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IAS अधिकारी की मुहिम, लद्दाख की महिलाओं को मिल रहा पश्मीने का असली दाम

15th Jan 2018
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लेह के डेप्युटी कमिश्नर रह चुके जी. प्रसन्ना रामास्वामी और उनकी पत्नी अभिलाषा बहुगुणा ‘लकसल’ नाम से एक प्रोजेक्ट चला रहे हैं, जिसके तहत लद्दाख की बेरोजगार महिला कारीगरों की मदद से बेहतरीन किस्म के वूलन उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

आईएएस जी प्रसन्ना और काम करती बुनकर लद्दाखी महिलाएं   (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)

आईएएस जी प्रसन्ना और काम करती बुनकर लद्दाखी महिलाएं   (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)


लेह में हर साल लगभग 450 क्विंटल पश्मीने का उत्पादन होता है, जिसमें से अधिकांश कश्मीर या दुनियाभर के व्यापारियों को बेच दिया जाता है। ये व्यापारी इस पश्मीने की मदद से उम्दा किस्म के शॉल वगैरह बनवाते हैं और बेहिसाब कीमतों पर बेचते हैं। 

पश्मीना, एक तरह का ऊनी (वूलन) फैब्रिक है, जो पूरी दुनिया में लोकप्रिय है। कश्मीर में यह फैब्रिक काफी लोकप्रिय है और विदेशियों को कश्मीर की वजह से ही इस उम्दा फैब्रिक के बारे में पता चला। पश्मीना शब्द पारसी के 'पश्म' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है बेहतरीन वूल फाइबर। इसे चांगथंग क्षेत्र (पूर्व-दक्षिणपूर्व लद्दाख और पश्चिमी तिब्बत) में पाई जाने वाली भेड़ों से प्राप्त किया जाता है। इस फैब्रिक से साथ लद्दाख क्षेत्र का लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है।

इस पहाड़ी क्षेत्र में चांगपास नाम का समुदाय खेती और पशु-पालन के जरिए अपनी आजीविका चलाता है। इन पशुओं में पश्मीना फाइबर देने वाली भेड़ भी शामिल रहती है। चांगथंग में जो पश्मीना तैयार किया जाता है, उसकी मोटाई 12-15 माइक्रॉन्स तक होती है और इसे बेहतरीन किस्म का पश्मीना माना जाता है।

सितंबर 2015 से सितंबर 2017 तक लेह के डेप्युटी कमिश्नर रह चुके जी. प्रसन्ना रामास्वामी और उनकी पत्नी अभिलाषा बहुगुणा ‘लकसल’ नाम से एक प्रोजेक्ट चला रहे हैं, जिसके तहत लद्दाख की बेरोजगार महिला कारीगरों की मदद से बेहतरीन किस्म के वूलन उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

अन्य स्थानीय लोग भी किसी न किसी रूप में इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। इलाके में लद्दाख की महिलाओं का को-ऑपरेटिव बनाया गया है, जिसके अंतर्गत लूम्स (करघा) स्थापित किए गए हैं, जिनके जरिए वूलन उत्पाद बेचे जा रहे हैं और इस तरह ही इन महिलाओं को अच्छा रोजगार मिल रहा है।

अपनी पत्नी अभिलाषा बहुगुणा के साथ प्रसन्ना  (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)

अपनी पत्नी अभिलाषा बहुगुणा के साथ प्रसन्ना  (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)


इस प्रोजेक्ट की रणनीति और ब्रैंड डिवेलपमेंट की देखरेख करने वाली अभिलाषा बहुगुणा ने इस मुहिम की शुरूआत का जिक्र करते हुए बताया, ''मेरे पति के दिमाग में दिसंबर 2015 में यह ख्याल आया, जब वह जिले के दौरे पर चुमुर जा रहे थे। चुमुर, चांगथंग क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। चुमुर में उन्हें स्थानीय महिलाओं द्वारा बनाए हुए मोजों की एक जोड़ी गिफ्ट में मिली। यहीं से उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि क्यों न इन महिलाओं की प्रतिभा को सही दिशा दी जाए ताकि यह उनके लिए एक स्थाई और मजबूत रोजगार का जरिया बन सके। साथ ही, इस क्षेत्र की समृद्ध कला को भी बेहतर पहचान मिल सके।''

