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विदेश की नौकरी छोड़, महिलाओं के लिए कन्याकुमारी से कश्मीर की पैदल यात्रा कर रही यह महिला

बुलंदशहर गैंगरेप की शर्मनाक घटना के बाद औरतों के प्रति समाज की सोच को कुछ इस तरह बदलने की कोशिश कर रही है ये महिला... 

30th Mar 2018
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सृष्टि के मिशन का नाम है, 'क्रॉस बो'। मिशन के अंतर्गत उन्होंने 260 दिनों में 3800 किमी दूरी तय करने का लक्ष्य बनाया है। सृष्टि ने 22 मार्च को अपनी यात्रा के 189वें दिन 3155 किमी. पूरे किए। इस यात्रा में वह विभिन्न गांवों में जाकर अपनी वर्कशॉप्स आयोजित कराती हैं। 

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30 वर्षीय सृष्टि ने पिछले साल 15 सितंबर से अपनी इस पैदल यात्रा की शुरूआत की थी। दरअसल, 2016 में हुई बुलंदशहर गैंगरेप की शर्मनाक घटना ने उन्हें महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाने के प्रेरणा दी। इससे पहले वह अपने पति के साथ हॉन्ग-कॉन्ग में रहती थीं और एक अच्छी नौकरी करती थीं।

एक सफल कॉर्पोरेट लाइफ़ और ख़ुशनुमा पारिवारिक ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरी होने के बाद, समाज की बुराइयों और समस्याओं के प्रति हमारा नज़रिया वक़्त के साथ धुंधला होता जाता है। सहूलियत हमारे अंदर की सामाजिक सक्रियता को कम करती जाती है। इन हालात में कुछ लोग ऐसे हैं, जो परिभाषाओं को नए सिरे से गढ़ने माद्दा रखते हैं। उनमें परिवर्तन लाने का जुनून इस कदर होता है कि सहूलियत, उनकी प्राथमिकता की सूची में होती ही नहीं। ऐसे ही विलक्षण लोगों में फ़ेहरिस्त में से एक नाम का ज़िक्र हम आज करने जा रहे हैं, सृष्टि बख्शी। सृष्टि ने महिला सशक्तिकरण का संदेश लेकर कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पैदल यात्रा करने का मिशन शुरू किया है, जिसमें वह 12 राज्यों से होकर अपनी यात्रा को अंजाम देंगी। 

सृष्टि के मिशन का नाम है, 'क्रॉस बो'। मिशन के अंतर्गत उन्होंने 260 दिनों में 3800 किमी दूरी तय करने का लक्ष्य बनाया है। सृष्टि ने 22 मार्च को अपनी यात्रा के 189वें दिन 3155 किमी. पूरे किए। इस यात्रा में वह विभिन्न गांवों में जाकर अपनी वर्कशॉप्स आयोजित कराती हैं। सृष्टि, स्कूलों और कॉलेजों में जाकर बच्चों और युवाओं से भी बातचीत करती हैं। अपनी वर्कशॉप्स में वह समाज में महिलाओं की उपेक्षित स्थिति के संबंध में लोगों को जागरूक करती हैं और समाज में महिलाओं के दर्जे को बेहतर करने की प्रेरणा देती हैं।

सृष्टि की वर्कशॉप्स की एक विशेषता यह भी है कि इसमें पुरुष भी शामिल रहते हैं। सृष्टि मानती हैं कि महिलाओं की स्थिति में प्रभावी परिवर्तन तभी आ सकता है, जब जेंडर गैप ख़त्म हो और जब पुरुष भी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम करें। इस सोच के तहत ही वह पुरुषों को भी अपनी वर्कशॉप्स में शामिल करती हैं।

30 वर्षीय सृष्टि ने पिछले साल 15 सितंबर से अपनी इस पैदल यात्रा की शुरूआत की थी। दरअसल, 2016 में हुई बुलंदशहर गैंगरेप की शर्मनाक घटना ने उन्हें महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाने के प्रेरणा दी। इससे पहले वह अपने पति के साथ हॉन्ग-कॉन्ग में रहती थीं और एक अच्छी नौकरी करती थीं।

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अपनी यात्रा शुरू करने से पहले सृष्टि ने पूरा एक साल कड़ी ट्रेनिंग को दिया। वह कहती हैं कि उन्हें सिर्फ फिजिकल ट्रेनिंग की ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी ख़ुद को तैयार करने की बहुत ज़रूरत थी। उनका लक्ष्य रहता है कि वह रोज़ाना 25-30 किमी की दूरी तय करें।

घटना के बारे में पता चलने के बाद सृष्टि ने अपने परिवारवालों से बात की। उनके परिवार का संबंध इंडियन आर्मी से रहा है और सभी लोग काफ़ी उदारवादी सोच के हैं। सृष्टि ने कुछ समय तक शोध करने के बाद जब यह आइडिया अपने परिवार के सामने रखा तो उनकी सोच और मुहिम दोनों ही को, परिवार का पूरा समर्थन मिला। सृष्टि ने अपने पिता के साथ मिलकर तय किया कि इस पैदल यात्रा में वह देश के किन हिस्सों से होकर गुज़रेंगी।

सृष्टि का आधे से ज़्यादा सफ़र तय हो चुका है। अपने अभी तक के अनुभवों के संबंध में उनका कहना है कि देश के एक बड़े हिस्से में आर्थि-सामाजिक परिदृश्य की स्थिति बेहद ख़राब है। उनके मुताबिक़, समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का ख़्याल बिल्कुल भी नहीं रखा जा रहा है। लेकिन साथ ही, उन्होंने अपनी यात्रा का सकारात्मक पहलू भी साझा किया और बताया कि उनकी मुहिम को लोगों का पूरा साथ मिला। जगह-जगह पर वर्कशॉप्स आयोजित कराने में लोगों ने उनकी पूरी मदद की।

अपनी यात्रा से वह किस हद तक चीज़ों को बदल सकेंगी? इस संबंध में वह मानती हैं कि परिवर्तन लाने में समय लगता है और वह धीरे-धीरे ही होता है। उनका कहना है कि उन्होंने एक कदम उठाया है और इसके प्रभाव के लिए वह सकारात्मक हैं। सृष्टि चाहती हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनकी मुहिम से जुड़ें।

आप भी सृष्टि की मुहिम से जुड़ सकते हैं। 'क्रॉस बो माइल्स' ऐप गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद है और आप इसे डाउनलोड कर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं। आप ऐप ऑन करके अपने आस-पास भी इस तरह की पैदल यात्रा करके, सृष्टि की मुहिम को और सशक्त बना सकते हैं। क्रॉस बो माइल्स के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम करने वाले कई संगठन रजिस्टर्ड हैं। आप भी इसका हिस्सा बन सकते हैं और कई प्रोजेक्ट्स की शुरूआत में अपना योगदान दे सकते हैं।

यह भी पढ़ें: समाज से लड़कर बेटियों के उद्यमी सपनों को पंख देने वाली माँ

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