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भारत के अधिकतर शहरों की हवाएं जहरीली, ग्रीनपीस की रिपोर्ट में सुझाए गए सुधार के रास्ते

14th Feb 2018
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ग्रीनपीस इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 'एयरपोक्लिपस' का दूसरा संस्करण जारी किया। इस रिपोर्ट में 280 शहरों के एक साल में पीएम10 के औसत स्तर का विश्लेषण किया गया है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


 रिपोर्ट में यह सामने आया है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर गंगा के मैदानी इलाके में हैं। हालांकि दक्षिण भारत के शहरों में भी एक तय समय सीमा के भीतर योजना बनाकर वायु गुणवत्ता को राष्ट्रीय मानक के अंदर लाने की जरुरत है।

इस बार की सर्दी में दिल्ली की हालत तो सबको याद ही होगी जब वहां के लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया था। लेकिन ये हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है। भारत के सभी बड़े प्रमुख शहरों की हालत लगभग एक सी है। इस बात की पुष्टि हाल ही में जारी ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट में हुई। ग्रीनपीस इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 'एयरपोक्लिपस' का दूसरा संस्करण जारी किया। इस रिपोर्ट में 280 शहरों के एक साल में पीएम10 के औसत स्तर का विश्लेषण किया गया है। इन शहरों में देश की 63 करोड़ आबादी (करीब 53 प्रतिशत जनसंख्या) रहती है। बाकी 47 प्रतिशत (58 करोड़ ) आबादी ऐसे क्षेत्र में रहती है जहां की वायु गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं ।

इन 63 करोड़ में से 55 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय मानक से कहीं अधिक है। वहीं इसमें से 18 करोड़ लोग केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा तय सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से दोगुने ज्यादा प्रदूषण स्तर वाले इलाके में रहते हैं। रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 4 करोड़ 70 लाख बच्चे जो पांच साल से कम उम्र के हैं, ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां सीपीसीबी द्वारा तय मानक से पीएम10 का स्तर अधिक है, जिसमें1 करोड़ 70 लाख वे बच्चे भी शामिल हैं जोकि मानक से दोगुने पीएम10 स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते हैं। सबसे ज्यादा बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में वायु प्रदूषण से प्रभावित हैं। इन राज्यों में लगभग 1 करोड़ 29 लाख बच्चे रह रहे हैं जो पांच साल से कम उम्र के हैं और प्रदूषित हवा की चपेट में हैं।

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, "भारत में कुल जनसंख्या के सिर्फ 16 प्रतिशत लोगों को वायु गुणवत्ता का रियल टाइम (उसी समय) आंकड़ा उपलब्ध है। यह दिखाता है कि हम वायु प्रदूषण जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिये कितने असंवेदनशील हैं। यहां तक कि जिन 300 शहरों में वायु गुणवत्ता के आंकड़े मैन्यूअल रूप से एकत्र किये जाते हैं वहां भी आम जनता को वह आसानी से उपलब्ध नहीं है।"

अगर औसत पीएम 10 स्तर के आधार पर रैंकिग को देखें तो पता चलता है कि साल 2016 में दिल्ली 290 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के साथ शीर्ष पर बना हुआ है। वहीं फरीदाबाद, भिवाड़ी, पटना क्रमशः 272, 262 और 261 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के साथ दिल्ली से थोड़ा ही पीछे हैं। आश्चर्य की बात है कि देहरादुन, उत्तराखंड भी शीर्ष दस की सूची में है, जहां औसत पीएम 10, 238 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा है। 2016 में सूची में शामिल 280 शहरों में शीर्ष 20 शहरों का औसत वार्षित पीएम 10 स्तर 290 से 195 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा है। रिपोर्ट में यह सामने आया कि इनमें से एक भी शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता मानक (20 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को पूरा नहीं करते। इतना ही नहीं 80 प्रतिशत भारतीय शहर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते।

