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जब आचार्य चतुरसेन का मन विद्रोह से भर उठा

आचार्य चतुरसेन के जन्मदिवस पर विशेष...

जय प्रकाश जय
26th Aug 2018
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प्रसिद्ध उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन के निजी जीवन में एक दिन ऐसा भी रहा, जब उनका मन विद्रोह से भर उठा। अपने कई एक लोकप्रिय उपन्यासों 'गोली', 'सोमनाथ', 'वयं रक्षाम:', 'वैशाली की नगरवधू' आदि से पूरे हिंदी जगत में धूम मचाने वाले आचार्य का 26 अगस्त को जन्मदिन होता है।

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आचार्य की सर्वाधिक चर्चित कृतियों में एक ‘वैशाली की नगरवधू’। इसके बारे में वह लिखते हैं - 'मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।'

ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित अपने अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासों 'गोली', 'सोमनाथ', 'वयं रक्षाम:', 'वैशाली की नगरवधू' आदि से पूरे हिंदी जगत में धूम मचाने वाले बुलंदशहर (उ.प्र.) के सुप्रितिष्ठित कथाशिल्पी आचार्य चतुरसेन शास्त्री का 26 अगस्त को जन्मदिन होता है। उन्होंने चार खंडों में लिखे गए सोना और ख़ून के दूसरे भाग में 1857 की क्रांति के दौरान मेरठ अंचल में लोगों की शहादत का मार्मिक वर्णन किया गया है। गोली उपन्यास में राजस्थान के राजा-महाराजाओं और दासियों के संबंधों को उकेरते हुए समकालीन समाज को रेखांकित किया गया है। अपनी समर्थ भाषा शैली के चलते शास्त्रीजी ने अद्भुत लोकप्रियता हासिल की और वह जन साहित्यकार बने।

द्विवेदी युग में देवकीनन्दन खत्री का उपन्यास 'चन्द्रकान्ता' पढ़ने के लिए तो लाखो लोगों ने हिन्दी सीखी। उनकी तरह ही उस जमाने के ख्यातनामा उपन्यासकार रहे वृंदावनलाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री आदि। सन 1943-44 के आसपास दिल्ली में हिन्दी भाषा और साहित्य का कोई विशेष प्रभाव नहीं था। यदाकदा धार्मिक अवसरों पर कवि-गोष्ठियां हो जाया करती थीं। एकाध बार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन भी हो जाया करता। उस समय आचार्य चतुरसेन शास्त्री और जैनेन्द्रकुमार के अतिरिक्त कोई बड़ा साहित्यकार दिल्ली में नहीं था। बाद में गोपाल प्रसाद व्यास, नगेन्द्र, विजयेन्द्र स्नातक आदि दिल्ली पहुंचे। आचार्य चतुरसेन ने 32 उपन्यास, 450 कहानियां और अनेक नाटकों का सृजन कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। ऐतिहासिक उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने कई अविस्मरणीय चरित्र हिन्दी साहित्य को प्रदान किए।

आचार्य की सर्वाधिक चर्चित कृतियों में एक ‘वैशाली की नगरवधू’। इसके बारे में वह लिखते हैं - 'मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।' भूमिका में उन्होंने स्वयं ही इस कृति के कथानक पर अपनी सहमति दी है - 'यह सत्य है कि यह उपन्यास है परन्तु इससे अधिक सत्य यह है कि यह एक गम्भीर रहस्यपूर्ण संकेत है, जो उस काले पर्दे के प्रति है, जिसकी ओट में आर्यों के धर्म, साहित्य, राजसत्ता और संस्कृति की पराजय, मिश्रित जातियों की प्रगतिशील विजय सहस्राब्दियों से छिपी हुई है, जिसे सम्भवत: किसी इतिहासकार ने आँख उघाड़कर देखा नहीं है।' उनकी अमर कृति 'वयं रक्षाम:' का मुख्य पात्र रावण है, न कि राम। यह कृति रावण से संबन्धित घटनाओं को रेखांकित करती है। उसका दूसरा पहलू है, इसमें दो तरह की जीवन-संस्कृतियों का संघर्ष प्रकाशमान होता है।

वह लिखते हैं- 'उन दिनों तक भारत के उत्तराखण्ड में ही आर्यों के सूर्य-मण्डल और चन्द्र मण्डल नामक दो राजसमूह थे। दोनों मण्डलों को मिलाकर आर्यावर्त कहा जाता था। उन दिनों आर्यों में यह नियम प्रचलित था कि सामाजिक श्रंखला भंग करने वालों को समाज-बहिष्कृत कर दिया जाता था। दण्डनीय जनों को जाति-बहिष्कार के अतिरिक्त प्रायश्चित जेल और जुर्माने के दण्ड दिये जाते थे। प्राय: ये ही बहिष्कृत जन दक्षिणारण्य में निष्कासित, कर दिये जाते थे। धीरे-धीरे इन बहिष्कृत जनों की दक्षिण और वहां के द्वीपपुंजों में दस्यु, महिष, कपि, नाग, पौण्ड, द्रविण, काम्बोज, पारद, खस, पल्लव, चीन, किरात, मल्ल, दरद, शक आदि जातियां संगठित हो गयी थीं।'

