एडवेंचर ट्रैवेलिंग का सपना पूरा करने के लिए इस इंजीनियर लड़की ने छोड़ दी महंगी सैलरी वाली नौकरी

मेधावी दावड़ा टीसीएस, आईबीएम, इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों में अच्छे पदों पर कर चुकी हैं काम, लेकिन शौक का नशा ऐसा कि सॉफ्टवेयर की दुनिया रास न आई...
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घूमने के लिए जो जरूरत सबसे पहले आन पड़ती है, वो है पैसा। लेकिन अगर आपके अंदर घुमक्कड़ी का जबरदस्त वाला कीड़ा है तो आप सब कुछ छोड़-छाड़कर घूमने निकल पड़ते हैं। ऐसा ही एक नाम है मेधावी दावड़ा का। उन्हें ट्रेकिंग, स्कूबा डाइविंग जैसी रोमांचक गतिविधियों में खासी रुचि है।

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मेधावी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थीं। अपने तकरीबन 10 साल के करियर में टीसीएस, आईबीएम, इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों में अच्छे पदों पर काम कर चुकी हैं।

मेधावी अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्कूबा डाइविंग करने गई थीं, लौटकर आईं तो ऐसी धुन चढ़ी कि अपनी प्रतिष्ठित नौकरी को त्याग दिया। उन्होंने अपने सामान दान कर दिए, अपनी कार उठाई उसमें अपनी बैडमिंटन किट, नहाने-धोने का सामान, कुछ कपड़े रखे और निकल पड़ीं घूमने।

घूमना एक ऐसी चीज है, जो दुनिया के तकरीबन हर इंसान की विशलिस्ट में टॉप पर होती है। सोशल मीडिया पर घुमक्कड़ी की पोस्ट्स पर आने वाले भरपूर हिट्स इस बात की तस्दीक करते हैं। 'अगर घूमना मुफ्त में हो सकता तो मैं आज ही बैग पैक करके निकल जाता दुनिया देखने', इस तरह के पोस्ट्स हम सबने कभी न कभी शेयर जरूर किए होंगे। घूम सकने के लिए जो जरूरत सबसे पहले आन पड़ती है, वो है पैसा। लेकिन अगर आपके अंदर घुमक्कड़ी का जबरदस्त वाला कीड़ा है तो आप सब कुछ छोड़-छाड़कर घूमने निकल पड़ते हैं। ऐसा ही एक नाम है मेधावी दावड़ा का। उन्हें ट्रेकिंग, स्कूबा डाइविंग जैसी रोमांचक गतिविधियों में खासी रुचि है।

मेधावी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थीं। अपने तकरीबन 10 साल के करियर में टीसीएस, आईबीएम, इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों में अच्छे पदों पर काम कर चुकी हैं। मेधावी अंडमान निकोबार द्वीप समूह में स्कूबा डाइविंग करने गई थीं, लौटकर आईं तो ऐसी धुन चढ़ी कि अपनी प्रतिष्ठित नौकरी को त्याग दिया। उन्होंने अपने सामान दान कर दिए, अपनी कार उठाई उसमें अपनी बैडमिंटन किट, नहाने-धोने का सामान, कुछ कपड़े रखे और निकल पड़ीं घूमने।

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योरस्टोरी से बातचीत में मेधावी ने बताया, मैंने हिमालयन ट्रेकिंग की शुरूआत सोलह साल की उम्र में की थी, जो WWF एक्टिविटी का हिस्सा था हमारे शहर में। वो पहली बार था जब मैं टेंट में रही, बर्फीले पानी से नहाई, 14500 फीट की ऊंचाई पर ब्रीघू झील तक ट्रेकिंग की। दरअसल मैं खुद को मापना चाहती थी कि ऊंचाईयों पर ट्रेकिंग के लिये मैं कितना तैयार हूं। ट्रेकिंग के दौरान होने वाले हर चैलेंज से मुझमें जूनून और जज़्बा बढ़ जाता था। मैं हिमालय के पहाड़ों पर वापस से ट्रेकिंग करना चाहती थी। पर परिवार और सामाजिक जरूरतों के लिये सॉफ्टेवयर इंजीनियर बन गई। पर ट्रेकिंग की चाहत इतनी भरी थी अंदर की कुछ सालों बाद वापसी की, और हिमालय की गोद में पहुंच गई। अब मैंने स्कूबा डाइविंग भी शुरू कर दी और लिस्ट में नई-नई जगहों को चुनने लगी। अब तक मुझे नहीं पता था कि मैं एडवेंचर ट्रैवल का आदी हो जाउंगी।

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जितना पढ़ने-सुनने में आसान लग रहा है उतना ही मेधावी के लिए नौकरी छोड़ घूमने का निर्णय लेना बहुत मुश्किल था। स्कूल के दिनों में वो बैडमिंटन खेला करती थी। स्टेट लेवल और नेशनल लेवल पर खेलने के बाद उसी में करियर भी बनाना चाहती थीं, पर परिवार वालों ने उनकी छोटी उम्र को देखते हुए बैडमिंटन से दूरी बनाने की सलाह दी और पढ़ाई पूरी करने के लिये जोर दिया। बैडमिंटन से उनकी दूरी उन्हें डिप्रेशन की ओर ले गई। मेधावी ने इस बात का जिक्र टेड एक्स टॉक शो पर भी किया। वहां उन्होंने बताया, 'मैं सबकी चाहतों के मुताबिक पढ़ती गई, इंजीनियर बनी, नौकर की लेकिन मेरा दिल बैडमिंटन पर ही अटका रहता था। कुछ नया, अपने मन का करने पर शरीर में झुरझुरी होती है, मैं उसी के लिए जीती हूं। जब बैडमिंटन मुझसे दूर चला गया तो खुद को जीवंत रखने के लिए मैं एडवेंचर पर ध्यान देने लगी।'

