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एमआईटी से ग्रैजुएट यह भारतीय सिखा रहा पर्यावरण प्रदूषण को भुनाने का अनूठा ढंग

17th Jan 2018
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लीक से हटकर सोचने वाले अनिरुद्ध ने एयरइंक और कालइंक नाम की तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से औद्योगिक इकाईयों की चिमनियों और कार के पाइप से निकलने वाले काले धुंए को इंक में तब्दील किया जा सकता है...

अनिरुद्ध शर्मा

अनिरुद्ध शर्मा


हाल ही में बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान भी अनिरुद्ध की इस मुहिम से जुड़े और उन्होंने वादा किया अनिरुद्ध के ब्रैंड प्रमोशन के लिए अब से वह सिर्फ एयरइंक का ही इस्तेमाल करेंगे। 

अनिरुद्ध की टीम ने अभी तक 1.6 बिलियन माइक्रोग्राम पार्टिकुलेट मैटर को इकट्ठा कर, सफलतापूर्वक रीसाइकल किया है। अनिरुद्ध की यात्रा, 2012 में बोस्टन में एमआईटी मीडिया लैब्स से शुरू हुई।

वायु प्रदूषण, हमारे पर्यावरण का एक गंदा सच बन चुका है। आंकड़ों के मुताबिक, हर साल लगभग 70 लाख भारतीय, इस प्रदूषण की वजह से असमय ही मौत का शिकार हो जा रहे हैं। ऐसे वक्त में कई विद्यार्थी और ऑन्त्रप्रन्योर्स समाज के हित में, इस समस्या से लड़ने के लिए उपयुक्त विकल्पों की तलाश में हैं। ऐसे ही एक शख्स के बारे में हम बात करने जा रहे हैं, अनिरुद्ध शर्मा। अनिरुद्ध ने एक ऐसी तकनीक की खोज की है, जिसके जरिए हम पर्यावरण के प्रदूषण को भी उपयोगी बना सकते हैं।

लीक से हटकर सोचने वाले अनिरुद्ध ने एयर-इंक और कालइंक नाम की तकनीक या उत्पाद विकसित किए हैं, जिनके माध्यम से औद्योगिक इकाईयों की चिमनियों और कार के पाइप से निकलने वाले काले धुंए को इंक में तब्दील किया जा सकता है। अपने इस प्रयोग पर अनिरुद्ध कहते हैं, “जब आप वायु प्रदूषण की समस्या को सुलझाने के विषय में बात कर रहे हैं, तब बात सिर्फ तकनीक के बारे में नहीं होती। मुद्दा है कि लोगों को इसके खतरों और उससे लड़ने के उपायों के बारे में कैसे जागरूक किया जाए।”

हाल ही में बॉलिवुड स्टार शाहरुख खान भी अनिरुद्ध की इस मुहिम से जुड़े और उन्होंने वादा किया अनिरुद्ध के ब्रैंड प्रमोशन के लिए अब से वह सिर्फ एयर-इंक का ही इस्तेमाल करेंगे। अनिरुद्ध की टीम ने अभी तक 1.6 बिलियन माइक्रोग्राम पार्टिकुलेट मैटर को इकट्ठा कर, सफलतापूर्वक रीसाइकल किया है। अनिरुद्ध की यात्रा, 2012 में बोस्टन में एमआईटी मीडिया लैब्स से शुरू हुई। अनिरुद्ध कहते हैं कि जब आप किसी नई तकनीक पर काम करना शुरू करते हैं, तब आपके पास मार्गदर्शन की कमी होती है। अनिरुद्ध ने बताया कि शुरूआत में उनकी टीम ने एक गैरेज में 19 घंटों तक काम किया है और इसके बावजूद भी 5 दिनों तक कोई परिणाम हासिल नहीं हुआ।

करीब एक साल तक आइडिया पर काम करने के बाद अनिरुद्ध को अहसास हुआ कि अगर यूएस में अपना ऑफिस बनाएंगे तो भारत को उनके प्रयोग का कोई फायदा नहीं होगा। इस वजह से 2013 में वह भारत वापस आ गए और अपने तीन साथी शोधकर्ताओं के साथ उन्होंने ‘ग्रैविकी लैब्स’ बनाई।

क्या है आइडिया?