सुनील का कहना है, 'दिल्ली वायु प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित शहर बना हुआ है, जहां का औसत पीएम10 स्तर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से पांच गुना अधिक है। सिर्फ 20 प्रतिशत भारतीय शहरों का राष्ट्रीय और सीपीसीबी के मानकों पर खरा उतरना यह बताता है कि इस समस्या से निपटने के लिये तय समय सीमा के भीतर एक ठोस व कठोर कार्ययोजना का अभाव है।' रिपोर्ट में यह सामने आया है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर गंगा के मैदानी इलाके में हैं। हालांकि दक्षिण भारत के शहरों में भी एक तय समय सीमा के भीतर योजना बनाकर वायु गुणवत्ता को राष्ट्रीय मानक के अंदर लाने की जरुरत है।

पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य सभा में हाल ही में राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम बनाने की घोषणा की थी। इस कार्यक्रम को व्यापक, व्यवस्थागत और तय समय-सीमा के भीतर जिम्मेवारी तय करके ही सफल बनाया जा सकता है। इस कार्यक्रम को सार्वजनिक करने की जरुरत है, जिससे इसे जमीन पर उतारा जा सके और उसमें आम आदमी भी अपनी भागीदारी निभा सके। इस कार्यक्रम को हर राज्य सरकार और शहर के स्तर पर विभिन्न प्रदूषण के कारणों की पहचान करके उसका समाधान निकाला जा सकता है।

रिपोर्ट में सुझाये रास्तेः

1- पूरे देश में वायु गुणवत्ता की निगरानी की व्यवस्था करना।

2- वायु गुणवत्ता से जुड़े सभी डाटा को वास्तविक समय (रियल टाइम) में सार्वजनिक करना।

3- लोगों को एहतियात बरतने और फैक्ट्रियों में कम उत्सर्जन के लिये, खराब हवा वाले दिन स्वास्थ्य सलाह और रेड अलर्ट जारी करना।

4- जब भी मानकों से अधिक वायु प्रदूषण का स्तर पहुंचे तो स्कूलों को बंद करना, ट्रैफिक कम करना, पावर प्लांट और उद्योगों आदि को बंद रखने जैसे कदम खुद ब खुद उठाए जाने के लिए तैयार रहना।

5- जेनरेटर और वाहनों से निकलने वाले जिवाश्म ईंधन के धुएँ को कम करने के लिये उपाय। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने को प्राथमिकता देना और वाटर पंप सेट् को डीजल की बजाय सोलर ऊर्जा से संचालित करने के लिए जोर देना।

6- वायु प्रदूषण फैलानेवाली गाड़ियों को सड़क से हटाना। उच्च गुणवत्ता वाले इंधन (भारत स्टेज-6) को प्रयोग में लाना।

7- थर्मल पावर प्लांट और उद्योगों पर कठोर उत्सर्जन मानकों को लागू करना होगा।

8- अक्षय ऊर्जा के स्रोतों को बढ़ावा देना तथा छत पर सोलर लगाने को प्रोत्साहित करना

9- ई-वाहनों का इस्तेमाल को बढ़ावा देना

10- रोड से धूल हटाने तथा पेव्मेंट्स को हरी घास एवं पेड़ों से ढकने के साथ साथ निर्माण कार्यों से निकलने वाले प्रदूषण को कम करना।

11- कचरा जलाने पर प्रतिबंध

12- खेतों में जिवाश्म ईंधन को जलाने से दूर हटने के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश करना होगा

इन सभी बिंदुओं को समाहित करने वाला महत्वाकांक्षी व व्यवस्थित राष्ट्रीय/क्षेत्रीय कार्ययोजना बनाने की जरुरत है जिसमें स्पष्ट लक्ष्य, तय समय-सीमा, वायु प्रदूषण के सभी कारकों और लोगों के स्वास्थ्य के प्रति विभागों एवं सरकारी तंत्र की ज़िम्मेदारी तय हो, जिसका अनुपालन कठोर तरीक़े से किया जा सके।

यह भी पढ़ें: सरकारी स्कूल में आदिवासी बच्चों के ड्रॉपआउट की समस्या को दूर कर रहा है ये कलेक्टर

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