प्रसन्ना ने इस संदर्भ में एक सामाजिक-आर्थिक आधार का जिक्र करते हुए चिंता जताई कि दस्तावेजों के मुताबिक, यह एक जाहिर समस्या है कि यहां के आस-पास के शहरों की ओर विस्थापित होने लगे हैं। प्रसन्ना ने कहा कि यह विस्थापन, दो मुख्य वजहों से चिंता का विषय है। एक तो यह कि हम एक खास जीवनशैली को खो रहे हैं। साथ ही, ये समुदाय भारत-चीन सीमा के प्रहरी भी हैं। हमारा उद्देश्य है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ये समुदाय काम की तलाश में इस जगह को छोड़कर न चले जाएं।

मीटिंग में बुनकर महिलाएं (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)

मीटिंग में बुनकर महिलाएं (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)


लेह में हर साल लगभग 450 क्विंटल पश्मीने का उत्पादन होता है, जिसमें से अधिकांश कश्मीर या दुनियाभर के व्यापारियों को बेच दिया जाता है। ये व्यापारी इस पश्मीने की मदद से उम्दा किस्म के शॉल वगैरह बनवाते हैं और बेहिसाब कीमतों पर बेचते हैं। व्यापारी तो बड़े मुनाफे भुना लेते हैं, लेकिन पश्मीने का उत्पादन करने वाले समुदाय इस दौड़ में पिछड़ जाते हैं। प्रोजेक्ट लकसल और लद्दाख में स्थापित लूम्स (करघे), स्थानीय स्तर पर अपनी तरह का पहला प्रयास हैं, जिसके अंतर्गत पश्मीने से तैयार होने वाले चीजों का उत्पादन और बिक्री भी स्थानीय स्तर पर ही हो रही है।

लद्दाख में लूम्स की शुरूआत से पहले प्रोजेक्ट लकसल को अमल में लाने के लिए प्रसन्ना ने डॉ. टुंडुप नामग्याल को मुख्य अधिकारी के रूप में नियुक्त किया था। नामग्याल ने बताया, '' हर साल एक भेड़ से लगभग 250 ग्राम तक कच्चा माल मिलता है। वहीं दूसरी ओर, इन भेड़ों का पालन करने वाले बंजारों की सालाना आय लगभग न के बराबर होती है। जबकि 75-100 ग्राम कच्चे माल की मदद से बनी शॉल का बाजार मूल्य 15 हजार रुपए से भी अधिक होता है। हमारी कोशिश है कि इस कच्चे माल से होने वाला उत्पादन लद्दाख के स्थानीय लोग ही करें और उससे पर्याप्त मुनाफा कमा सकें। इस साल (2017) स्थानीय महिलाओं ने लगभग 8 क्विंटल कच्चे माल से बेहतरीन उत्पाद तैयार किए। अगले साल तक इस आंकड़े को 20 क्विंटल तक पहुंचाना है।''

पश्मीने के कच्चे माल से अतिरिक्त फाइबर जैसी अशुद्धियों को दूर करने की लागत 7600 रुपए/किलो (2016 में) तक थी। 2017 में यह लागत घटकर 7000 रुपए/किलो तक हो गई। अंतराष्ट्रीय बाजार में, पश्मीने की कीमत मंगोलिया, चीन और लद्दाख में होने वाले उत्पादन और वैश्विक स्तर पर इसकी मांग के अनुसार निर्धारित होती है।

पश्मीना तैयार करती महिलाएं  (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)

पश्मीना तैयार करती महिलाएं  (फोटो साभार- लूम्स ऑफ लद्दाख)


