सोमालिया की मदर टेरेसा डॉ. हावा आबिदी

By Prakash Bhushan Singh
July 03, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
सोमालिया की मदर टेरेसा डॉ. हावा आबिदी
सोमालिया के युद्ध शरणार्थियों को स्वास्थ्य सेवाएँ देने के लिए बनाया "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन"..."डॉ हावा आबिदी को 2012 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया....फिलहाल "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" 90,000 से भी ज्यादा शरणार्थियों का घर है...संस्था ने अभी तक 20 लाख लोगोँ की सहायता की है
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सोमालिया की बात करते ही हमारे मन में गृहयुद्ध, अकाल, सूखा और समुद्री डाकूओं से भरे एक देश की छवि आती है.लेकिन इन सब के बीच वहां एक महिला है जो अपने परिवार के साथ मिलकर सोमालिया के युद्ध शरणार्थियों को स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए बहुत मेहनत से लगी हुई हैं. मिलिए डॉ हावा आबिदी से. डॉ आबिदी को लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैय्या करने के लिए सन 2012 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था. डॉ आबिदी "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" की संस्थापक हैं जिसका सञ्चालन डॉ आबिदी और उनकी दो पुत्रियों, डॉ डेको आदान और डॉ अमीना आदान के द्वारा किया जाता है। डॉ डेको आदान इस प्रतिष्ठान की मुख्य कार्यकारी भी हैं. फिलहाल "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" 90,000 से भी ज्यादा शरणार्थियों का घर है. इस संस्था में सन 2012 तक 102 बहुराष्ट्रीय कर्मचारी थे. इसके अतिरिक्त 150 सदस्यी टीम में स्वयंसेवक, मछुवारे और किसान शामिल है. "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" ने अपनी स्थापना से अभी तक 20 लाख लोगोँ की सहायता की है।

अपनी बेटियों के साथ डॉ हावा आबिदी

अपनी बेटियों के साथ डॉ हावा आबिदी


डॉ हावा आबिदी ने अपना सफर सन 1983 में "रूरल हेल्थ डेवलपमेंट फाउंडेशन" जो की अब "डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" के नाम से जाना जाता है, से शुरू किया था। इसकी शुरुआत एक कमरे में एक क्लीनिक से हुई थी। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत सी महिलाएं आसान इलाज से ठीक हो जाने वाली बीमारियों से मर रही थी। और इन स्त्रियों में डॉ आबिदी की माँ भी शामिल थी। जब डॉ आबिदीका 12 साल की थी तभी उनकी माँ का देहांत प्रसूति सम्बन्धी जटिलताओं के कारण हो गया। जबकि सही दवा और प्रक्रिया के द्वारा इस बीमारी का इलाज बहुत मुश्किल नहीं था। माँ की मौत ने उन्हें डॉक्टर बनने की प्रेरणा दी और डॉक्टरी की पढाई पूरी करके वो पुनः ग्रामीण समुदाय में उन औरतों की सेवा में लौट आयीं। लेकिन अन्य सामाजिक पहल की तरह ही डॉ आबिदी को भी समाज में अपनी स्वीकार्यता बनाने के लिए अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने जब अपने प्रतिष्ठान की शुरुआत की तब भी लोगों में बहुत तरह का संशय था, और लोग इनसे इलाज करवाने से डरते थे। लेकिन उन्होंने जैसे जैसे एक एक कर लोगोँ का इलाज करना शुरू किया तब लोगों ने देखा कि इनका इलाज वास्तव में प्रभावी है और लोग उनके इलाज से ठीक हो रहे हैं। और तब धीरे धीरे लोगों में इनके प्रति विश्वास पैदा हुआ। और समय के साथ ही डॉ आबिदी ने लोगोँ का विश्वास और आदर हासिल कर लिया। "उस समय सबसे बड़ी चुनौती लोगों का विश्वास हासिल कर पाना ही थी। और मुझे लगता है मेरी माँ ने यह लोगों के प्रति आदर और पारम्परिक चिकित्सा पद्धति के प्रति सम्मान प्रदर्शित कर के हासिल किया। लोगों को नई चिकित्सा पद्धति का प्रभावशाली परिणाम दिखा कर भी उन्होंने उन लोगों का दिल जीत लिया जिनकी वो सेवा करना चाहती थी। इस में समय लगता है, लेकिन धैर्य से आप एक ऐसा रिश्ता बना लेते हैं जिसे भूल पाना आसान नहीं होता।" डॉ डेको याद दिलाती हैं।

सोमलिया के संबंध में प्रचलित मान्यताओं को तोड़ते हुए और अपने बचपन के बारे में बताते हुए डॉ डेको कहती हैं-"जब मैं एक छोटी सी लड़की थी, मैं अपनी माँ के साथ गाँव-गाँव जाया करती थी और पट्टी बांधने या रिकॉर्ड रखने जैसे कामों में अपनी माँ की मदद किया करती थी। मैं इन एक एक पलों से प्यार करती थी। किसी की मदद करना और उनके चेहरे पर मुस्कान मुझे बहुत ख़ुशी देते थे। बड़े होने के साथ साथ ही दूसरों की सहायता करना मेरा स्वाभाव बन गया। सोमाली लोग बहुत ही गर्मजोश और मेहमाननवाज लोग हैं। आपको अपने घर में बुलाएँगे आपको चाय पेश करेंगे और पूरा दिन आप से गप्पें मारेंगें। यहाँ पूरा गाँव एक समुदाय है और मैं अपनी माँ के साथ जहाँ कहीं भी जाती मेरी माँ का स्वागत पूरी गर्मजोशी से होता।"

