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झूठ के रथ पर सवार इस भयानक खतरे से निपटे कौन?

13th Nov 2018
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झूठ के रथ पर सवार फ़ेक न्यूज़ का भयानक खतरा दुनिया के कई परेशान देशों की तरह भारत के भी सामाजिक-राजनीतिक वातावरण को मथ रहा है, धुन रहा है। इससे क्या राजनेता, क्या अफसर और क्या हर खासोआम, हर कोई परेशान है। इससे मीडिया-सोशल मीडिया की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ गई है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


फ़ेसबुक के भारतीय प्रतिनिधि मनीष खंडूरी का कहना है कि 'फेक न्यूज' हमारे प्लेटफार्म के अस्तित्व के लिए ही एक ख़तरा है और हम इसे बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। भारत में जो हो रहा है, उसमें मार्क ज़करबर्ग की रुचि है और उन्होंने इस मुद्दे के समाधान के लिए एक बड़ी टीम बनाई है।

दुनिया के कई अन्य प्रमुख देशों की तरह भारत में भी फ़ेक न्यूज़ का भूत सिर चढ़कर बोलने लगा है। इस बात को गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर जैसी कंपनियां भी साफ-साफ कुबूल करने लगी हैं। फ़ेसबुक के भारतीय प्रतिनिधि मनीष खंडूरी, गूगल की दक्षिण एशिया में न्यूज़लैब प्रमुख ईरीन जे ल्यू और ट्विटर की ग्लोबल हेड विजया गाड्डे, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, गुजरात के मंत्री नितिन पटेल, अभिनेत्री स्वरा भास्कर, अभिनेता प्रकाश राज, फैक्ट चेक वेबसाइट अल्टन्यूज़ के प्रतीक सिन्हा, पत्रकार रवीश कुमार, हरतोष बल, कांग्रेस पार्टी का सोशल मीडिया का कामकाज देख रही दिव्या स्पंदना, आम आदमी पार्टी से जुड़े अंकित लाल, लेखिका मधु किश्वर, वरिष्ठ वकील रीता कोहली, पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र नेता हसन प्रीत, आईएएस अधिकारी तनवीर जफ़र अली आदि भी कहने लगे हैं कि फ़ेक न्यूज़ भारत में एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है।

गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर जैसी कंपनियों के भारतीय प्रतिनिधि आश्वस्त कर रहे हैं कि उनकी कंपनियां इससे निपटने का प्रयास कर रही हैं। ग़लत सूचनाओं के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल करते हुए बीबीसी के एक नए रिसर्च में ये बात सामने आई है कि जिस तरह की ग़लत ख़बरें सबसे ज़्यादा फैलती हैं उनमें, भारत तेज़ी से इस खतरनाक चुनौती से घिरता जा रहा है। लोग 'राष्ट्र निर्माण' की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाली फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं। राष्ट्रीय पहचान ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है। इस रिसर्च में ट्विटर पर मौजूद कई नेटवर्कों का भी अध्ययन किया गया और इसका भी विश्लेषण किया गया है कि इनक्रिप्टड मैसेज़िंग ऐप्स से लोग किस तरह संदेशों को फैला रहे हैं।

शोध से पता चला है कि भारत में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं, जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं। ऐसे संदेशों को भेजने वालों को लगता है कि वो राष्ट्र निर्माण का काम कर रहे हैं। फे़क न्यूज़ या बिना जाँच-परख के ख़बरों को आगे बढ़ाने वाले लोगों की नज़र में मैसेज या ख़बर के सोर्स से ज़्यादा अहमियत इस बात की है कि उसे उन तक किसने फ़ॉरवर्ड किया है। अगर फ़ॉरवर्ड करने वाला व्यक्ति समाज में 'प्रतिष्ठित' है तो बिना जांचे-परखे या उस जानकारी के स्रोत का पता लगाए बिना उसे आगे पहुंचाने को वे अपना 'कर्तव्य' समझते हैं। इस समस्या से निबटने में मीडिया इसलिए बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी ही साख बहुत मज़बूत नहीं।

