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रंग ऐसा हूँ, सभी पर छा रहा हूँ

8 जून, कवि 'बलबीर सिंह रंग' की पुण्यतिथि पर विशेष...

8th Jun 2017
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अपने शब्दों की तरह स्वभाव में भी कवि बलबीर सिंह रंग के मन-मिजाज कुछ अलग हुआ करते थे। उनको कविगण दद्दा कहते थे। एक बार वह बीमार हो जाने पर अस्पताल में भर्ती कराए गए। उन्हें देखने के लिए कवि सुरेंद्र सुकुमार अस्पताल पहुंचे। वहां दीवार पर एक पट्टिका चस्पा थी, जिस पर लिखा था...

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अपनी रचनाधर्मिता पर अपने ही शब्दों में वह कुछ इस तरह व्यक्त होते हैं- 'हमने जो भोगा सो गाया, अकथनीयता को दी वाणी, वाणी को भाषा कल्याणी, कलम कमण्डल लिये हाथ में दर-दर अलख जगाया।' कवि रंग को हिंदी काव्य 'मंचों का हंस' भी कहा जाता है।

इन दिनो मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन की लपटें उठ रही हैं। प्रसंगवश ऐसे में याद आते हैं देश के जाने-माने कवि बलबीर सिंह रंग। आज उनकी पुण्यतिथि भी है। किसान का दुख गाते हुए वह लिखते हैं- खेतों में खलिहानों में अभी लड़ाई जारी है। रंग के शब्द खेत-खलिहानों के साथ रंग जमाया करते थे। वह किसानों के कवि माने जाते हैं। अपने एटा जिले के गांव नगला कटीला (उ.प्र.) के जमींदार होने के बावजूद कवि रंग की ज्यादातर कविताओं में गांव का दुख-दर्द मुखर हुआ है। वह लिखते हैं कि 'मैं परंपरागत किसान हूं, धरती के प्रति असीम मोह और पूज्य भावना किसान का जन्मजात गुण है, यही उसकी शक्ति है और यही उसकी निर्बलता। मैं स्वीकार करता हूं कि मुझमें भी यही संस्कार सबसे प्रबलतम रूप में रहा है, आज भी है। ग्रामीण जीवन की वेदनाएं, विषमताएं और हास-विलास दोनो ही मेरी कविता की प्रेरणा और पूंजी हैं।'

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अपनी रचनाधर्मिता पर अपने ही शब्दों में वह कुछ इस तरह व्यक्त होते हैं- 'हमने जो भोगा सो गाया, अकथनीयता को दी वाणी, वाणी को भाषा कल्याणी, कलम कमण्डल लिये हाथ में दर-दर अलख जगाया।' कवि रंग को हिंदी काव्य मंचों का हंस भी कहा जाता है।

अपने शब्दों की तरह स्वभाव में भी रंग के मन-मिजाज कुछ अलग हुआ करते थे। उनको कविगण दद्दा कहते थे। एक बार वह बीमार हो जाने पर अस्पताल में भर्ती कराए गए। उन्हें देखने के लिए कवि सुरेंद्र सुकुमार अस्पताल पहुंचे। वहां दीवार पर एक पट्टिका चस्पा थी, जिस पर लिखा था- कृपया मरीज से कम बात करें। मुलाकाती वहां लगभग एक घण्टा रहे, तब तक रंग जी उनसे लगातार बातें करते रहे। किसी और को बोलने ही नहीं दिया। जब मुलाकाती लौटने लगे तो सुरेंद्र सुकुमार ने कहा- दद्दा इस पट्टिका को बदलवा दें और उस पर लिखवा दें- कृपया मरीज को कम बोलने दें। रंग जी ने तपाक जवाब हाजिर किया - तुम नहीं सुधरोगे

उनके स्वर में प्रश्न उठा करते थे, कि हम सिर्फ जमींदारी मिटाते हैं, तो क्या किसानी मिटाई जाएगी? किसानी तो खेती में साधक है। खेते में कोई हल चलाता है, कोई कुदाल। कोई बैलों को खिलाता है, कोई खेत-खलिहान की रखवाली करता है तो कोई खाद-गोबर और कोई दौनी-ओदौनी। एक संवेदनशील गीतकार और कृषक के मन से निर्मित सामंजस्य को उन्होंने अपने राष्ट्रीय कविता-संग्रह 'सिंहासन' में भी व्यक्त किया है।

एक जमाने में हिंदी के मंचों पर कवि रंग का अपना अलग ही रंग हुआ करता था। जिस तरह गीतों में वह शीर्ष कवियों के बीच शुमार होते थे, वैसे ही गजलों में भी उनकी बादशाहत थी...

"हमने तन्हाई में जंजीर से बातें की हैं,

अपनी सोई हुई तकदीर से बातें की हैं,

रंग का रंग जमाने ने बहुत देखा है,

क्या कभी आपने बलबीर से बातें की हैं।"

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गजलों की दुनिया में भविष्य के खालीपन को पहचानते हुए रंग ने अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया है- 'रंग के बाद संवारेगा कौन महफिल को, कोई तो नाम बताओ, बड़ी कृपा होगी।' गीत की मुहावरेदारी से अलहदा अपने पैमाने पर रंग का नाम सबसे पहले आता है। रंग के बाद रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, नीरज, भारत भूषण, मुकुटबिहारी सरोज जैसे अनेक शोहरत में रहे लेकिन जो कुछ रंग में था, सहज-सहज, न कहा जाए तो बात अधूरी सी रहे-

"रंग ऐसा हूँ सभी पर छा रहा हूँ मैं,

कौन कहता है कि पीछे जा रहा हूँ मैं।"

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