संस्करणों
विविध

हौसला: 35 वर्षीय तमीम बुर्के में चेन्नई की लड़कियों को देती हैं ट्रेनिंग

19th Oct 2018
Add to
Shares
178
Comments
Share This
Add to
Shares
178
Comments
Share

 किसी मुस्लिम महिला का फुटबॉल कोच बनना और अपने ही जैसी लड़कियों को ट्रेनिंग देना किसी सपने के पूरे हो जाने से कम नहीं है। चेन्नई की 35 वर्षीय तमीमुन्निसा जब्बार ऐसी ही महिला हैं जो लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं। उन्हें प्यार से लोग तमीम भी बुलाते हैं।

तमीम (फोटो साभार- टाइम्स ऑफ इंडिया)

तमीम (फोटो साभार- टाइम्स ऑफ इंडिया)


तमीम 1990 में चेन्नई के चेंगलपेट में पढ़ाई कर रही थीं तब उनका परिचय फुटबॉल से हुआ था। सिर्फ दो सालों के भीतर ही उन्होंने स्टेट लेवल मैच खेला था और कांचीपुरम में मैच भी जितवाया था। 

हमारा समाज महिलाओं को लेकर इतनी दकियानूस सोच रखता है कि जब वे घर से बाहर कदम रखने की सोचती हैं तो किसी न किसी बहाने से उन्हें रोक लिया जाता है। मुस्लिम महिलाओं की हालत तो और भी दयनीय है। ऐसे में किसी मुस्लिम महिला का फुटबॉल कोच बनना और अपने ही जैसी लड़कियों को ट्रेनिंग देना किसी सपने के पूरे हो जाने से कम नहीं है। चेन्नई की 35 वर्षीय तमीमुन्निसा जब्बार ऐसी ही महिला हैं जो लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं। उन्हें प्यार से लोग तमीम भी बुलाते हैं।

चेन्नई में मुस्लिम महिला एसोसिएशन स्कूल की टीम में फॉर्वर्ड खेलने वाली 14 वर्षीय आबिदा को भी तमीम ट्रेनिंग देती हैं। आबिदा बीते तीन सालों में 25 मैच खेल चुकी है। लेकिन प्रैक्टिस करने के बाद मैदान से बाहर आने पर उसकी जिंदगी बदल जाती है। वह मैदान में कुछ और होती है और बाहर कुछ और। इसके पीछे की वजह तमीम बताती हैं। वह कहती हैं कि आबिदा के परिवार को उसका फुटबॉल खेलना पसंद नहीं है। लेकिन ऐसी ही रूढ़िवादी परिवार से आने वाली लड़कियों के लिए तमीम ने फुटबॉल सिखाने का फैसला किया।

मैदान पर आपको हिजाब और फुल पैंट्स में फुटबॉल खेलती लड़कियां दिख जाएंगी। तमीम बताती हैं कि इस ड्रेस में फुटबॉल खेलने पर इन लड़कियों के खेल पर कोई असर नहीं पड़ता। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक तमीम मुस्लिम महिला एसोसिएशन स्कूल की पीटी टीचर भी हैं। वह खुद ही लड़कियों का ख्याल ध्यान रखती हैं और प्रैक्टिस के बाद सूरज ढलने से पहले लड़कियों को सुरक्षित घर पहुंचाती हैं। वह कहती हैं, 'अधिकतर परिवार लड़कियों के स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने पर सहमत नहीं होते हैं इसलिए मुझे इन लड़कियों को हिजाब पहनाना पड़ता है। इससे कम से कम वे खेल में हिस्सा को ले पाती हैं।'

आबिदा के चाचा इमाम हैं और उन्हें व आबिदा के पूरे परिवार को समझाने में तमीम को काफी वक्त लग गया। उन्होंने समझाया कि आबिदा एक अच्छी खिलाड़ी है और वह आगे जाकर अच्छा कर सकती है। तमीम कहती हैं, 'मैं शायद इस चीज को बहुत अच्छे से समझ सकती हूं क्योंकि मैंने भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना किया था। मैं फुटबॉल के बाहर करियर बनाने का प्रयास कर रही थी तो मेरा संघर्ष दो स्तरों पर था। एक तो स्कूल के स्तर पर और दूसरा परिवार को समझाना।'

तमीम 1990 में चेन्नई के चेंगलपेट में पढ़ाई कर रही थीं तब उनका परिचय फुटबॉल से हुआ था। सिर्फ दो सालों के भीतर ही उन्होंने स्टेट लेवल मैच खेला था और कांचीपुरम में मैच भी जितवाया था। तमीम कहती हैं, 'अगर मेरे कोच ने मेरे घरवालों को नहीं समझाया होता तो मैं दसवीं पास करने के बाद घर बैठ जाती और 18 साल पूरा होने पर मेरी शादी हो जाती।' अपने दिनों में तमीम ने कई स्टेट लेवल के मैच खेले और 1999 में ऊटी में हुए एक मैच में उन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया कि उन्हें अखबारों ने 'लेडी बाइचुंग भूटिया' का उपाधि दे दी।

अखबार में अपनी बेटी का नाम देखने के बाद तमीम के पिता की आंखों में आंसू आ गए थे। उन्होंने ही बाद में तमीम को कोच बनने के लिए प्रेरित किया और अपने ही जैसी लड़कियों को फुटबॉल सिखाने की सलाह दी थी। तमीम के स्कूल में पढ़ने वाली स्मिता निहार और शिरीन जमेखा रोज प्रैक्टिस करने के लिए फुटबॉल मैदान पर आती हैं। उनकी सारी पॉकेट मनी स्कूल से फुटबॉल मैदान तक प्रैक्टिस करने के लिए आने में ही खर्च हो जाती है। वे दोनों कहती हैं, 'हमारे लिए तमीम मैम सिर्फ एक मेंटर नहीं हैं, वो हमारी दोस्त की तरह हैं जो हमें अच्छी तरह समझती हैं।'

एमडब्ल्यूए टीम ने स्कूल स्तर से लेकर जोनल, जिला और विभागीय मैचों में भाग लिया है। टीम ने पिछले साल कराइकुडी में आयोजित राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में प्रवेश किया और दस अन्य शहर की टीमों से सुपर लीग में खेलने के लिए योग्यता हासिल की। तमीम अब इन लड़कियों को आगे खेलते देखना चाहती हैं। वो चाहती हैं कि ये लड़कियां देश के लिए भी खेलें। तमीम इन लड़कियों के खानपान का भी पूरा ध्यान रखती हैं। इसके साथ ही वे इनके स्किल्स पर खासा ध्यान देती हैं।

यह भी पढ़ें: केरल में अब मुस्लिम महिलाओं के फोरम ने मस्जिद में प्रवेश के लिए मांगा सुप्रीम कोर्ट से अधिकार

Add to
Shares
178
Comments
Share This
Add to
Shares
178
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags