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आखिर क्यों तन्ना दम्पति ने समाज सेवा को बना लिया तीरथ, ज़रूर पढ़ें

19th Apr 2016
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ईश्वर की सच्ची आराधना उसकी पूजा में नहीं बल्कि मानवता का धर्म निभाने में है. 2011 में मुंबई में एक हादसे में इकलौते बेटे को खोने के बाद जब दमयंती तन्ना और प्रदीप तन्ना ने ईश्वर की शरण में जाने का फैसला किया तो बहुत जल्द उन्हें समझ आ गया कि मंदिरों-शिवालयों में भटकने से नहीं, बल्कि मन की शांति, दूसरों की सच्ची सेवा से मिलती है. इस सोच को उन्होंने जीने का सार बना लिया और समाज का ऐसा कोई तबका नहीं है जो आज उनकी सेवा से अछूता है. बेटे की याद में उन्होंने 26 जनवरी 2013 को निमेश तन्ना चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की और आज इसके ज़रिये बच्चे, बुजुर्गों और दूसरे ज़रुरतमंदों की मदद की जाती है. दमयंती आज भी उस दिन को याद करती हैं जिसके बाद उनकी जिंदगी और जीने का मकसद पूरी तरह बदल गया.


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योर स्टोरी से बातचीत में दमयंती ने बताया, 

"निमेश 23 साल का था जब उसे पहला पोर्टफोलियो शूट मिला. उसे फोटोग्राफी का शौक था. उस दिन वो काफी खुश था और दोस्तों के साथ उसका डिनर का प्लान था. रात को उसने लोकल ट्रेन पकड़ी और भीड़ की वजह से वो दरवाज़े के पास खड़ा हो गया. ट्रैक के बहुत करीब लगे एक खंभे को वो देख नहीं पाया और उसका सिर उससे टकरा गया. काफी रात होने पर जब वो नहीं लौटा तो हमें चिंता होने लगी. दोस्तों से पूछने पर भी हमें निमेश का कोई पता नहीं चला. सुबह पुलिस से हमें हादसे के बारे में बताया."

हादसे के बाद तन्ना दम्पति की जिंदगी जैसे रुक गयी. उनका पल-पल काटना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में शुभचिंतकों ने उन्हें चार धाम की यात्रा पर जाने की नसीहत दी. तक़रीबन डेढ़ साल तक वे मंदिरों-शिवालयों में मन की शांति ढूँढते रहे. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद, निमेश के जाने का दर्द उनके मन को कचोटता रहा और शांति कहीं नहीं मिली.


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उन्होंने योर स्टोरी से बातचीत में कहा, 

"सबकी सलाह मानकर हम चार धाम की यात्रा पर निकल पड़े. लेकिन जैसे ही घर लौटे, फिर से वही सूनापन और खालीपन था. हमें समझ नहीं आ रहा था की ऐसा क्या करें जिससे मन को शांति मिले. फिर एक दिन ऐसे ही अकेले बैठे-बैठे हमें खयाल आया कि हमारे जैसे और भी होंगे जिनके पास कोई अपना नहीं होगा और जिन्हें मदद की ज़रूरत होगी. बस इसी खयाल को हमने जीने का मकसद बना लिया."


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सबसे पहले तन्ना दम्पति ने अपने विचार अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से साझा किया. इस नेक काम के बारे में सुनकर सबने आगे बढ़ने का हौसला दिया. फिर उन्होंने अपने आस-पास ही ऐसे ज़रूरतमंद लोगों की तलाश शुरू की. तक़रीबन डेढ़ से दो महीने तक वो घर-घर जाकर ऐसे लोगों को ढूंढते रहे. ऐसे 27 बुजुर्गों की लिस्ट तैयार की गई, जो बीमार थे और जिन्हें मदद की ज़रूरत थी. अपनी सेवा का दायरा बढ़ाने के लिए उन्होंने मंदिरों और स्टेशन के बाहर भी पर्चे लगाये. धीरे-धीरे ज़रुरतमंदों की संख्या बढ़ती गई. भगवान का दिया बहुत कुछ था इसलिए शुरू-शुरू में पैसे की दिक्कत नहीं हुई. जैसे-जैसे लोगों को इसके बारे में पता चला अनुदान देने वालों की संख्या भी बढती गई. शुरू-शुरू में वो खुद ही अपने रिश्तेदारों की मदद से टिफ़िन्स की डिलीवरी करते थे लेकिन बाद में मुश्किल होने पर उन्होंने ये काम मुंबई के डब्बावालों को सौंप दिया. ट्रस्ट की तरफ से रोज़ 102 बुजुर्गों को फ्री लंच की डिलीवरी की जाती है. जहाँ आमतौर पर डब्बावाले एक डिलीवरी के 650 रुपये महीने लेते हैं वहीँ निमेश तन्ना चैरीटेबल ट्रस्ट के टिफ़िन्स की डिलीवरी के 450 रुपये ही लेते हैं.