फ़ेसबुक के भारतीय प्रतिनिधि मनीष खंडूरी का कहना है कि 'फेक न्यूज' हमारे प्लेटफार्म के अस्तित्व के लिए ही एक ख़तरा है और हम इसे बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। भारत में जो हो रहा है, उसमें मार्क ज़करबर्ग की रुचि है और उन्होंने इस मुद्दे के समाधान के लिए एक बड़ी टीम बनाई है। एक सोशल मीडिया प्लेटफार्म के तौर पर हम संवाद की गुणवत्ता पर केंद्रित हैं और ग़लत जानकारियां इसे प्रभावित करती हैं। हम एक सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म हैं और समाज में सार्थक दख़ल देना चाहते हैं। ग़लत जानकारियां इसके ठीक उलट हैं। हमने अपनी ग़लतियां स्वीकार की हैं। एक प्लेटफ़ार्म के तौर पर फ़ेसबुक समाधान का हिस्सा बनना चाहता है। हम अपने प्लेटफ़ार्म पर उपलब्ध सामग्री की उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करना चाहते हैं।

हम भारत में बहुत कुछ बदल रहे हैं। हमने इस समस्या की गंभीर प्रकृति को समझा है और इसके समाधान के लिए कुछ बदलाव कर रहे हैं। हम तथ्य को जांचने के लिए और अधिक बाहरी लोगों को रख रहे हैं। फ़ेसबुक पर मौजूद सामग्री की स्वच्छता को बरक़रार रखने के लिए हम काफ़ी पैसा ख़र्च कर रहे हैं। हम नीति निर्माताओं से बात भी कर रहे हैं। हम ट्रेनिंग भी करवा रहे हैं। भारत के साल 2019 के चुनावों की सुरक्षा के लिए हम तथ्य को जांचने के लिए और अधिक बाहरी लोगों को रख रहे हैं। हम स्थानीय प्रशासन को भी साथ लेकर काम कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों से हमारे संबंध दोतरफ़ा हैं। एक दिन में इसका समाधान नहीं निकलेगा, ये शायद छह महीनों में भी नहीं होगा लेकिन महत्वपूर्ण ये है कि हम इसके समाधान में जुटे हैं।

गूगल की दक्षिण एशिया में न्यूज़लैब प्रमुख इरीन जे ल्यू का कहना है कि गूगल कंपनी इसे एक बड़ी समस्या के तौर पर स्वीकार करती है और इसका समाधान खोजने में अपनी ज़िम्मेदारी को समझती है। जब लोग गूगल पर आते हैं तो वो जवाबों की उम्मीद करते हैं। हम अपनी तकनीक की मदद से और पत्रकारों और अन्य के साथ साझेदारियां करके उच्च गुणवत्ता वाला कंटेंट उपलब्ध करवा सकते हैं। हमने इस बात को समझा है कि भारत में अब बहुत से लोग समाचारों के लिए भी यूट्यूब पर आ रहे हैं और हम ज़रूरी बदलावों पर काम कर रहे हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि जब कोई ब्रेकिंग न्यूज़ खोजने हमारे प्लेटफ़ार्म पर आए तो उसे भरोसेमंद स्रोतों से ही सूचनाएं प्राप्त हों। अगर हम लोगों तक सटीक सूचनाएं पहुंचा पाते हैं तो इससे हमारे बिज़नेस मॉडल को ही फ़ायदा होता है क्योंकि हम लोगों के सवालों के सही जवाब देना चाहते हैं। हम फ़ेक न्यूज़ से लड़ने के लिए एक मज़बूत इकोसिस्टम बनाने पर कम कर रहे हैं। हम भारत में आठ हज़ार पत्रकारों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। ये सात भाषाओं में काम करने वाले पत्रकार हैं। झूठी ख़बरें सिर्फ़ हिंदी और अंग्रेज़ी में ही नहीं फैलाई जा रही हैं बल्कि अन्य स्थानीय भाषाओं में भी फैलायी जा रही हैं। हम स्थानीय भाषाओं के पत्रकारों को फ़ेक न्यूज़ की पहचान का प्रशिक्षण देने जा रहे हैं।