"डॉ हावा आबिदी फाउंडेशन'" में माहौल बहुत ही प्रगतिशील और युवाओं द्वारा संचालित हैं। डॉ हावा सोमालिया की शुरू की कुछ प्रसूतिशास्री डॉक्टरों में से एक है। ये उस ज़माने की है जब औरतों से कहा जाता था की वो घर पर रहें और बच्चो की देखभाल करें। यहाँ ज्यादातर लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। और हम किसी भी नए विचार का स्वागत करते हैं।" मैं और मेरी बहन डॉ अमीना, हम दोनों का अपनी माँ के कार्यों पर दृढ़ विश्वास है और हम दोनों उनके पद-चिन्हों पर ही चलते हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने में लगे हैं। हमारी माँ ने सोमाली भाई बहनो की सेवा में अपनी पूरी उम्र लगा दी। और हम हजारों लोगों की जिंदगी बचाने की उनकी प्रतिबद्धता देखते हुए बड़े हुए। और इसी बात ने हमें उनके द्वारा शुरू किये गए इस अद्भुत कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।" डॉ डेको गर्व से बताती हैं। पूछने पर की क्या है जो उन्हें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता है, डॉ डेको कहती हैं-" मुझे अपने काम से प्यार है, जिंदगी बचा पाने की योग्यता के कारण, मैं किसी माँ को पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेने की ख़ुशी देखती हूँ यह वास्तव में अद्भुत है। ये वो क्षण है जो मेरे काम को सार्थक बना देते हैं। मैं यह भी जानती हूँ कि मेरे तथा मेरी पूरी मेडिकल टीम के बिना इस सर्वाधिक जोखिमग्रस्त आबादी को किसी भी प्रकार के इलाज की सुविधा नहीं मिल पाएगी। ३१ किमी के क्षेत्र में हमारा अस्पताल ही मुफ्त चिकित्सा सेवा प्रदान करता है। दो दशकों तक जब कि गृहयुद्ध की ज्वाला भड़कती रही थी, सिर्फ मैं मेरी माँ और मेरी बहन, मात्र हम तीन डॉक्टर ही एक एक दिन में 300 मरीज देखा करते थे। ऐसा अनगिनत बार हुआ जब आपातकालीन मामलों को देखने कि लिए मुझे 3 बजे उठना पड़ा, लेकिन आप जानते हो कि लोगों को आपकी जरूरत है।" ये बताते हुए उनके चेहरे पर एक संतोष का भाव है।

सामाजिक क्षेत्र में उद्यमियों के लिए सबक के बारे में बताते हुए डॉ डेको तीन बातें बताती हैं।

- कोई भी व्यक्ति जब सामाजिक क्षेत्र में कुछ शुरुआत करना चाहता है तो उसे अपने काम से प्यार और काम कि प्रति एक जूनून होना चाहिए। तब मैं यह सलाह दूँगी की आप स्थानीय स्तर पर जरूरतें क्या हैं इसकी पहचान करें। फिर पहले से ही क्या सेवाएं या सुविधाएं उपलब्ध हैं, यह जाने। और फिर क्या अंतराल है यह समझना चाहिए। बहुत सारे अन्य संगठन पहले से ही बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि किसी संस्था को शून्य से शुरू करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि काम कर रहे संगठन के साथ सहभागिता करना ज्यादा अच्छा होगा।

- दूसरे, आपको स्थानीय लोगों का सम्मान करना होगा। आप जिनकी सेवा करना चाहते है वो अत्यंत नम्य और समझदार लोग हैं। हम जो सेवाएं हावा आबिदी गाँव में देते हैं उसे लेने महिलाएं और बच्चे दूर दूर से चल कर आते हैं, वो सबसे मजबूत लोग हैं। मैं ऐसे लोगों से मिली हूँ जिन्होंने सबसे मुश्किल समय में भी झुकने से इनकार कर दिया

- अंत में, आपको अपने दृष्टिकोण में लचीला होना चाहिए। हर समय नए विचार प्रस्फुटित होते रहते हैं और पुराने विचारों को नाकारा जाता है। आपको नए तरीकों और स्थितियों के लिए खुला और लचीला होना चाहिए, हम आज जिस गतिशील दुनिया में रह रहे है वहां प्रौद्योगिकी तेजी से विकसित हो रही है और विचार सीमाओं के पार फैल रहे हैं,। यह भी चुनौतियों में से एक हैं, लेकिन यह एक अवसर भी है, जिसे से कि आपको अपने कार्य कलापों को बेहतर करने में मदद मिल सकती।

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