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योर स्टोरी से बातचीत में दमयंती ने कहा..

"मुलुंड में हमारी दो दुकानें हैं और भगवान का दिया बहुत कुछ है हमारे पास. हमने अपने पैसे से ही इसकी शुरुआत की. लेकिन जैसे-जैसे लोगों को पता चला फिर अनुदान देने वालों की कमी नहीं रही. हमारे पास आज कुल 8 महिलाओं का स्टाफ है जो सुबह से ही लंच बनाने की तैयारियों में लग जाता है. रोज़ यहाँ 110 लोगों का खाना बनता है. स्वाद और बुजुर्गों के स्वास्थ्य दोनों को ध्यान में रखकर ही लंच तैयार किया जाता है. हम पूरी कोशिश करते हैं कि उन्हें पूरा पोषण मिले. खाने की मात्र भी इतनी होती है की एक टिफ़िन में दो लोग आराम से दोनों वक़्त खा सकते हैं."


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तन्ना दम्पति ने अपनी सेवा को सिर्फ बुजुर्गों तक ही सिमित नहीं रखा है. बल्कि समाज का कोई भी तबका उनकी सेवा से अछुता नहीं है. भांडुप के आदिवासी इलाके में ऐसे 50 परिवार हैं जिन्हें ट्रस्ट की ओर से हर महीने के पहले रविवार को 15-16 किलो अनाज का वितरण किया जाता है. उन्हें राशन की बाकि चीज़ें जैसे तेल, चीनी और बाकि ज़रूरत का सामान भी दिया जाता है. निमेश के जन्मदिन 5 अगस्त 2013 से शुरू हुई इस सेवा से ऐसे कई ज़रूरतमंद और गरीब परिवारों को सुकून की रोटी नसीब हुई है जिनके लिए दो वक़्त का खाना जुटा पाना बहुत मुश्किल था. बच्चे भी उनकी सेवा से अछूते नहीं हैं. एक दिन यूँ ही अपने दोस्तों के साथ मुंबई के पास स्तिथ दहानू के सरकारी स्कूलों में जाने पर उन्होंने देखा कि बच्चों के पैर में चप्पल नहीं थे और ठंड से बचने का साधन नहीं था. उन्होंने उसी वक़्त बच्चों की मदद करने का फैसला कर लिया.


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योर स्टोरी से बातचीत में उन्होंने कहा, ये जब वहां पहुंचे तो देखा बच्चों के पैर में चप्पल नहीं थे. ठण्ड से बचने के लिए चादर नहीं थे. संस्था ने 9 स्कूल के कुल 1100 बच्चों को चादर, चप्पल और नमकीन के पैकेटस बांटे. दमयंती बताती हैं कि उनकी चेहरे की ख़ुशी देखने लायक थी. और यही इनके लिए सबसे बड़ा तोहफा था. इसके बाद इन्होंने एक व्हाट्स ऐप ग्रुप बनाया है जहाँ आसपास के गरीब परिवार के बच्चों के जन्मदिन मनाने की योजना बनाते हैं. इन लोगों ने ऐसे कुछ परिवारों के नाम ट्रस्ट में रजिस्टर कराया है. फिर उनके साथ जाकर उनका जन्मदिन मनाते हैं. संस्था की ओर से सामान खरीदकर बच्चों में बाँटते हैं. 

निमेश के जाने का दर्द तो हमेशा रहेगा. लेकिन सच्ची सेवा को ही अपनी पूजा मानकर दिन-रात दूसरों की सेवा में लगे तन्ना दम्पति ने दिखा दिया है कि कैसे दूसरों के लिए जिया जाता है. अपना दर्द भुलाकर, दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरने में ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है और मन की शांति है. इससे बढ़कर दुनिया में और कोई ख़ुशी नहीं है.


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