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527 से अधिक वीरों की शहादत ने लिखी कारगिल विजय की इबारत

प्रणय विक्रम सिंह
26th Jul 2017
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कारगिल की सफेद बर्फ को अपने लहू से लाल कर देेने वाले हिंदोस्तानी फौज के जांनिसारों ने युद्ध इतिहास के शिलापट पर शौर्य, बलिदान और समपर्ण के अमर शिलालेखों का आचमन और स्मरण दिवस है कारगिल विजय दिवस। ज्ञात हो कि कारगिल युद्ध में मां भारती के ललाट पर विजय का रक्त चंदन लगाने वाले लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हंसते-हंसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

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18 साल से अनुत्तरित हैं जैसे कारगिल में मिली सफलता आखिर विजय कैसी? अपनी ही धरती पर लड़े गए युद्ध में अपने ही इलाके को खाली करवाने में पाई गई कामयाबी को क्या फतह या विजय के नामों से पुकारा जाना चाहिए था?

18 साल पहले कारगिल में लगी आग अभी बुझी नहीं है। यह अभी भी सुलग रही है। यह कब तक ठंडी पड़ेगी कोई सुनिश्चित तौर पर कहने की स्थिति में नहीं। इस आग में अभी और कितने घर, कितने परिवार जलेंगे, कोई नहीं जानता। 

आज कारगिल विजय दिवस है। लेकिन विजय किस पर? विजय दोस्त की शक्ल में पीठ पर वार करने वाले पाकिस्तान पर, विजय इंसानियत के दुश्मन पर, विजय आंतक के सरपरस्त पर, विजय आतंक को मजहबी शक्ल देने वाले मुल्क पर। आज से 18 साल पहले कारगिल वीरों की तपस्थली बना हुआ था। मां भारती के रणबांकुरे रणचंडिका की वेदी पर शत्रु मुण्डों की माला भेंट कर विजय की गाथा लिख रहे थे। कारगिल की सफेद बर्फ को अपने लहू से लाल कर देेने वाले हिंदोस्तानी फौज के जांनिसारों ने युद्ध इतिहास के शिलापट पर शौर्य, बलिदान और समपर्ण के अमर शिलालेखों का आचमन और स्मरण दिवस है कारगिल विजय दिवस। ज्ञात हो कि कारगिल युद्ध में मां भारती के ललाट पर विजय का रक्त चंदन लगाने वाले लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 बसंत भी नहीं देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हंसते-हंसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।

साल 1999 मई के शुरुआती दिन थे। करगिल के बटालिक सेक्टर के गारकॉन गांव का रहने वाला ताशि नामग्याल अपने घर से थोड़ी दूर, गुम हो गई याक को ढूंढने निकलता है कि उसकी नजर काले कपड़े पहने हुए छह बंदूकधारियों पर पड़ी, जो पत्थरों को हटा कर रहने की जगह बना रहे थे। ताशि ने ये बात स्थानीय भारतीय सैनिकों तक पहुंचाई और जल्द ही सेना की ओर से एक दल को जांच के लिए भेजा गया और इस तरह करगिल में घुसपैठ का पता चला। भारतीय सेना को घुसपैठियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और शुरुआत में भारत की ओर से कहा गया कि चरमपंथियों को जल्द ही निकाल दिया जाएगा। लेकिन जल्द साफ हो गया कि भारतीय सेना का सामना पाकिस्तानी सैनिकों से था। जंग शुरू होती है। गोलियों की गडग़ड़ाहट, बमों और मोटार्रो के बारूदी धमाकों के दरम्यान हिंदुस्तानी हौसलों ने सबसे पहले 13 जून को तोलोलिंग पहाड़ी पर तिरंगा फहराया। इस हमले में 17 सैनिक शहीद हुए और 40 सैनिक घायल हुए। इस विजय के बाद भारतीय सेना का मनोबल काफी बढ़ गया। इसके बाद सामरिक महत्व की एक अन्य चोटी टाइगर हिल से दुश्मन को मार भगाने की जिम्मेदारी 18 ग्रेनेडियर को दी गई। इसने पूर्वी और पश्चिमी तरफ से आगे बढ़ने का फैसला किया। यह देखकर दुश्मन चकरा गया और उसने चार जुलाई को टाइगर हिल को भी खाली कर दिया। 