अपनी एक और ऐसी ही ख्यात औपन्यासिक कृति 'सोमनाथ' में आचार्य चतुरसेन लिखते हैं कि 'कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास 'जय सोमनाथ' को पढ़ कर उनके मन में आकांक्षा जागी कि वे मुंशी के नहले पर अपना दहला मारें; और उन्होंने अपने उपन्यास 'सोमनाथ' की रचना की।' 'वयंरक्षाम:' में उन्होंने कुछ नवीन तथ्यों की खोज की है, जिन्हें वे पाठक के मुँह पर मार रहे हैं। परिणामत: नहले पर दहला मारने के उग्र प्रयास में 'सोमनाथ' अधिक से अधिक चामत्कारिक तथा रोमानी उपन्यास हो गया है; और अपने ज्ञान के प्रदर्शन तथा अपने खोजे हुए तथ्यों को पाठकों के सम्मुख रखने की उतावली में, उपन्यास विधा की आवश्यकताओं की पूर्ण उपेक्षा कर वे 'वयंरक्षाम:' और 'सोना और ख़ून' में पृष्ठों के पृष्ठ अनावश्यक तथा अतिरेकपूर्ण विवरणों से भरते चले गए हैं। किसी विशिष्ट कथ्य अथवा प्रतिपाद्य के अभाव ने उनकी इस प्रलाप में विशेष सहायता की है।

आचार्य चतुरसेन की अन्य प्रसिद्ध कृतिया हैं अपराजिता, केसरी सिंह की रिहाई, धर्मपुत्र, खग्रास, पत्थर युग के दो बुत, बगुला के पंख आदि। चार खंडों में लिखे उपन्यास 'सोना और खून' के दूसरे भाग में सन् 1857 की क्रांति के दौरान मेरठ अंचल में लोगों की शहादत का मार्मिक वर्णन किया गया है। 'गोली' उपन्यास में राजस्थान के राजा-महाराजाओं और दासियों के संबंधों को उकेरते हुए समकालीन समाज को रेखांकित किया गया है। अपनी समर्थ भाषा शैली के चलते उन्होंने अद्भुत लोकप्रियता हासिल की और यही कारण रहा कि वह कालांतर में आम आदमी के उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हुए।

'एक राजा की मौत' में आचार्य चतुरसेन शास्त्री लिखते हैं - 'सामंतशाही के दौरान प्राचीन राजाओं में प्रथा थी कि राजा के मरते ही दूसरा राजा गद्दी पर बैठ जाता था। ‘राजा मर गया’ और ‘राजा चिरंजीवी रहे, ये दोनों घोषणाएँ एक साथ होती थीं। प्रथा थी कि राजा के मरते ही जब उसका पुत्र या कोई भी उत्तराधिकारी गद्दी पर बैठता था, तब सबसे पहली सूचना उसे यह दी जाती थी कि एक सैनिक मर गया है, उसके क्रिया कर्म की राजाज्ञा प्रदान हो। तब नया राजा कहता था – उचित सम्मान के साथ उसका क्रिया-कर्म किया जाये। राजा न उस मातम में सम्मिलित होता था और न शव को देखता था।' इस कृति का आगत-विस्तार पाठकों को रोचकता और रोमांच से भर देता है।

वह बताते हैं कि नेपाल के भूतपूर्व राजा त्रिभुवन की मृत्यु रोग शैया पर ज्यूरिच में हुई। उनका शव जब दिल्ली लाया गया, तब पालम हवाई अड्डे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, अन्य केन्द्रीय मंत्री, विदेशी राजदूत, उच्च अधिकारी, तीनों सेनाओं के प्रधान, नई दिल्ली स्थित नेपाली राजदूत तथा दिल्ली के सहस्त्रों नागरिकों ने शव को श्रद्धांजलि अर्पित की। शव पर नेहरू जी ने व राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति की ओर से तीनों सेनाओं के प्रधानों ने पुष्प चक्र चढ़ाए।

वह बताते हैं कि 'संभवतः यह सन् 1910-11 की बात है। उन दिनों में जयपुर संस्कृत कॉलेज में पढ़ता था। आयु यही कोई उन्नीस-बीस वर्ष की रही होगी। तभी जयपुर के राजा माधोसिंह का देहांत हो गया। मैंने देखा कि सिपाहियों के झुण्ड के साथ नाइयों की टोली बाजार – बाजार, गली – गली घूम रही है। वे राह चलते लोगों को जबरदस्ती पकड़कर सड़क पर बैठाते और अत्यंत अपमान पूर्वक उनकी पगड़ी एक ओर फेंककर सिर मूंड देते, दाढ़ी-मूंछ सफाचट कर देते थे। मेरे अड़ोस-पड़ोस में जो भद्रजन रहते थे, उन्होंने स्वेच्छा से सिर मुंडवाये थे। अजब समां था, जिसे देखो वह सिर मुंडवाये जा रहा था। यह देख मेरा मन विद्रोह से भर उठा। मेरी अवस्था कम थी, अतः दाढी-मूंछ तो नाम मात्र की ही थीं, किन्तु सिर पर लम्बे बाल अवश्य थे। मुझे उन बालों से कोई विशेष लगाव भी नहीं था, किन्तु इस प्रकार जबरदस्ती सिर मुंडाने के क्या मायने?

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