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‘पढ़ेंगी तभी तो बढ़ेंगी लड़कियां’ इस सोच को हकीकत में बदल रहा है एक युवा

6th Apr 2016
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जो कभी छात्र थे, आज दूसरे बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद वो चाहते तो अच्छी खासी नौकरी भी कर सकते थे, लेकिन उन्होने उन बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचा जिनके लिये स्कूल जाना दूर की कौड़ी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से गणित में ऑर्नस करने वाले धीरेंद्र उत्तर प्रदेश के सीतापुर में ‘स्वरचना’ नाम से सीनियर सेकेंडरी स्कूल चला रहे हैं जहां पर सैकड़ों बच्चे मामूली फीस देकर आला दर्जे की तालीम हासिल कर रहे हैं। इतना ही नहीं ये गांव के बेरोजगार युवाओं को उन चीजों की ट्रेनिंग दे रहे हैं जिसकी मदद से वो अपने पांव पर खड़े हो सकें। धीरेंद्र ये सारा काम अपनी संस्था ‘मिलान’ के जरिये कर रहे हैं।


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धीरेंद्र ने अपने दोस्तों शरद, देवाशीष और ऐनी के साथ मिलकर साल 2008 में ‘मिलान’ की शुरूआत की थी। वो बताते हैं, 

"जब मैंने सीतापुर में सरकारी स्कूलों में बच्चों के साथ काम करना शुरू किया तो पाया कि आज देश के विकास में शिक्षा के सुधार की बात होती है। लेकिन गांवों के स्कूलों में 150 बच्चों पर केवल 2 ही टीचर होते हैं और उनमें से भी 1 टीचर का आधे से ज्यादा वक्त मिड-डे मिल की तैयारियों में चला जाता है। जबकि मेरा मानना था कि सिस्टम में रहकर उसकी आलोचना करना तो आसान होता है लेकिन सिस्टम में रहकर उसमें सुधार करना चुनौतीपूर्ण होता है और मैंने इसी चुनौती को स्वीकार किया।"


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इस काम को शुरू करने से पहले धीरेंद्र को इंडिया फेलोशिप प्रोग्राम के तहत उत्तराखंड में बच्चों के साथ काम करने का मौका मिला। जिसके बाद जब वो सीतापुर आये तो उन्होने पाया कि गांव में स्कूल काफी दूर हैं और जो हैं भी उनमें पढ़ने वाले ज्यादा और पढ़ाने वाले कम हैं। इस समस्या को लेकर उन्होंने गांव वालों से बात की तो उनका कहना था कि वो अपने गांव में ऐसा स्कूल खोलना चाहते हैं जहां उनके बच्चे भी पढ़ सकें। तब उन्होंने पंचायत की मदद से 1 एकड़ जमीन हासिल की साथ ही गांव वालों ने स्कूल खोलने के लिए उनको 1 लाख रुपये भी दिये। धीरेंद्र को ना तो स्कूल चलाने का अनुभव था और ना ही उन्होंने सोचा था कि वो ऐसा कुछ करेंगे। लेकिन हालात ऐसे बने कि यहां से पीछे मुड़ना नामुकिन था, तो वो दिल्ली लौट आए और स्कूल खोलने के लिए विभिन्न कॉलेजों में कैंपेन चलाया। जिसके जरिये उन्होंने 2 लाख रुपये और जुटाये। इसके अलावा एक फंड एजेंसी ने उनके इस काम में मदद की।


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करीब 48 बच्चों के साथ धीरेंद्र ने साल 2008 में ‘स्वरचना’ नाम से सीनियर सेकेंडरी स्कूल की स्थापना की। जहां आज चार सौ से ज्यादा बच्चे अपने तकदीर संवार रहे हैं। धीरेंद्र के मुताबिक 

“मेरा उद्देश्य केवल स्कूल खोलना ही नहीं था बल्कि हम चाहते थे कि उन लड़कियों को दोबारा स्कूल लाया जाये, जिन्होने विभिन्न वजहों से स्कूल जाना छोड़ दिया था। हमारी कोशिश थी कि ये लड़कियां कम से कम हाई स्कूल तक की पढ़ाई पूरी कर सकें।” 