थलसेना की कार्रवाई के साथ-साथ 26 मई को भारतीय वायुसेना ने थलसेना की सहायता के लिए 'ऑपरेशन सफेद सागर' भी शुरू किया। इससे पहले वायुसेना को इतने दुर्गम क्षेत्र में काम करने का अवसर नहीं मिला था। 12 जुलाई तक वायुसेना के विमानों ने 580 उड़ानें भरीं। उनके साथ-साथ हेलीकॉप्टरों ने 2500 उड़ानें भरकर घायल जवानों को युद्घ क्षेत्र से अस्पताल तक लाने का कार्य किया। नौसेना ने भी 'ऑपरेशन तलवार' के तहत अपने युद्धपोत को अरब सागर में तैनात करके पाकिस्तान पर सामरिक दबाव बनाया। दो महीने तक चले साहसिक जवाबी हमलों द्वारा भारतीय सेना ने एक के बाद एक पहाड़ियों पर फिर से अपना कब्जा कर लिया। शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि घुसपैठिये कश्मीरी मुजाहिदीन नहीं थे जैसा कि पाकिस्तान बार-बार कह रहा था। वे तो पाकिस्तान की नियमित सेना की नॉर्दन लाइट इंफैंट्री के जवान थे। पाकिस्तानी सैनिकों की उपस्थिति के ठोस प्रमाण उनकी डायरियों, पे बुक एवं अन्य दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध होते गए। इन प्रमाणों से स्पष्ट हो गया कि कारगिल में घुसपैठ दरअसल एक सुनियोजित सैन्य आक्रमण था। 

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तान की नार्दर्न लाइट इंफैंटरी की यूनिटों का पता लगने के कुछ महीने पहले भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लाहौर में मिले थे। जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वार्ता की गर्मजोशी के माहौल का आनंद ले रहे थे उसी समय पाकिस्तान की सेना कारगिल में घुसपैठ कर रही थी। भारतीय प्रधानमंत्री की लाहौर बस यात्रा का मकसद 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देशों के आपसी संबंधों को सामान्य करना था। पाकिस्तान ने एक तरह से एक बार फिर पीठ में खंजर भोंकने वाला काम किया। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना की कमान जनरल वीपी मलिक के हाथों में थी। उनका कहना है कि सेनाओं और सैनिकों की अंतिम परीक्षा युद्ध में ही होती है। हर लड़ाई में हथियारों और उपकरणों की गुणवत्ता के साथ-साथ सैनिकों का युद्ध कौशल, रेजीमेंट भावना और सबसे ऊपर जीतने की इच्छा-शक्ति और पक्का इरादा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन यहां कुछ सवाल भी हैं जो विगत 18 साल से अनुत्तरित हैं जैसे कारगिल में मिली सफलता आखिर विजय कैसी? अपनी ही धरती पर लड़े गए युद्ध में अपने ही इलाके को खाली करवाने में पाई गई कामयाबी को क्या फतह या विजय के नामों से पुकारा जाना चाहिए था? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि पाकिस्तान बार-बार भारत को अपनी ही धरती पर दुश्मन से मुकाबला करने के लिए मजबूर कर रहा है? इस प्रश्न को भी उठाता है कि कहां गए वे बयान और वे चेतावनियां जिनमें अक्सर कहा जाता था कि अगला युद्ध शत्रु की भूमि पर होगा? क्या राजनयिक मोर्चों पर मिलने वाली कामयाबी, उन परिवारों के दिलों पर लगे जख्मों को भर पाएगी जिनके प्रियजनों को कारगिल की लड़ाई लील गई थी?

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वैसे भी 18 साल पहले कारगिल में लगी आग अभी बुझी नहीं है। यह अभी भी सुलग रही है। यह कब तक ठंडी पड़ेगी कोई सुनिश्चित तौर पर कहने की स्थिति में नहीं। इस आग में अभी और कितने घर, कितने परिवार जलेंगे, कोई नहीं जानता। खैर इन यक्ष प्रश्नों के दरम्यान हमें भारतीय सेना की कर्तव्य परायणता, बलिदान और शौर्य की अपनी पुरानी और बेजोड़ परंपरा पर नाज है। इस युद्ध में वीरता और बलिदान के ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिससे देशवासियों को अपनी सशस्त्र सेनाओं पर गर्व करने और उनके द्वारा दर्शाए गए अदम्य साहस का अनुकरण करने की प्रेरणा देते रहेंगे।

अटल सरकार पर उठे सवाल

पड़ोसी होने के बावजूद पाकिस्तान से भारत के रिश्तों में हमेशा खटास ही रही। इस तनाव को कम करने के लिए कारगिल की जंग से ठीक पहले एक महत्वपूर्ण कोशिश उस समय के तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने लाहौर यात्रा के रुप में की थी। इसी प्रयास के तहत 19 फरवरी 1999 को 'सदा-ए-सरहद' नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। इस सेवा का उद्घाटन करते हुए वह प्रथम यात्री के रूप में पाकिस्तान भी गए, ताकि भारत पाक के संबंध सुधर सके। अफसोस उनकी यह पहल बेकार रही, क्योंकि बाजपेयी जी के लाहौर यात्रा से लौटने के कुछ दिनों बाद ही पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाक सेना ने कारगिल क्षेत्र में हमला कर दिया। हालांकि अटल सरकार ने पाक को उसकी इस हरकत के लिए करारा जवाब दिया। इसी के साथ पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एक बार फिर शून्य हो गए। कारगिल के बाद अटल जी को सवालों के कटघरे में खड़ा होना पड़ा, लोगों ने कहा कि उनको पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करना चाहिए था। उन्होंने ऐसे दुश्मन पर विश्वास किया, जो हमेशा से भारत की पीठ पर पीछे छुरा घोंपता आया है। लोगों ने यहां तक कहा कि इससे अधिक शत्रुता की भावना क्या हो सकती है कि एक ओर पाकिस्तान शांति के प्रयासों के लिए रचे ढोंग में लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर रहा था, तो दूसरी ओर वह कश्मीर को हथियाने की योजना बना रहा था।