ट्विटर की ग्लोबल हेड विजया गाड्डे कहती हैं कि ट्विटर का उद्देश्य जन संवाद को बढ़ाना है। जब लोग ट्विटर पर आते हैं तो वो जानना चाहते हैं कि क्या चल रहा है और वो इस बारे में दुनिया को भी बताना चाहते हैं। अगर हम उन्हें उच्च गुणवत्ता का कंटेंट मुहैया नहीं कराएंगे तो वो हमारे प्लेटफ़ार्म का इस्तेमाल ही बंद कर देंगे। इसलिए हमारे लिए इस तरह की ख़बरों के प्रभाव को स्वीकार करना बेहद महत्वपूर्ण है। हम फ़ेक अकाउंट की पहचान करने की तकनीक को बेहतर कर रहे हैं। फ़ेक अकाउंट हमारी नीति के ख़िलाफ़ हैं। आपत्तिजनक कंटेंट को रिपोर्ट करने का विकल्प हमने दिया है। हमने अमरीकी चुनावों से काफ़ी कुछ सीखा है। हम ऑटोमेटेड को-आर्डिनेशन को पकड़ने में अब पहले से अधिक सक्षम हैं। राजनीतिक विज्ञापनों में और अधिक पारदर्शिता ला रहे हैं। हमने हाल ही में फ़ेक अकाउंट को रिपोर्ट करने का विकल्प दिया है। देख रहे हैं कि हम इससे क्या सीख सकते हैं और हम ज़रूरत पड़ने पर इसका विस्तार भी करेंगे।

हमारी ऐसी कोई नीति नहीं है जो किसी को ट्विटर पर झूठ बोलने से रोकती हो, अगर हम लोगों को झूठ को रिपोर्ट करने का विकल्प दे भी देंगे तो हम उसका क्या कर पाएंगे क्योंकि ये हमारी नीति के ख़िलाफ़ नहीं है। हम ऐसी कंपनी नहीं बनना चाहते जो अपने प्लेटफ़ार्म पर किए गए हर ट्वीट पर जजमेंट ले, रोज़ाना हमारे प्लेटफ़ार्म पर करोड़ों ट्वीट किए जाते हैं। हम ऐसे अकाउंट के व्यावहारिक संकेतों का विश्लेषण कर रहे हैं। ये फ़ेक न्यूज़ को रोकने का हमारा तरीका है। अक्सर ऐसे अकाउंट फ़ेक मिलते हैं तो हम उनकी सामग्री पर कार्रवाई किए बिना ही उन्हें हटा देते हैं।

अभिनेत्री स्वरा भास्कर कहती हैं कि आज जिस तरह की फ़ेक न्यूज़ की हम बात कर रहे हैं, वो संगठित और प्रायोजित है और इसमें एक एजेंडा छिपा हुआ है। ये वो चीज़ें हैं, जो पहले नहीं थीं। इसमें किसी की कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं है।

अभिनेता प्रकाश राज का कहना है कि फ़ेक न्यूज़ बहुत पहले से है, लेकिन अब ये काम संगठित तौर पर हो रहा है और इससे समाज को नुकसान होगा। इन दिनों फ़ेक न्यूज़ तेज़ी से फैल रही हैं। इतने सधे हुए तरीके से कि लोगों के दिमाग़ में जरा भी शक नहीं होता। कांग्रेस पार्टी का सोशल मीडिया का कामकाज देख रही दिव्या स्पंदना का कहना है कि सच के मुक़ाबले फ़ेक न्यूज़ अधिक रफ़्तार से चलती है। फैक्ट चेक वेबसाइट अल्टन्यूज़ के प्रतीक सिन्हा कहते हैं कि ये ज़रूरी नहीं है कि जानकारी हासिल करने के लिए किसी शख्स के पास व्हाट्सऐप ही हो, ग्रामीण इलाकों में फ़ेक न्यूज़ तो बस बातों-बातों में दूर तक फैल जाती है। इसलिए ये धारणा गलत है कि इंटरनेट की पहुँच कम होने से फ़ेक न्यूज़ नहीं फैलेगी।

