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पढ़ते-पढ़ते दूसरों को पढ़ाने वाला आज 400 बच्चों की बदल रहा है तकदीर

9 साल की उम्र से बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं बाबर अली2002 से पढ़ा रहे हैं बच्चों को“आनंद शिक्षा निकेतन” के हेडमास्टर हैं बाबर अली

Harish Bisht
25th Dec 2015
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एक बच्चा जब 9 साल का था तो उसने अपने आसपास के दूसरे बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू कर दिया और जब वो 14 साल का हुआ तो वो बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते स्कूल का हेडमास्टर बन गया। आज बाबर अली 22 साल के हो चुके हैं और वो पश्चिम बंगाल के मुशिर्दाबाद जिले में “आनंद शिक्षा निकेतन” नाम से स्कूल में करीब 400 बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। कभी खुले आसमान के नीचे स्कूल चलाने वाले बाबर अली का ये स्कूल आज एक इमारत में चल रहा है।

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बाबर अली को बच्चों को पढ़ाने का आइडिया तब आया जब वो दस किलोमीटर दूर स्कूल पढ़ने के लिए जाते थे। इस दौरान वो देखते थे कि रास्ते में कई बच्चे अपने माता पिता के साथ खेतों में काम करते थे। जब उन्होने वजह जानने की कोशिश की तो पता चला कि इन बच्चों के परिवार वालों की आर्थिक स्थिती ठीक नहीं है और ना ही वो बाबर अली की तरह हर रोज पढ़ने के लिए 10 किलोमीटर दूर तक स्कूल जा सकते हैं। तब इन्होने फैसला लिया कि वो इन बच्चों को पढ़ाने का काम करेंगे। इस तरह साल 2002 में जब वो 5वीं क्लास में थे तो इन्होने अपने घर के पिछवाड़े में खुले आकाश के नीचे 8 बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू कर किया। इसके लिए वो पहले अपने स्कूल जाते और घर लौटने के बाद इन बच्चों को पढ़ाने का काम करते।

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बाबर अली ने धीरे धीरे बच्चों को जुटा तो लिया था लेकिन दिक्कत थी उनके लिए कापी किताब जुटाने की। तब इन्होने रामकृष्ण परमहंस संस्था से सम्पर्क किया और उनसे निवेदन किया कि वो गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं और उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो इनके लिए किताब कापी का इंतजाम कर सकें। इस तरह रामकृष्ण परमहंस संस्था उनकी मदद को आगे आया और वहां पढ़ने वाले बच्चों के लिये कापी किताबों का इंतजाम किया। इतना ही नहीं जब बाबर अली की टीचर को पता चला कि वो दूसरे बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं तो उन्होने बाबर अली को चॉक का भरा डिब्बा दिया। इस तरह वो जो कुछ स्कूल से सीख कर घर आते वो इन बच्चों को पढ़ाते। धीरे धीरे उनके पास आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती गई और इस तरह रोज बच्चे बाबर अली के स्कूल से लौटने का इंतजार करते ताकि वो उनको पढ़ायें। तो दूसरी ओर बाबर अली भी अच्छे टीचर की भांति उनको पढ़ाने का काम करने लगे।

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शुरूआत में जब बाबर अली ने बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया तो गांव वालों ने उनका विरोध किया, क्योंकि वो ये मानने को तैयार नहीं थे कि एक छोटा बच्चा दूसरे बच्चों को पढ़ाने का काम कर सकता है। पिछड़ा इलाका होने के कारण यहां के ज्यादातर लोग अशिक्षित थे इसलिए इन लोगों का आरोप था कि बाबर अली दूसरे बच्चों को धार्मिक शिक्षा की जगह मॉर्डन शिक्षा दे रहे हैं, जो कि उनकी नजर में गलत बात थी। इसलिए वो बाबर अली की इस कोशिश को पटरी से उतारने के लिए कई षड़यंत्र तक रचने लगे। इसके लिए गांव के लोग बाबर अली के पास पढ़ने आने वाले बच्चों के माता पिता पर दबाव बनाते कि वो अपने बच्चों को उनके पास पढ़ने के लिए ना भेजें। इसके अलावा उनको आर्थिक दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा। बावजूद इतनी चुनौतियों के बाद भी बाबर अली अपने मकसद में जुटे रहे हैं और धीरे धीरे उनके यहां पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती गई।

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साल 2005 तक इनके पास इतने बच्चे हो गये थे कि इनको स्कूल खोलने की जरूरत महसूस होने लगी। इस तरह बाबर अली जब 8वीं क्लास में थे तो उन्होने गांव के 65 बच्चों को पढ़ाने के लिए “आनंद शिक्षा निकेतन” नाम से स्कूल की स्थापना कर दी। बाबर अली ने बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत भले ही खुले आसमान के नीचे से की हो लेकिन नवंबर, 2015 में लोगों से मिले चंदे की बदौलत ये स्कूल के लिए इमारत बनाने में कामयाब हो गये। आज इनके स्कूल में 4सौ से ज्यादा बच्चे पढ़ाई करते हैं। इन बच्चों में ढ़ाई सौ लड़कियां है जबकि बाकि लड़के हैं। इनके स्कूल को पश्चिम बंगाल सरकार से मान्यता मिली हुई है। ये स्कूल पहली क्लास से लेकर 8वीं क्लास तक चलता है। खास बात ये है कि स्कूल को कोई सरकारी मदद नहीं मिलती।

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“आनंद शिक्षा निकेतन” में बच्चों को पढ़ाने के लिए बाबर अली के अलावा 10 टीचर हैं। इनमें से 6 टीचर ने बाबर अली से ही शिक्षा हासिल की है और वो स्कूल में पढ़ाने के अलावा डिग्री कॉलेज में अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। बाबर अली पिछले 10 सालों से इस स्कूल में हेडमास्टर की भूमिका में है। “आनंद शिक्षा निकेतन” में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवार से आते हैं, इसलिए ये इन बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने का काम करते हैं। इतना ही नहीं स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त में किताबें और वर्दी दी जाती है। बाबर अली के मुताबिक स्कूल को चलाने का खर्चा उनको डोनेशन से मिलता है। फिलहाल इनकी इस मुहिम से आसपास के 5-6 गांव के बच्चों को फायदा मिल रहा है। इंग्लिश में मास्टर्स की पढ़ाई कर चुके बाबर अली का कहना है कि “अगर आप में किसी मंजिल को हासिल करने लिए जुनून है तो वहां पर उम्र, पैसा और दूसरी मुश्किलें कोई मायने नहीं रखती।”

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