इस प्रोजेक्ट की प्लानिंग जुलाई 2016 से शुरू हो गई थी और आने वाले कुछ महीनों में लेह के नजदीक स्थित स्तोक और खरनाकलिंग गांवों में इसका पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू हो गया। 2016-17 की सर्दियों तक प्रोजेक्ट का दूसरा चरण शुरू हो गया था। धीरे-धीरे क्षेत्र के अधिक से अधिक गांवों में प्रशिक्षण के काम को गति दी गई। इस काम में स्थानीय लोग, सरकारी अधिकारी और डिजाइन मेंटर्स (सोनल छनाना और स्टैनजिन पाल्मो) सभी शामिल रहे। चुशूल, मेराक, पारमा, साटो, चुचोट, फायंग, स्तोक और खरनाकलिंग को मिलाकर कुछ 8 गांवों की 150 महिलाओं की मदद से लद्दाख में उत्पादन के लिए लूम्स की शुरूआत हुई। 12 मई, 2017 को लेह के मुख्य बाजार में पहला स्टोर खोला गया। हाल ही में एनआईएफटी (दिल्ली) से ग्रैजुएशन पूरा करने वाली स्टैनजिन पाल्मो ने स्थानीय महिलाओं को ब्रैंडिंग सिखाई और उनके ब्रैंड के लिए लोगो भी तैयार किया।

देशभर में होने वाली प्रदर्शनियों तक इन उत्पादों की पहुंच होने लगी है। जून 2017 में गुजरात के गांधीनगर में हुए थीम इंडिया पवेलियन में लद्दाख के इन लूम्स की प्रदर्शनी लगी और उत्पादों की बिक्री भी हुई। को-ऑपरेटिव की महिलाओं ने 2016-17 की सर्दियों में दिल्ली में दश्तकार डिजाइन मेले में भी अपने उत्पाद बेचे। अब ये महिलाएं मुबंई में होने वाले महालक्ष्मी सरस मेले में भी जाना चाहती हैं।

को-ऑपरेटिव सोसायटी चाहती है कि इस बिजनस को ई-कॉमर्स पर भी उतारा जाए, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र से उत्पादों की शिपिंग बहुत बड़ी चुनौती है। मई 2017 में पहला स्टोर खुलने के बाद से अक्टूबर 2017 तक लद्दाख के लूम्स 23 लाख रुपए की बिक्री कर चुके हैं, लेकिन यह आंकड़ा अभी भी पूरी मांग को देखते हुए कम है, क्योंकि उत्पादन की प्रक्रिया पूरी तरह से योजनाबद्ध नहीं थी।

प्रोजेक्ट के तहत दिया गया प्रशिक्षण नए प्रयोग और कौशल विकास पर आधारित था। लूम्स खुलने के बाद से काम करने वाली महिलाओं को हर उत्पाद की बिक्री पर 37.5% हिस्सा दिया जाता है। 41% हिस्सा को-ऑपरेटिव के पास सुरक्षित रहता है, जिसकी मदद से अगले सीजन में कच्चे माल की खरीद हो सके। बाकी हिस्सा संगठन को चलाने आदि में खर्च किया जाता है। इतना ही नहीं, कुछ हिस्सा वेलफेयर फंड के नाम पर भी सुरक्षित रखा जाता है। इस फंड को सदस्य कारीगर स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों या फिर बच्चों की शिक्षा के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

लेह में स्थित लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद ने मई 2017 में पहले स्टोर के लॉन्च के दौरान को-ऑपरेटिव के लिए 15 लाख रुपए का फंड दिया था। राष्ट्रीय जलविद्युत ऊर्जा निगम की ओर से 3 लाख रुपए की फंडिंग हुई थी। साथ ही, निगम के कर्मचारियों ने अपने वेतन का हिस्सा अनुदान के रूप में दिया था, जो लगभग 1.5 लाख रुपए था।

इस मुहिम में शामिल महिलाओं के बीच चुनाव के माध्यम से कुछ महिलाओं को ऑफिस की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन महिलाओं को ड्राइविंग भी सिखाई गई है, ताकि जरूरी कामों के लिए ये महिलाएं दूर-दराज के इलाकों तक जाने के लिए किसी पर निर्भर न रहें।

आमतौर पर देखा जाता है कि अधिकारियों के बदलने से इस तरह के कामों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन इस मुहिम के साथ ऐसा नहीं है। प्रसन्ना के बाद उनकी जगह पर आईं नई डेप्युटी कमिश्नर अवनी लवासा ने पूरी जिम्मेदारी के साथ सुनिश्चित किया है कि इन लूम्स के काम को पूरा बढ़ावा मिले।

यह भी पढ़ें: 80 हज़ार बेसहारा बच्चों की जिंदगी बदलने वाली लेडी डॉक्टर

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