आम आदमी पार्टी से जुड़े अंकित लाल का मानना है कि फ़ेक न्यूज़ की समस्या से निपटने के लिए सरकार के पास एक व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए कानून बदलने होंगे। हम अब भी 19वीं सदी के टेलीग्राफ़ कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेखिका मधु किश्वर कहती हैं - सोशल मीडिया इस दुनिया की सबसे लोकतांत्रिक चीज़ है जहां लोग आपको पल भर में ना केवल दुरुस्त कर देते हैं, बल्कि चुनौती भी देते हैं कि आप क्या कह रहे हैं। सोशल मीडिया ने सबको एक स्तर पर ला दिया है। सोशल मीडिया कोई बुराई नहीं है।

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा का कहना है कि समाचार पहले ब्रेक करने की प्रतिद्वंद्विता के कारण चैनलों के प्रति विश्वसनीयता का भाव घटा है। इसका मतलब ये नहीं है कि सभी फ़ेक न्यूज़ फैला रहे हैं। फ़ेक न्यूज़ की चुनौती से निपटने के लिए सरकार के पास क़ानून बनाने का विकल्प है, लेकिन अगर सरकार ऐसा करेगी तो मीडिया की आज़ादी को सीमित करने का सवाल भी उठेगा। गुजरात सरकार के मंत्री नितिन पटेल कहते हैं कि आज तो सवाल उठते हैं अगर कोई किसी की जाति पर टिप्पणी करता है और लोग उस व्यक्ति का समर्थन करते हैं। उनकी सरकार इसे रोकने के लिए क़ानून बनाने पर विचार कर रही है। तकनीक का इस्तेमाल बेहतरी के लिए किया जाता है, लेकिन कुछ लोग इसका उपयोग ग़लत कारणों से कर रहे हैं। वह इसका इस्तेमाल समाज में गड़बड़ी पैदा करने या देश के ख़िलाफ़ साज़िश करने में कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि जो लोग फ़ेक न्यूज़ को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देशद्रोही हैं। ये प्रोपेगैंडा है और कुछ लोग इसे बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। फ़ेक न्यूज़ एक वायरस की तरह है जिससे पूरा देश पीड़ित है। इससे लोगों की जान भी चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार हरतोष बल ने कहा है कि न्यूट्रलिटी कुछ नहीं है, लेकिन नपुंसकता मायने रखती है। अगर हम सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो ये हमारी ड्यूटी है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं कि आजकल मीडिया ने ही बहुत सी ख़बरें ग़ायब कर दी हैं। असली ख़बरों के बजाए आप कुछ और पढ़ रहे हैं। क़ाबिल पत्रकारों के हाथ बांध दिए गए हैं। अगर क़ाबिल पत्रकारों का साथ दिया गया तो वो ही इस लोकतंत्र को बदल देंगे लेकिन भारत का मीडिया, बहुत होश-हवास में, सोच समझकर भारत के लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है। समझिए किस तरह से हिंदू-मुस्लिम नफ़रत की बातें हो रही हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र नेता हसन प्रीत कहते हैं कि फेक़ न्यूज़ की जड़ में आर्थिक और सामाजिक संकट है और इसके लड़ना है तो हमें इसे राजनीतिक संदर्भ में देखना होगा। वरिष्ठ वकील रीता कोहली कहती हैं- ये सिर्फ़ राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे लड़ा जाया जाना चाहिए। आईएएस अधिकारी तनवीर जफ़र अली का कहना है कि फ़ेक न्यूज़ से हिंसा हो रही है। ये स्टेट के ख़िलाफ़ अपराध है। इसे रोकने के लिए सख़्त क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है।

यह भी पढ़ें: एक आईपीएस अफसर ने बंजर पहाड़ी को कर दिया हरा-भरा

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