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खुद को रोकते, समझाते तकरीबन 10 साल उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर काट दिया। उन्होंने सबके साथ चलने की कोशिश भी की, पर ट्रेकिंग की चाहत से वो दूर नहीं हो पाईं। मेधावी ने योरस्टोरी को बताया, तब तक मेरे बर्दाश्त की शक्ति खत्म हो गई थी और मैंने बिना कुछ सोचे नौकरी छोड़ दी। क्या करना है, कैसे करना है, कुछ पता नहीं था। बस इतना मालूम था कि एफडी के पैसे हैं बैंक में। इतने सालों की कमाई में मैंने अपना हर शौक पूरा किया था। हर सुविधा, डांस, स्पोर्ट्स, एडवेंचर, लक्ज़री को अपनी सैलेरी से खरीदा था मैंने, वो भी 22 साल की उम्र से ही। इस बार मेरे मां-पिताजी के अलावा मेरे रिश्तेदारों ने मेरे इस्तीफे की बात सुनकर मेरा साथ दिया। क्योंकि बचपन से ही मुझे हर चीज में अग्रणी देखकर सबका भरोसा था मुझपर। रिश्तेदार तो अपने बच्चों को मेरी तरह बनने की बात कहते थे। स्कूल में टॉपर होने के साथ ही परिवार की पहली इंजीनियर थी मैं। तो अब जब मैंने नौकरी छोड़ दी, तो भी उनका भरोसा कायम था कि मैं जो भी करूंगी बड़ा करूंगी और उसमें सफल रहूंगी। इस भरोसे से मुझे ताकत मिली।

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कुछ साल और बीत गए और मेधावी को पता नहीं था कि वो ऐसा क्या करें कि अब पैसे भी कमा पाएं और उनकी चाहतें भी पूरी हो सकें। तभी किसी ने उन्हें ट्रैवेल राइटिंग, ब्लॉगिंग और कंसल्टेंसी कर फ्रीलैंस करने की बात कही। बैंक में कुछ पैसे अभी बचे थे पर फिर आगे की ज़रूरतों को पूरा करने के ख्याल से उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। लेकिन इसी बीच नए ट्रैवेल ब्लॉगर्स के लिए उनकी ये सलाह भी बड़ी मायने रखती है, वो कहती हैं, मेरे हिसाब से सिर्फ पैसे कमाने के लिये, या लिखने के लिये घूमना, या घूमने की वजह से लिखना, बेमतलब है। आपको तभी लिखना चाहिये, जब आपका दिल चाहे। इंटरनेट पर कई ऐसे आर्टिक्ल्स हैं जो आपको कहेंगी कि नौकरी छोड़कर ब्लॉगिंग और फ्रीलैंसिंग से मनचाहा पैसे कमाइये, पर मेरे हिसाब से ये आपको भटकाती हैं। आप तभी करें जब आपके अंदर ट्रैवल और टूर को लेकर पैशन हो ।

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मेधावी की पैसा कमाने वाली तलाश भी पूरी हो गई, तीन साल पहले उन्होंने कॉक्स एंड किंग्स ने स्पॉन्सर्ड ट्रिप्स के लिये ट्रैवल एंडवेंचरर्स की तलाश शुरू की। मेधावी बताती हैं, मेरे दोस्तों के बताने और ज़िद करने पर मैंने अपनी ट्रैवल स्टोरी लिखनी शुरू की ताकि मैं वो कॉम्पीटिशन जीत जाऊं। पर आखिरी राउंड में पिछड़ गई। इस बात ने मुझे खास परेशान नहीं किया। पर ट्रैवल राइटिंग में मुझे मज़ा आने लगा। क्योंकि मैं पहले ही घूम चुकी थी, मेरे पास बहुत सी बातें थीं बताने के लिये, लोगों को मेरे आर्टिकल्स पसंद आने लगे। अब मेरी पहचान इस फील्ड में बनने लगी। आज 3 साल के बाद का वक्त है कॉक्स एंड किंग्स ने मुझसे संपर्क किया इमेल के ज़रिये, और एक एडवेंचर ट्रिप में मुझे हेड नियुक्त किया। अपनी सेफ्टी का खुद ख्याल रखते हुए, कभी कुछ ज्यादा पैसे खर्च करते हुए कई देशों और ट्रिप्स पर मैं जा चुकी हूं। सोलो ट्रैवलिंग मुझे खास पसंद है, पर इस दौरान परिवार और दोस्तों को मेरी हर जानकारी से दुरुस्त रखती हूं।

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मेधावी की रोमांचक यात्राएं आप उनके ब्लॉग www.ravenouslegs.com पर भी पढ़ सकते हैं। मेधावी की सपनों की उड़ान सिखाती है कि अगर आपके भी सपने हैं तो उनमें रंग भरने की तो कोशिश एक बार जरूर करें। जरूरी नहीं कि सपने बड़े हों पर जज्बा बड़ा होना चाहिये। आप देखेंगे फिर ज़िंदगी उससे हसीन हो ही नहीं सकती। अपनी खुशियों के लिये हम खुद जिम्मेदार हैं। क्योंकि खुशियां हमें कहीं से मिल नहीं जातीं, खुशियां पाने के मौके हम खुद बनाते हैं। 

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