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बस कंडक्टर से हिंदी सिनेमा के सहृदय स्टार और धाकड़ नेता बनने वाले सुनील दत्त

प्रज्ञा श्रीवास्तव
31st Aug 2017
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सुनील दत्त, एक बहुआयामी अभिनेता, एक ईमानदार छवि वाला नेता, एक प्यारा पति, एक जिम्मेदार पिता, एक परोपकारी नागरिक। विशेषणों की झड़ी लग जाएगी जब सुनील दत्त को परिभाषित किया जाएगा। 

फोटो साभार: सोशल मीडिया

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वरिष्ठ फिल्म पत्रकार जयप्रकाश के अनुसार, ड्रग्स और कैंसर के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए उन्होंने दो बार मुंबई से चंडीगढ़ तक पदयात्रा की थी।'

फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद सुनील दत्त ने समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस पार्टी से लोकसभा के सदस्य बने। 1968 में सुनील दत्त पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किये गये। 

सुनील दत्त, एक बहुआयामी अभिनेता, एक ईमानदार छवि वाला नेता, एक प्यारा पति, एक जिम्मेदार पिता, एक परोपकारी नागरिक। विशेषणों की झड़ी लग जाएगी जब सुनील दत्त को परिभाषित किया जाएगा। उनके द्वारा स्थापित अजन्ता आर्ट्स कल्चरल ट्रूप और नरगिस दत्त मैमोरियल कैंसर फाउण्डेशन आज भी जनहित और कलाहित के कार्यों में लगी हैं । वरिष्ठ फिल्म पत्रकार जयप्रकाश के अनुसार, ड्रग्स और कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने दो बार मुंबई से चंडीगढ़ तक पदयात्रा की थी।' हिन्दी सिनेमा जगत में सुनील दत्त पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने सही मायने में एंटी हीरो की भूमिका निभाई और उसे स्थापित करने का काम किया।

बस डिपो से सफर की शुरुआत

सुनील दत्‍त का जन्‍म 6 जून 1929 को ब्रिटिश भारत में पंजाब राज्य के झेलम जिला स्थित खुर्दी नामक गांव में हुआ था। उनका असली नाम बलराज दत्‍त था। सुनील जब पांच साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्‍यु हो गई थी। 18 साल की उम्र तक आते आते भारत-पाकिस्‍तान के बंटवारे की लड़ाई छिड़ चुकी थी। उस समय युवा सुनील दत्‍त को कुछ समझ नहीं आया कि इन मुसीबतों से कैसे निपटा जाए। हिंदू-मुस्‍लिम की इस लड़ाई में चारों ओर हाहाकार मचा था। सुनील का परिवार भी हिंदू था, ऐसे वक्‍त उनके पिता के एक मुस्‍लिम दोस्‍त याकूब ने सुनील और उनके परिवार को अपने घर में शरण दी। यही वजह है कि सुनील दत्‍त मुस्‍लिमों के प्रति हमेशा सद्भावना रखते थे। मुंबई आने से पहले सुनील काफी समय तक लखनऊ में भी रहे। नवाबों के शहर लखनऊ की अमीनाबाद की गलियों में उन्‍होंने काफी वक्‍त गुजारा। बाद में ग्रेजुएशन के लिए वह मुंबई चले गए। यहां जय हिंद कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सुनील मुंबई बस में अपने जीवन यापन के लिए उन्हें बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रूप में काम किया जहां उन्हें 120 रुपए महीना मिला करता था।

जब नर्गिस के सामने हो गई बोलती बंद

इस बीच उन्होने रेडियो सिलोन में भी काम किया जहां वह फिल्मी कलाकारों का साक्षात्कार लिया करते थे। प्रत्येक साक्षात्कार के लिए उन्हें 25 रुपये मिलते थे। रेडियो सीलोन दक्षिणी एशिया का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन है। यहां वह काफी मशहूर भी हुए। उनकी आवाज के लोग दीवाने थे। उस वक्त नरगिस टॉप की एक्ट्रेस थीं और सुनील दत्त उनके फैन थे। एक रोज सुनील को पता चला कि उन्हें नरगिस का इंटरव्यू लेना है। सुनील दत्त ने काफी तैयारी की, पर नरगिस का सामने आते ही वो सबकुछ भूल गए और एक भी शब्द नहीं बोल पाए। नतीजा ये हुआ कि इंटरव्यू ही कैंसिल करना पड़ा। एक सफल उद्घोषक में अपनी पहचान बनाने के बाद सुनील कुछ नया करना चाहते थे। बस फिर क्‍या था रेडियो की नौकरी छोड़, वह एक्‍टर बनने मुंबई चले आए।