करगिल युद्ध के 10 महत्वपूर्ण बिंदु

1. करगिल युुद्ध दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में लड़ी गई जंग में शामिल है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक कार्रवाई के दौरान भारतीय सेना के 527 जवान शहीद हुए, जबकि 1363 जवान जख्मी हुए। ऑपरेशन विजय का जिम्मा परोक्ष और अपरोक्ष रूप से करीब दो लाख सैनिकों को सौंपा गया था। मुख्य युद्ध क्षेत्र करगिल-द्रास सेक्टर में करीब 30 हजार सैनिक मौजूद थे।

2. भारतीय सेना की कार्रवाई में मारे गए घुसपैठियों की तलाशी ली गई, तो उनके पास से पाकिस्तानी पहचान पत्र मिले थे। करगिल जंग में मारे गए ज्यादातर जवान नॉर्दर्न लाइट इंफैंट्री के थे। पहले यह एक अर्धसैनिक बल था, लेकिन 1999 की जंग के बाद इसे पाकिस्तान की नियमित रेजीमेंट में बदल दिया गया।

3. करगिल युद्ध में पाकिस्तान के 357 सैनिक मारे गए, लेकिन अपुष्ट आंकड़ों के मुताबिक भारतीय सेना की कार्रवाई में तीन हजार के आस-पास सैनिकों की जान चली गई। भारतीय सेना ने लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों और मुजाहिदीनों के रूप में पहाडयि़ों पर कब्जा जमाए आतंकियों को परास्त किया। आईएसआई के पूर्व अधिकारी शाहिद अजीज ने भी माना था कि इसमें नियमित पाकिस्तानी सैनिक शामिल थे।

4. पाकिस्तान के उर्दू डेली में छपे एक बयान में पीएम नवाज शरीफ ने इस बात को माना था कि करगिल का युद्ध पाकिस्तानी सेना के लिए एक आपदा साबित हुआ था। नवाज ने माना था कि पाकिस्तान ने इस युद्ध में 2700 से ज्यादा सैनिक खो दिए। रेड क्रास के मुताबिक युद्ध के दौरान पाकिस्तानी कब्जे वाले इलाकों में करीब 30,000 लोगों को अपने घर छोडऩे पड़े और भारतीय इलाकों में करीब 20,000 लोगों पर असर पड़ा।

5. कारगिल सेक्टर में लड़ाई शुरू होने से कुछ हफ्ते पहले जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक हेलीकॉप्टर से नियंत्रण रेखा पार की थी और भारतीय भूभाग में करीब 11 किमी अंदर एक स्थान पर रात भी बिताई थी। मुशर्रफ के साथ 80 ब्रिगेड के तत्कालीन कमांडर ब्रिगेडियर मसूद असलम भी थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक दोनों ने जिकरिया मुस्तकार नामक स्थान पर रात गुजारी थी।

6. पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था। कई लोगों का कहना है कि कारगिल की लड़ाई उम्मीद से ज्यादा खतरनाक थी। हालात को देखते हुए मुशर्रफ ने परमाणु हथियार तक का इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली थी। पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी। इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था।

7. कारगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी। जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया, तो उन्होंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था।

8. भारतीय वायुसेना ने करगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 लड़ाकू विमानों का प्रयोग किया था। मिग-27 की मदद से इस युद्ध में उन स्थानों पर बम गिराए गए, जहां पाक सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था। इसके अलावा मिग-29 करगिल में बेहद अहम साबित हुआ। इस विमान से कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलें दागी गई थीं।

9. आठ मई को कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद 11 मई से भारतीय वायुसेना की टुकड़ी ने इंडियन आर्मी की मदद करना शुरू कर दिया था। युद्ध में वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे। कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16000 से 18000 फीट ऊपर है। ऐसे में विमानों को करीब 20,000 फीट की ऊंचाई पर उडऩा पड़ता था। ऐसी ऊंचाई पर हवा का घनत्व 30 फीसदी से कम होता है। इन हालात में पायलट का दम विमान के अंदर ही घुट सकता है।

10. करगिल युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे। 300 से ज्यादा तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 गोले फायर किए थे। लड़ाई के महत्वपूर्ण 17 दिनों में रोजाना हर आर्टिलरी बैटरी से औसतन एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के

बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी ज्यादा बमबारी की थी।

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