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स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट की मदद से रायपुर की 108 साल पुरानी लाइब्रेरी को मिला नया जीवन

विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष...

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23rd Apr 2018
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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

आज विश्व पुस्तक दिवस है, यानी किताबों का उत्सव। यह लेखकों का उत्सव है, पढ़ने वालों का उत्सव है। इस उत्सव के मौके पर हम आपको भारत की 108 साल पुरानी उस लाइब्रेरी से रूबरू करवा रहे हैं, जिसे स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के तहत पुनर्जीवित कर दिया गया है। यह लाइब्रेरी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में है।

आनंद समाज लाइब्रेरी

आनंद समाज लाइब्रेरी


किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं क्योंकि वे जीवन की सच्चाई बयां करती हैं। किताबें, जो हमें हमारे इतिहास का दर्शन कराती हैं, साथ ही हमें हमारे होने का भी अहसास दिलाती हैं। किताबों को चाहने वाले जब किसी लाइब्रेरी में बैठते हैं तो उन्हें दिन का रात में ढल जाने का अहसास ही नहीं होता।

किताबें करती हैं बातें बीते जमानों की, दुनिया की, इंसानों की, आज की कल की, एक-एक पल की। सफदर हाश्मी द्वारा लिखित ये पंक्तियां हमें बताती हैं कि किताबें किसी भी इंसान के जीवन के विकास के लिए कितनी जरूरी हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में जब से हमारे हाथ में स्मार्टफोन आ गए हैं, हर कोई खुद को स्मार्ट समझने लगा है। लेकिन इसका दुखद पहलू यह है कि हम अपने आस-पास की चीजों से दूर हो गए हैं। आपस में बैठकर होने वाली बातें, समाज को बेहतर बनाने के लिए बनने वाली योजानएं अब कहां देखने को मिलती हैं। देश के कई शहरों को स्मार्ट बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन क्या शहर के लोगों को उनकी जड़ों से जोड़े बिना शहर स्मार्ट बन पाएगा?

यह वो सवाल है जिसका जवाब रायपुर स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के पास है। रायपुर में स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के तहत शहर की सबसे पुरानी आनंद समाज लाइब्रेरी का पुनरुद्धार कर एकदम नया बना दिया है। अगर आपसे 108 साल पुरानी लाइब्रेरी के बारे कल्पना करने को कहा जाए तो आपके मन में लाइब्रेरी की पुरानी बिल्डिंग, मकड़ी के जाले, काठ की लकड़ी पर रखीं धूल जमीं हुई किताबों का ख्याल आएगा। लेकिन इस लाइब्रेरी को देखकर आपके अंदर से वो सारे खयाल दूर हो जाएंगे। क्योंकि लाइब्रेरी का कायापलट हो चुका है। बिल्डिंग का ढांचा पुराना है, मगर अंदर जाने पर नयेपन का एहसास होता है।

स्मार्ट फोन, ई-बुक्स, सोशल मीडिया और किंडल के बढ़ते ट्रेंड के बीच प्रासंगिक रहने के लिए रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड (RSCL) ने समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से छेड़छाड़ किए बिना आनंद समाज लाइब्रेरी की पुरानी बिल्डिंग को एकदम से नया कर दिया है, जो अपने आप में दुर्लभ और सराहनीय कदम है। रायपुर को स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित करने के लिए कई सारी पहलें की गई हैं। लेकिन योजना बनाने वाले रणनीतिकारों का मानना था कि कोई भी शहर तब तक स्मार्ट नहीं बन सकता, जब तक कि वहां के नागरिक अपने समाज और देश में चल रही गतिविधियों के बारे में सजग न हों।

इसके लिए जरूरी था कि पढ़े-लिखे नागरिकों को अपनी जड़ों से जोड़ने और साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक अच्छी जगह बनाई जाए। तभी उनके मन में आनंद समाज लाइब्रेरी का ख्याल आया। यह वो लाइब्रेरी है जिसकी स्थापना अठारहवीं शताब्दी में हुई थी। इसकी स्थापना पांच स्वतंत्रता सेनानियों और बुद्धिजीवियों के एक समूह ने की थी जिसमें माधव राव सप्रे, वामन राव लखे, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, सुंदर लाल शर्मा और रामदास तिवारी शामिल थे। इन्होंने ही इस लाइब्रेरी को 'आनंद समाज' का नाम दिया, ताकि समाज के स्वतंत्रता आंदोलन और उत्थान के मुद्दों पर चर्चा की जा सके। यहीं बैठकर अंग्रेजों को देश से भगाने की रणनीतियां बनाई गईं। इस तरह इस लाइब्रेरी ने देश को आजाद कराने में भी अहम योगदान दिया।