एंटी हीरो वाले कथानक को बनाया सफल-

सुनील दत्त ने अपने सिने करियर की शुरूआत वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म रेलवे प्लेटफार्म से की। 1955 से 1957 तक वह फिल्म इंडस्ट्री मे अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे। रेलवे प्लेटफार्म फिल्म के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली उसे वह स्वीकार करते चले गये। उस दौरान उन्होंने कुंदन, राजधानी, किस्मत का खेल और पायल जैसी कई बी ग्रेड फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुयी। सुनील दत्त की किस्मत का सितारा 1957 में प्रदर्शित फिल्म मदर इंडिया से चमका। इस फिल्म में सुनील दत्त का किरदार ऐंटी हीरो का था। करियर के शुरूआती दौर में एंटी हीरो का किरदार निभाना किसी भी नये अभिनेता के लिये जोखिम भरा हो सकता था लेकिन सुनील दत्त ने इसे चुनौती के रूप में लिया और ऐंटी हीरो का किरदार निभाकर आने वाली पीढ़ी को भी इस मार्ग पर चलने को प्रशस्त किया। एंटी हीरो वाली उनकी प्रमुख फिल्मों में जीने दो, रेशमा और शेरा, हीरा, प्राण जाए पर वचन न जाए, 36 घंटे, गीता मेरा नाम, जख्मी, आखिरी गोली, पापी शामिल हैं।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

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शानदार कृतित्तव, शानदार व्यक्तित्व-

मदर इंडिया ने सुनील दत्त के सिने करियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन मे भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस फिल्म में उन्होनें नरगिस के पुत्र का किरदार निभाया था। फिल्म की शूटिंग के दौरान नरगिस आग से घिर गयी थी और उनका जीवन संकट मे पड़ गया था। उस समय वह अपनी जान की परवाह किये बिना आग मे कूद गये और नर्गिस को लपटों से बचा ले आये। इस हादसे मे सुनील दत्त काफी जल गये थे तथा नरगिस पर भी आग की लपटों का असर पड़ा। उन्हें इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके स्वस्थ होने के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। डकैतों के जीवन पर बनी उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म मुझे जीने दो ने वर्ष 1964 का फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीता। उसके दो ही वर्ष बाद 1966 में खानदान फिल्म के लिये उन्हें फिर से फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1967 सुनील दत्त के सिने करियर का सबसे महत्वपूर्ण साल साबित हुआ। उस वर्ष उनकी मिलन, मेहरबान और हमराज जैसी सुपरहिट फिल्में प्रदर्शित हुयी जिनमें उनके अभिनय के नये रूप देखने को मिले। इन फिल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेता के रूप में शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे।

नवीनता से प्यार करने वाले प्रयोगधर्मी सुनील

साल 1963 में प्रदर्शित फिल्म ये रास्ते है प्यार के के जरिये सुनील दत्त ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। 1964 में प्रदर्शित यादें सुनील दत्त निर्देशित पहली फिल्म थी। सुनील दत्त ने 1964 में एक प्रयोगधर्मी फिल्म यादें बनाई थी। इस फिल्म का नाम सबसे कम कलाकार वाली फिल्म के रूप में गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। इस फिल्म के आखिरी सीन में नरगिस एक छोटे से किरदार में नजर आई थीं। बाकी फिल्म में सुनील के अलावा कोई और एक्टर नहीं है। इस फिल्म की कहानी लिखी थी सुनील दत्त की पत्नी नरगिस दत्त ने।फिल्म में एक ऐसे पति की कहानी है जिसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई है और वो उससे जुड़ी बातों को याद करता है।

1968 में सुनील दत्त फिल्मों के प्रोड्यूसर भी बन गए थे। और उन्होंने फिल्म बनाई मन का मीत जिसमें उन्होंने अपने छोटे भाई को भी ब्रेक दिया। फिर वो वक्त भी आया जब दत्त साहब के पास काम की कमी आ गई लेकिन दत्त साहब ने हार नहीं मानी और जल्द ही अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की। 1981 में अपने पुत्र संजय दत्त को लांच करने के लिये उन्होने फिल्म रॉकी का निर्देशन किया। फिल्म टिकट खिडकी पर सुपरहिट साबित हुयी। सुनील दत्त ने कई पंजाबी फिल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखलाया। इनमें मन जीत जग जीत, दुख भंजन तेरा नाम और सत श्री अकाल प्रमुख है। 1993 में प्रदर्शित फिल्म क्षत्रिय के बाद सुनील दत्त ने विधु विनोद चोपड़ा के जोर देने पर उन्होंने 2007 में प्रदर्शित फिल्म मुन्ना भाई एमबी.बी.एस में संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया। 2005 सुनील दत्त को दादा साहेब फाल्के रत्न अवॉर्ड दिया गया।

फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद सुनील दत्त ने समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस पार्टी से लोकसभा के सदस्य बने। 1968 में सुनील दत्त पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किये गये। सुनील दत्त को 1982 में मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। सुनील दत्त ने लगभग 100 फिल्मों में अभिनय किया। सुनील दत्त 25 मई 2005 को इस दुनिया को अलविदा कह गये। 

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