनके दोस्त वड़ोदरा शहर के 10 स्लम एरिया में हर रविवार को इन बच्चों को खाना खिलाते हैं, उनके साथ खेलते हैं और उनको जीवन में आगे बढ़ने की सीख देते हैं। ये लोग सुबह 11 बजे से दिन के 2 बजे तक इन इलाकों में रहते हैं। वड़ोदरा में मिली सफलता के बाद अब इन्होंने अपने इस कैम्पेन का विस्तार किया है। यह कैपेंन आज गुजरात के आदिपुर, गांधीधाम, कोसंबा, नारियाद और महाराष्ट्र के मुबंई तक फैल चुका है।

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दर्शन चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके इस कैपेंन से जुड़े ताकि सप्ताह के सातों दिन इन बच्चों को खाना खिला सकें, क्योंकि हमारे देश में ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिन्हें ठीक से खाना नहीं मिल पाता है। दर्शन ने योर स्टोरी को बताया कि “हम बच्चों को संतुलित भोजन देने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका शारीरिक और मानसिक विकास हो सके। बच्चों के खाने में हम रोटी, सब्जी, चावल, केला और बिस्किट देते हैं। ये खाना हमारे सभी साथी अपने घरों पर ही बनाते हैं। इसके लिए कुछ लोग मिलकर रोटी बनाते हैं तो कुछ सब्जी।” खास बात ये है कि दर्शन अपने इस कैम्पेन के लिये किसी से नकद पैसा या चैक नहीं लेते हैं। उसके बदले में ये लोगों से दान में केवल खाने का कच्चा सामान ही लेते हैं। आज दर्शन और उनके साथियों की कोशिशों का नतीजा है कि “भूख मिटाओ” मुहिम से 18 सौ बच्चे फायदा उठा रहे हैं।

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दर्शन कहते हैं कि इस कैंपेन को शुरू करने का हमारा एक उद्देश्य लोगों को समाज के प्रति जागरूक करना है ताकि देश से गरीबी को मिटाया जा सके। उनका कहना है कि हमारा मकसद बच्चों को सिर्फ खाना खिलाना ही नहीं, हम चाहते हैं कि वे पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनें और अपने हुनर से कोई काम कर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। दर्शन और उनकी टीम बच्चों को सिर्फ खाना ही नहीं खिलाती बल्कि वो इन बच्चों को साफ सफाई, उठने-बैठने और लोगों से बात करने का तौर तरीका भी सिखाते हैं।

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दर्शन और उनके साथियों ने वड़ोदरा की एक स्वंय सेवी संस्था “महावीर इंटरनेशनल” से करारा किया है, जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है। रविवार को वड़ोदरा के जिन 10 स्थानों पर ये लोग खाना खिलाते हैं उन जगहों पर ये संस्था सोमवार से शनिवार तक उन्हीं बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं।

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भविष्य की योजनाओं के बारे में दर्शन का कहना है कि हमारा लक्ष्य इस साल करीब 150 बच्चों का सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में दाखिला कराने का है। इन बच्चों का चयन हम उन्हीं बच्चों में से करते हैं जिन्हें हम खाना खिलाते हैं। बच्चों की पढाई का खर्चा लोगों से मिलने वाले पैसे से किया जाएगा जो इन बच्चों को स्पांसर कर रहे हैं।

दर्शन चंदन

दर्शन चंदन


इसके अलावा “भूख मिटाओ” कैम्पेन को वो दूसरे राज्यों में ले जाने की चाहत रखते हैं साथ ही वो लोगों से अपील भी करते हैं कि वे जिस किसी राज्य व शहर में हों वो स्लम में रहने वाले गरीब बच्चों की भूख मिटाने में मदद करें। उनका कहना है कि अगर अपने देश को हमने ‘हंगर फ्री’ बनाना है तो सबसे पहले यहां के युवाओं को आगे आना होगा। क्योंकि युवा शक्ति में हम दुनियां में नंबर एक पर हैं और अगर यहां के युवा ठान लें तो वे एक दिन भारत को भूख से मुक्त करा देगें।

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