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मुफ्त में कपड़े डिजाइन करें और बेचें 'फ्रेशमोंक' में

15 से 15 हजार टी-शर्ट बनाने की क्षमता1 हजार से ज्यादा ग्राहक

Harish Bisht
8th Jun 2015
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सफलता के जितने भी उदाहरण सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं, उन सभी ने जिन्दगी में किसी न किस रूप में असफलता का स्वाद चखा है। प्रशांत गुलाटी और शशांक अग्रवाल दो ऐसे दोस्त हैं जिनकी शुरूआत हुई असफलता से, लेकिन वो निराश नहीं हुए बल्कि अपनी कमियों को दूर कर इस मुकाम पर पहुंचे कि आज वो औरों के लिए मिसाल बन गये हैं। प्रशांत और शशांक की मुलाकात 2013 में हुई। दोनों लोग खुले विचारों के थे और जिंदगी में कुछ हट कर करना चाहते थे। दोनों की सोच मेल खाई तो फैसला लिया कि वो एक साथ, एक काम करेंगे और वो होगा डोर बेल कम इंटरकॉम का। उनकी मेहनत और लगन इस काम को उस मुकाम तक नहीं पहुंचा पाई जहां तक ये लोग ले जाना चाहते थे।

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एक दिन शशांक और उनका दोस्त दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के कुछ हुडिज चाहते थे और जब वो इनको इकठ्ठा करने के लिए निकले तो उनको काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और यही परेशानी उनको उस रास्ते में ले गई जिस रास्ते में वो चलना चाहते थे, हटकर कुछ करना चाहते थे। अपनी दिक्कतों पर नजर दौड़ाने के बाद उनको विचार आया फ्रेशमोंक.कॉम का। ये 2 शब्दों का ऐसा नाम था जो ना सिर्फ बोलने में आसान था बल्कि सांस्कृतिक तौर पर प्रासंगिक भी था। इस नाम ने वो काम कर दिया जिसकी उम्मीद थी। आज उनका मुख्य केंद्र बिंदु दक्षिण पूर्व एशिया है

प्रशांत यूसी बर्कले, जॉर्जिया टेक के पूर्व छात्र हैं और वो अमेरिका में बैंकर भी रह चुके हैं। यहां नौकरी करने के बाद मेडिकल टूरिज्म में अपना भाग्य अजमाया लेकिन वो सफल नहीं हो सके। शशांक दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के पूर्व छात्र रह चुके हैं अपनी शुरूआत उन्होने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक प्रोडक्ट डवलपर के तौर पर की। जब दोनों की मुलाकात हुई और खूब मंथन किया तो उनके विचारों को एक मंच मिला जहां पर कोई भी व्यक्ति आकर कपड़े ना सिर्फ डिजाइन कर सकता है बल्कि उनको बेच भी सकता है। ये विचार उनको डीसीए की हुडिज इकठ्ठा करने के दौरान आया।

ऑनलाइन फ्रेशमोंक वो जगह है जहां पर कोई भी व्यक्ति कपड़े डिजाइन और बेचने के लिए आजाद है। ये उन समूह, समुदायों और फन्ड्रैज़र को मौके देता है जो तय समय में ऑनलाइन अभियान के तहत अपना लक्ष्य हासिल कर लेते हैं। जो इस चुनौती से पार पाने में कामयाब होता है फ्रेशमोंक उसके उत्पाद, वितरण और दूसरी चीजों को संभालता है और कपड़ों से मिलने वाले लाभ मालिक तक पहुंचाता है। इसके लिए अभियान चलाने वाले को एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता जब तक खरीदार टी शर्ट बनाने के लिए रकम नहीं चुका देता।

कुछ समस्याओं को हल करने की कोशिश:

अभियान चलाने वाले को निवेश करने के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती है, ये एक बड़ी बाधा होती है, जिसे हटा दिया गया है।

सिर्फ अनुमान के आधार पर विभिन्न साइज का ऑर्डर लेने की जगह खरीदार को सही नंबर और साइज की जानकारी देनी होती है।

फ्रेशमोंक भुगतान और लजिस्टिक्स मदद भी देता है। फ्रेशमोंक का दावा कि वो 15 से 15 हजार टी-शर्ट प्रतिस्पर्धी दाम और बढ़िया क्वालिटी बना सकता है।

प्रशांत के मुताबिक "एनजीओ और सामाजिक कारणों के लिए कोष जुटाने के लिए फ्रेशमोंक का इस्तेमाल कर सकते हैं और टी-शर्ट बेचकर हजारों रुपये जुटाये जा सकते हैं।" फ्रेशमोंक वहां पर काफी फायदेमंद साबित हो सकता है जहां पर मांग अनिश्चित है। फ्रेशमोंक विभिन्न उत्पादकों, स्क्रीन प्रिंटिंग का काम करने वालों लोगों और लजिस्टिक्स संगठनों के साथ काम करता है। आज के दिन में ये 15 अभियान चला रहा है और ये चार भागों में बंटा हुआ है। ऐसा समूह जिनकी इनमें रुचि है, गैर सरकारी संगठन, विश्वविद्यालय और इवेंट ग्रुप। शशांक के मुताबिक "हम इस बात को लेकर उत्साहित हैं कि हमारा विकास तेजी से हो रहा है और हम देश भर में ज्यादा से ज्यादा समुदायों के साथ जुड़ रहे हैं।" अब तक कंपनी के पास 1हजार से ज्यादा ग्राहक हैं जिनको हम अपने उत्पाद बेच चुके हैं इनमें अमेरिकन इंडियन फॉउंडेशन, बड़े ऑनलाइन समूह जैसे बीएमसी टूअरिंग, द आउटडोर जरनल आदि शामिल हैं।

पश्चिमी देशों में ये अवधारणा पहले से चल रही है और ये लोग भारत में इस मॉडल को लेकर आए हैं। लेकिन यहां गुंजाइश ना सिर्फ बहुत ज्यादा है बल्कि बहुत मजेदार भी। यहां पर तरक्की के लिए जरूरी है कि फ्रेशमोंक की और ज्यादा आक्रमक तरीके से प्रचार और मार्केटिंग की जाए। अब इस क्षेत्र में कई बड़े खिलाड़ी भी आ गए हैं जैसे "अल्मा मेटर" (ऑनलाइन टी-शर्ट में तेजी बढ़ती कंपनी) और "सोर्सईजी" (उत्पादकों को डिजाइन में मदद करती है) बिक्री में फ्रेशमोंक को मेहनत करनी पड़ रही है और उसकी कोशिश है कि देशभर में लोगों के बीच उसकी अलग पहचान बने।

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