बदलते वक्त के कारण लोगों का यहां आना-जाना कम हो गया और यह इमारत उपेक्षा का शिकार हो गई। फिर से लोगों को यहां लाने और इसे चर्चा के केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट की तरफ से इस पर काम किया गया। अब यह लाइब्रेरी पूरी तरह से नई हो गई है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जनवरी 2018 में इस पुनर्निर्मित बिल्डिंग का उद्घाटन किया था। रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के प्रबंध निदेशक रजत बंसल का कहना है, “शहर का स्मार्ट होना उनके ऐतिहासिक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हम आनंद समाज लाइब्रेरी को छत्तीसगढ़ का साहित्यिक केंद्र बनाना चाहते हैं।" आनंद समाज लाइब्रेरी शहर के सबसे धनी विरासत स्थलों में से एक है।

लाइब्रेरी का पिछला हिस्सा

लाइब्रेरी का पिछला हिस्सा


इस लाइब्रेरी की सबसे अच्छी बात यहां रखी दुर्लभ किताबें हैं। यहां छत्तीसगढ़ की पहली प्रकाशित पत्रिका से लेकर सूफी कवि मलिक मुहम्मद जयसी द्वारा लिखित विवादास्पद महाकाव्य 'पद्मावत' की दुर्लभ प्रतिलिपि किताब प्रेमियों के लिए संभाल कर रखी गई है। लाइब्रेरी की एक और खास बात ये भी है, कि ये पुरानी धरोहर को संभाले रहने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इसमें मुख्य काम है प्रमुख साहित्यिक कार्यों को डिजिटाइज करना।

दरअसल आज के समय में प्रासंगिक रहने के लिए रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड मध्ययुगीन काल के प्रमुख साहित्यिक कार्यों सहित 5 लाख से अधिक पुस्तकों को डिजिटाइज कर रहा है। इनमें आदिवासी इतिहास, संगीत, विरासत और रिकॉर्ड शामिल हैं।

लाइब्रेरी में किताबों की दुर्लभ प्रतियां

लाइब्रेरी में किताबों की दुर्लभ प्रतियां


पुनर्निर्मित बिल्डिंग के ऊपर की मंजिल राज्य और शहर में आयोजित सभी सांस्कृतिक और साहित्यिक त्यौहारों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। जिन साहित्यकारों को बैठक या गोष्ठियां करनी होती हैं वे इस हॉल का इस्तेमाल करते हैं। लाइब्रेरी को और ज्यादा पसंदीदा बनाने के लिए और आम जनता को आकर्षित करने के लिए स्थानीय व्यंजनों के स्वाद को चखने के लिए कैफे की भी शुरूआत की जा रही है। आने वाले समय में इसे साहित्यिक कार्यक्रमों का हब बनाने का लक्ष्य रखा गया है। ये अब उन सभी उम्र समूह के लोगों की मीटिंग का केंद्र बन चुका है जो पुस्तकों से प्यार करते हैं। कोशिश भी यही थी कि शहर के सभी बुद्धिजीवियों को एक जगह पर इकट्ठा किया जा सके।

आनंद समाज लाइब्रेरी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को वापस लाने का प्रयास कर रही है और साथ ही वास्तव में किताबों से प्यार करने वालों के लिए साहित्य को पढ़ने और चर्चा करने के लिए एक स्थान प्रदान कर रही है। यह रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के मौलिक प्रयासों में से एक है, जो यह दर्शाता है कि शहर वास्तव में तभी स्मार्ट होता है जब वह लोगों से जुड़ा रहे।

लाइब्रेरी का वो हिस्सा जहां आयोजित होते हैं साहित्यिक कार्यक्रम

लाइब्रेरी का वो हिस्सा जहां आयोजित होते हैं साहित्यिक कार्यक्रम


किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं क्योंकि वे जीवन की सच्चाई बयां करती हैं। किताबें, जो हमें हमारे इतिहास का दर्शन कराती हैं, साथ ही हमें हमारे होने का भी अहसास दिलाती हैं। किताबों को चाहने वाले जब किसी लाइब्रेरी में बैठते हैं तो उन्हें दिन का रात में ढल जाने का अहसास ही नहीं होता। जॉन पलफ्रे ने अपनी किताब 'बाइबलियो टेक' में लिखा है कि "आज की लाइब्रेरी पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सिर्फ किताबों का खजाना न होकर लाइब्रेरी हमारी उम्र की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों के खिलाफ तालमेल बना सकती हैं।"

देश में कई लाइब्रेरीज़ हैं, जिनमें या तो किताबें नहीं हैं या फिर उन्हें पढ़ने वाले लोग। लेकिन 'आनंद समाज वाचनालय' जैसी लाइब्रेरीज़ भी हैं, जो 108 वर्ष से न सिर्फ पुरानी साहित्यिक विरासत को संभाले हुए हैं बल्कि लोगों को अपनी ओर खींच भी रही है।

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड की मशरूम गर्ल ने खोला 'औषधि' चाय वाला रेस्टोरेंट, तैयार की 1.2 करोड़ की 'कीड़ाजड़ी'

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