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'लड़के ही बुढ़ापे का सहारा होते हैं' वाली कहावत को झुठला रही है ये बेटी

7th Oct 2017
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'बेटियां पराया धन होती हैं' ये बात आपने सैंकड़ों लोगों के मुंह से लाखों बार सुनी होगी, पर ये सच नहीं है। जी हां! बेटियों को लेकर गढ़ी गई ऐसी हजारों बाते हैं, जहां बेटियों ने अपनी जीवटता और जिजिविषा से समाज को आइना दिखाया है कि बेटियां पराया धन नहीं होती हैं। भारतीय जनमानस में रची-बसी सात कन्याओं का जिक्र भी आपने सुना होगा।

फोटो, दिव्या की फेसबुक वॉल से

फोटो, दिव्या की फेसबुक वॉल से


घर के बुजुर्गों से सुनी लाइन कि 'प्रात: लीजै सात कन्याओं' के नाम में एक कन्या का नाम और जुड़ गया है ये नाम है दिव्या पांडा का। दिव्या, उस्मानिया विश्वविद्यालय के पैथॉलजी डिपॉर्टमेंट से एमडी कर रही हैं। दिव्या पढ़ाई के साथ एक ऐसी जिम्मेदारी निभा रही हैं जिसके लिए बेटा होना एक जरूरी और पहली शर्त है।

मेडिकल स्टूडेंट दिव्या उम्र के उस पड़ाव से गुजर रही हैं जिसे लड़कों के लिए खेलने-कूदने की उम्र कहा जाता है। इस खलने कूदने की उम्र में दिव्या अपने पिता को हुए हृदयाघात के बाद से परिवार का भरण-पोषण करने के साथ-साथ माता-पिता का इलाज भी करा रही हैं।

'बेटियां पराया धन होती हैं' ये बात आपने सैंकड़ों लोगों के मुंह से लाखों बार सुनी होगी, पर ये सच नहीं है। जी हां! बेटियों को लेकर गढ़ी गई ऐसी हजारों बाते हैं, जहां बेटियों ने अपनी जीवटता और जिजिविषा से समाज को आइना दिखाया है कि बेटियां पराया धन नहीं होती हैं। भारतीय जनमानस में रची-बसी सात कन्याओं का जिक्र भी आपने सुना होगा। घर के बुजुर्गों से सुनी लाइन कि 'प्रात: लीजै सात कन्याओं' के नाम में एक कन्या का नाम और जुड़ गया है ये नाम है दिव्या पांडा का। दिव्या, उस्मानिया विश्वविद्यालय के पैथॉलजी डिपॉर्टमेंट से एमडी कर रही हैं। दिव्या पढ़ाई के साथ एक ऐसी जिम्मेदारी निभा रही हैं जिसके लिए बेटा होना एक जरूरी और पहली शर्त है। मेडिकल स्टूडेंट दिव्या उम्र के उस पड़ाव से गुजर रही हैं जिसे लड़कों के लिए खेलने-कूदने की उम्र कहा जाता है। इस खलने कूदने की उम्र में दिव्या अपने पिता को हुए हृदयाघात के बाद से परिवार का भरण-पोषण करने के साथ-साथ माता-पिता का इलाज भी करा रही हैं।

जब कंधे पर आ गई दोहरी जिम्मेदारियां-

दिसम्बर 2016 में दिव्या के पापा पीताम्बर पाण्डा को पहली बार हृदयाघात पड़ा। उस समय सबकुछ अकेले सहना भी पड़ा और करना भी। घर का खर्च, पापा की दवाई, चेकअप सबकुछ पर दिव्व्या ने कभी हार नहीं मानी और हर तरह की परेशानी दिव्या की जीवटता से हारती गई। पिता को हर्टअटैक होने के बाद मेडिकल स्टूडेंट दिव्या ने शक को दूर करने के लिए पापा के चेकअप्स कराए तो पता चला कि उनको बाइपास सर्जरी करानी होगी। उस वक्त दिव्या ने खुद को मजबूत बनाने के साथ-साथ सफल बाइपास सर्जरी कराई। सर्जरी के बाद पापा की जिंदगी पुराने ढर्रे पर लौट आई, पर इस सबके दौरान दिव्या को पता चला कि उनका पुश्तैनी जैविक खेती के उत्पादों का कारोबार लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच चुका है।

सबकुछ सामान्य हो चुका था, पिता अपने कारोबार को पटरी पर लाने की कोशिश में लगे थे, और दिव्या अपनी डाक्टरी की पढ़ाई को; पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2017 के अगस्त महीने में एक बार फिर एक पीर का तीर इस बार दिव्या की मां अरुणा के कलेजे में गड़ गया। पांच साल पहले से हुई किडनी की समस्या एक दिन इस हद तक पहुंच जाएगी किसी ने सोचा भी नहीं था। असहनीय पीड़ा का तीर मां के गुर्दे से होते हुए कब मां के दिल को चीर गया, किसा को कानों-कान खबर तक न हुई; जब पता चला तब तक देर हो चुकी थी। मां वेंटीलेटर पर मौत से जिंदगी की जंग लड़ रही थी और बेटी जंग लड़ रही थी रुपयों के इंतजाम करने से। हालांकि इस जंग में महावीर अस्पताल और तेलंगाना का मुख्यमंत्री कार्यालय दिव्या का साथ दे रहे थे। सप्ताह में जीन बार होने वाली डॉयलिसिस के खर्चों को पूरा करने में जितनी मुश्किलें हो रही थीं, उससे कहीं ज्यादा दुश्वारियां अरुणा को जिंदा रहने में हो रही थीं। चेकअप हुए डाक्टरों ने दवाएं लिखी और नतीजों में पता चला कि किडनी बदले बिना मां के दिल का धड़कना नामुमकिन है और उनका बचना भी।

मां के ऑपरेशन के बाद सेल्फी में दिव्या

मां के ऑपरेशन के बाद सेल्फी में दिव्या


जब युवा दिव्या ने किडनी दे बचाई मां-

मौत एक बार फिर से दिव्या से दो हाथ करने को खड़ी थी और दिव्या मौत से। मां को बचाने के लिए दिव्या ने अपनी किडनी डोनेट करने का फैसला किया, और ट्रांसप्लांटेशन में होने वाले खर्च को क्रॉउड फंडिंग से जुटाने के लिए एनआरआई फ्रेंड रितेश रेड्डी की मदद ली। रितेश ने गो फण्ड मी नाम से एक कैंपेन चलाकर ट्रांसप्लांटेशन के लिए रुपए जुटाए, फिर इसके बाद एशियन इंस्चीट्यूट ऑफ नीफ्रोलजी एण्ड यूरोलजी में दिव्या ने मां को बतौर पेशेंट और खुद बतौर किडनी डोनर एडमिट कराकर किडनी ट्रांसप्लांट हो चुकी है। दोनों ने मौत को मात दी है, पर बेटी ने मौत को मात देने के साथ ही समाज की उन स्थापित रुढ़िवादी मान्यताओं को भी एक चुनौती देकर मिशाल पेश की है कि लड़कियां पराया धन नहीं होती हैं।

एकल और बिखरते परिवारों के समय में दिव्या ने समाज को एक राह दी है कि बेटियों पर भरोसा करो, वो आपको अनाथ आश्रम तक नहीं जाने देंगी।  

ये भी पढ़ें: मिलिए लगातार तीन नेशनल चैंपियनशिप अपने नाम करने वाली भारत की पहली बॉडीबिल्डर सरिता से

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