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कर्नाटक में बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से हो रहा है और शहरीकरण बढ़ता जा रहा है

Pooja Goel
4th Feb 2016
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टीम वाईएसहिंदी

अनुवादकः पूजा


इन्वेस्ट कर्नाटक 2016 शिखर सम्मेलन में शामिल सरकारी और उद्योग जगत जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि बैंगलूरु की आबादी जो वर्ष 1971 में 1.65 मिलियन थी बढ़कर वर्ष 2001 में 5 मिलियन और वर्ष 2011 में 11 मिलियन हो गई और उम्मीद है कि वर्ष 2030 तक यह बढ़कर 14 मिलियन के आंकड़े को पार कर जाएगी।

बैंगलूरु जैसे भारतीय शहरों के लिये शहरी बुनियादी ढांचे का नियोजन और क्रियान्वयन करना प्रमुख चुनौतियों में से एक रहेगा जिसके लिये बड़े पैमाने पर व्यापक सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता होगी। कर्नाटक सरकार के एसीएस, यूडीडी टीएम विजय भास्कर के अनुसार कर्नाटक के पास बैंगलोर और दूसरे शहरों के विकास के लिये करीब 90 हजार करोड़ की 44 परियोजनाएं हैं।

बैंगलोर विकास मंत्री के.जे. जाॅर्ज कहते हैं, ‘‘बैंगलूरु के लिये एलिवेटिड रोडवेज सहित फ्लाईओवर और अंडरपास की करीब 20 हजार की परियोजनाएं हैं और साथ ही उपनगरीय रेलवे परियोजनाओं के लिये अतिरिक्त 9 हजार करोड़ रुपये का प्रावधन किया गया है।

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दुनियाभर की नजरें

सीएच2एम इंजीनियरिंग सर्विसेस के उपाध्यक्ष विनोद सिंह ने बैंगलूरु के योजनाकारों से सर्वमान्य रूप से एशिया के सबसे अधिक प्लैन्ड और कामयाब मानेजाने वाले शहर सिंगापुर के उदाहरण से कुछ सीखने का आग्रह किया। बैंगलूरु में परियोजना के संचालन और रखरखाव के लिये बजट का मात्र आठ प्रतिशत ही आवंटित किया जाता है सिंगापुर में तुलनात्मक रूप से यहीं आंकड़ा 20 प्रतिशत से भी अधिक होता है।

सिंगापुर में शहरी नियोजन एक दूरगामी और समग्र कार्यक्रम होने के अलावा पारदर्शिता, व्यवसायिकता और भ्रष्टाचार से मुक्त होता है। इस बात के पूरे प्रयास किये जाते हैं कि सड़क के विकास के समय ही फुटपाथ और विकलांगों के लिये रास्ते निर्मित करन के अलावा अतिरिक्त पानी के बहने के लिये नालियों का निर्माण भी किया जाए। इसके अलावा पीने के पानी का अपव्यय रोकने के लिये भी एक सटीक निनगरानी तंत्र का उपयोग किया जाता है।

इसके अलावा विदेशों में होने वाले स्मार्ट मीटरिंग और ट्रेकिंग भी अनुकरण करने योग्य उदाहरण हैं। वोडाफोन इंडिया के सीटीओ सतीश मित्तल ने कहा, ‘‘वोडाफोन ने न्यूज़ीलैंड में स्मार्ट पार्किंग और कोरिया में इंटेलिजेंट डस्टबिन्स को अपनाया और लागू किया है।’’

भारत के अन्य हिस्सों के मामलों का एक अध्ययन

वियाोलिया के महाप्रबंधक एम.जे.आर. चैधरी ने कहा, ‘‘नागपुर जैसे शहरों ने प्रभावीी जल प्रवाह और प्रबंधन समाधान को सफलतापूर्वक लागू किया है। इस प्रकार की व्यवस्था एक जोखिम आधारित प्रबंध पर टिकी होती है जो भारत जैसे देश में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जहां शहरीकरण तेजी से वृद्धि कर रहा है और पानी की आपूर्ति अनियमित है।’’

आईएलएफएस ने बुराड़ी में एक प्रभावी ठोस कचरा प्रबंधन कार्यक्रम प्रारंभ करने के अलावा गाजीपुर में कचरे से ऊर्जा रूपांतरण परियोजना का प्रारंभ किया है। बुराड़ी में 2 मिलियन टनन कचरे को संससाधित करके सड़क निर्माण सामग्री में तब्दील किया जा चुका है। इसके अलावा गाजीपुर में सिर्फ कचरे से बिजली के 2 मिलियन किलोवाट घंटों का उत्पादन किया जा चुका है। इसके अलावा कचरा बीनने वाली महिलाओं को कारीगर बनने का प्रशिक्षण देने की पहल करने के साथ ही उद्यमियों को आगे आकर अपशिष्ट प्रसंस्करण को एक व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है।

स्मार्ट सिटी और आईओटी

क्रिसिल के एसोसिएट डायरेक्टर दर्शन पारिख ने कहा, ‘‘भारत के 100 स्मार्ट शहरों को 150 बिलियन डाॅलर के निवेश की आवश्यकता होगी जिसमें से 120 बिलियन डाॅलर निजी क्षेत्रसे आएगा।’’ सफल सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचों के अलावा मजबूत संस्थागत समर्थन और पर्याप्त आर्थिक सहायता किसी भी स्मार्ट शहर की सफलता को मापने के सबसे बड़े कारक होते हैं।

भारत सरकार की महत्वाकांक्षी 100 स्मार्ट शहर परियोजना के लिये कर्नाटक राज्य से दावनगेरे और बेलागारी का चुनाव 1 हजार करोड़ रुपये के निवेश के लिये किया गया है। इसमें स्मार्ट पार्किंग और पथ प्रकाश व्यवस्था के अलावा अंडरग्राउंड यूटीलिटीी डक्टिंग, पैदल चलने योग्य क्षेत्रों का चयन और नागरिक अनुकूल प्रशासन जैसी सुविधाओं की एक विस्तृत श्रंखला शामिल होगी।

केआरडीसीएल के प्रबंध निदेशक के.एस. कृष्ण रेड्डी ने कहा, ‘‘कर्नाटन सरकार ने बैंगलूरु के लिये 6 नई एलिवेटिड रोड परियोजनाओं का प्रस्ताव दिया है।’’ इनमें से दो पूर्व-पश्चिम, एक उत्तर-दक्षिण और बाकी तीन कनेक्टिंग काॅरिडोर होंगे।

उन्होंने इन प्रयासों में सार्वजनिक-निजी-नागरिक भागीदारी में इजाफा करने पर जोर दिया और साथ ही उनका कहना था कि इस प्रकार के आयोजनों में सह-निर्माण के माॅडल के काम करने के तरीके के बारे में जानने के इच्छुक नागरिक संगठनों की विस्तृत भागीदारी होते देखना एक अच्छा संकेत है

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