अपने स्कूल के साथ धीरेंद्र और उनकी टीम ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए आस पास के कई सरकारी स्कूलों के साथ भी जुड़ने की कोशिश की और उसे नाम दिया ‘मिलान आउटरीच प्रोगाम’। इसके तहत इन्होने 20 सरकारी स्कूलों के कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों को अपने साथ जोड़ा और उनकी शिक्षा का स्तर बढ़ाने की कोशिश की।

अपने अनुभव के बारे में धीरेंद्र बताते हैं, 

“इस काम को जब हमने उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में शुरू किया तो कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों को हिंदी में फॉर्म भरना तक नहीं आता था। सरकार आज ‘राइट टू एजुकेशन’ के तहत अनेक स्कूल खोल रही है, नये टीचरों की भर्ती कर रही है बावजूद एक रिर्पोट बताती है कि हर 100 बच्चों में से केवल 1 बच्चा ही 12वीं तक की अपनी शिक्षा को पूरी कर पाता है।” 

धीरेंद्र ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए गांव के पढ़े लिखे युवाओं को साथ लेकर ‘लाइफ स्किल प्रोगाम’ तैयार किया। ये तीन चरणों में काम करता है। पहले चरण में युवा लोग स्कूल में जाकर बच्चों को किताबी ज्ञान के अलावा दूसरी जानकारियां देते है। दूसरे चरण में 10 बच्चे एक्शन प्रोगाम के तहत गांव के लोगो को शिक्षा का महत्व समझाते हैं। तीसरे चरण में ये शिक्षकों और अभिभावकों के मिलकर स्कूल में शिक्षा का स्तर बढ़ाने पर काम करते हैं।


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धीरेंद्र और उनकी टीम पिछले कई सालों से इस कोशिश में है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को स्कूल लाया जाये। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन लोगों ने ‘गर्ल आइकॉन फेलोशिप प्रोगाम’ शुरू किया है। इसमें 12 साल से लेकर 18 साल की उन लड़कियों को शामिल किया जाता है। जिन्होंने समाज में रहकर लोगों के जीवन में बदलाव लाने और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है। ये 2 साल का लीडरशिप प्रोगाम है। इसे साल 2015 में इन्होंने सरकार के साथ शुरू किया है। धीरेन्द्र बताते हैं “जब हमने इसके लिए आवेदन मांगे तो हमें उम्मीद थी कि इसके लिये कुछ ही आवेदन आएंगे लेकिन हमें तब आश्चर्य हुआ जब 22 सौ से ज्यादा आवेदन हमारे पास आये और उनमें से हमने 10 लड़कियों को चुना।”


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धीरेन्द्र के मुताबिक इन लड़कियों की सफलता उनके लिए प्रेरणा है। ये लोगों के बीच जाकर लड़कियों के काम को बताते हुए कहते हैं कि ये लड़कियां भी समाज का हिस्सा हैं और अगर ये कुछ कर सकती हैं तो दूसरी लड़कियां क्यों नहीं ऐसा काम कर सकतीं। वो कहते हैं कि मिलान का असली फोकस लड़कियों के बीच शिक्षा का प्रसार और उनके आगे बढ़ने में आ रही रूकावटों को दूर करना है। धीरेंद्र मानते हैं कि लोगों के विचारों को बदलने में समय लगता है और वो ये काम अपने वालंटियर की मदद से करते हैं जिन्होंने महिलाओं को ये समझाने में काफी काम किया की अगर वो अपनी लड़कियों को पढ़ाएंगे तो उनकी लड़कियों को उनकी तरह नहीं रहना पड़ेगा और वो पढ़ लिख कर आत्मनिर्भर बन सकेंगीं।


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अपनी परेशानियों के बारे में धीरेंद्र का कहना है कि गांवों में आज भी लोगों को ये समझाना काफी मुश्किल होता है कि वो लड़कियों को स्कूल भेजें। गांव वाले मानते हैं कि अगर वो लड़की को ज्यादा पढ़ायेंगे तो उनको लड़का भी ज्यादा पढ़ा लिखा ढूंढना पड़ेगा। साथ ही वे लोग लड़कियों की शिक्षा पर भी खर्च नहीं करना चाहते। वे लड़कियों को तभी स्कूल भेजते हैं जब उनके पास कोई काम नहीं होता। बावजूद इसके धीरेंद्र और उनकी टीम सीतापुर और उसके आसपास के जिलों में लड़कियों पढ़ाने और उनको बढ़ाने का काम जारी रखे हुए हैं। 

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