अनिरुद्ध ने स्पष्ट करते हुए बताया कि ईंधन जब पूरी तरह से नहीं जल पाता है तो उससे निकलने वाले कण (पार्टिकल्स) हवा में मिल जाते हैं, जो मुख्य रूप से कार्बन के बने होते हैं। ये पार्टिकल्स बेहद छोटे (2.5 माइक्रोमीटर्स या इससे भी कम व्यास) होते हैं। अनिरुद्ध ने बताया कि वह अमेरिकन आर्कीटेक्ट, ऑथर, डिजाइनर और शोधकर्ता बकमिन्सटर फुलर से प्रेरित हैं। फुलर की बात से ही उनके प्रयोग का रास्ता निकला। फुलर के मुताबिक, “प्रदूषण और कुछ नहीं है, सिर्फ एक संसाधन है, जिसका हम ठीक तरह से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। हम प्रदूषण को फैलने देते हैं क्योंकि हम उसकी कीमत नहीं जानते।”

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अनिरुद्ध के संदर्भ में ऑन्त्रप्रन्योरशिप या सामाजिक हित में आविष्कार, कोई नई बात नहीं है। एमआईटी जाने से पहले वह 2011 में शुरू हुई एक कंपनी के सह-संस्थापक भी थे, जो देखने में असक्षम लोगों के लिए इलेक्ट्रॉनिक जूते बनाती थी। उनका यह प्रयोग काफी लोकप्रिय भी हुआ था। अनिरुद्ध को उनके असाधारण काम के लिए एमआईटी और बीबीसी द्वारा पुरस्कार भी मिल चुके हैं। एमआईटी ने उन्हें ‘इनोवेटर ऑफ द ईयर’ और बीबीसी ने उनके प्रोडक्ट को ‘टॉप 5 इंडियन इनोवेशन्स’ का खिताब दिया था। उनके आविष्कार को फोर्ब्स की सूची में भी जगह मिल चुकी है।

क्या है तकनीक

ग्रैविकी, कालइंक तकनीक के माध्यम से प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को उनके स्त्रोत से ही इकट्ठा कर लेती है ताकि वे हवा में न शामिल हों। इसके बाद प्रदूषित तत्वों में से भारी धातु, तेल, गंदगी और कार्सिनोजन्स को अलग किया जाता है। इसके बाद जो प्रोडक्ट बचता है, उसमें सिर्फ कार्बन होता है। इस कार्बन को आगे की रसायनिक प्रक्रिया के माध्यम से इंक और पेंट में बदल दिया जाता है।

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ग्रैविकी का दूसरा उत्पाद है, एयर-इंक। यह इंक, आमौतर पर मिलने वाली इंक से कहीं अधिक काली होती है क्योंकि इसमें 100 प्रतिशत कार्बन होता है। एक पेन में जिनती एयर-इंक होती है, उसके लिए 40-50 मिनटों में कार से होने वाले प्रदूषण का इस्तेमाल होता है। अनिरुद्ध बताते हैं कि इसका प्रयोग किसी भी आम पेन की तरह किया जा सकता है। एयर-इंक प्रयोग को लंदन के म्यूजियम ऑफ राइटिंग में भी जगह दी गई है।

फंडिंग

अनिरुद्ध बताते हैं कि उनकी कंपनी को कभी निवेश की चुनौती से नहीं जूझना पड़ा। उनकी कंपनी को सहायक कॉर्पोरेट इकाईयों से फंडिंग मिल जाती है। पहले ही साल में कंपनी के रेवेन्यू का आंकड़ा 1.2 मिलियन डॉलर्स तक पहुंच गया। शुरूआती कैंपेन के जरिए ग्रैविकी ने 40,000 डॉलर्स तक का फंड इकट्ठा किया, जो अपेक्षित फंड से लगभग 4 गुना ज्यादा था।

विज्ञान और कला का अनूठा मेल

ग्रैविकी लैब्स ने कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ करार किया है कि वे पर्यावरण के बारे में उनका संदेश पूरी दुनिया में फैलाएं। 2016 में कंपनी ने टाइगर बियर और हेनिकेन ग्लोबल के साथ मिलकर एक पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया। इस प्रोजेक्ट के लिए हॉन्ग-कॉन्ग के 7 कलाकारों के साथ करार किया गया। प्रोजेक्ट के तहत 150 लीटर एयर-इंक से पूरे शहर की दीवारों पर चित्रकारी की गई और पर्यावरण प्रदूषण के बारे में जागरूकता फैलाई गई। इस मुहिम का विडियो भी बनाया गया, जो काफी वायरल हुआ और 10 दिनों में ही विडियो को 2.5 मिलियन बार देखा गया।

अनिरुद्ध ने बताया कि कलाकार इस नए उत्पाद के साथ प्रयोग करना चाहते हैं और एक नया समुदाय बनाना चाहते हैं। ग्रैविकी, सिर्फ बेंगलुरु और दिल्ली में ही नहीं बल्कि न्यूयॉर्क, लंदन, बर्लिन, शिकागो, सिडनी, सिंगापुर और ऐम्सडैम में अपने ऑपरेशन्स पर काम कर रहा है। ग्रैविकी टीम, राजधानी दिल्ली में अलग-अलग फेज में अपना पायलट प्रोजेक्ट लागू करना चाहती है और वह इस पर खास काम कर रही है। कॉर्पोरेट और सरकारी इकाईयों की मदद से कंपनी हर विधानसभा क्षेत्र में 1,000 कैप्चर यूनिट्स लगाने की योजना बना रही है।

यह भी पढ़ें: युवाओं के स्टार्टअप का सार्थक प्रयास, अब रोबोट से होगी सीवर की सफाई

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