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"जब बिटिया काफी छोटी थी तो रात की गश्त में उसे गाड़ी में साथ लेकर ड्यूटी करनी पड़ती थी", एक महिला पुलिस ऑफिसर की कहानी

Ravi Verma
6th Mar 2016
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पुलिस सेवा महिलाओं के लिए थोड़ी मुश्किल मानी जाती है. उस पर क्राइम ब्रांच पर तो पुरुषों का ही वर्चस्व रहता आया है. किसी प्रदेश की राजधानी की क्राइम ब्रांच का मुखिया होना और चुनौती भरा काम है. ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की क्राइम ब्रांच संभाल रही हैं जांबाज़ महिला ऑफिसर अर्चना झा. अध्यापक पिता और चार भाई बहिनों में सबसे छोटी अर्चना पुलिस की पृष्ठभूमि वाले परिवार से नहीं आतीं. न अर्चना ने कभी सोचा था कि पुलिस में जाएँगी. बस इतनी इच्छा थी कि जीवन में आगे बढना है और कुछ करके दिखाना है. इसी अदम्य इच्छा के चलते वे छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हुईं और चयन के पश्चात उन्हें पुलिस सेवा आवंटित हुई. अर्चना ने 2007 में पुलिस सेवा ज्वाइन कर इस चुनौती को स्वीकार किया. शायद यह शक्ति नारी में ही होती है कि वह कड़ी से कड़ी चुनौती सहजता से स्वीकार कर लेती है.


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2007 में अर्चना के जीवन में दो बड़े बदलाव आए. पहला कि उनका चयन राज्य पुलिस सेवा के लिए हो गया और दूसरा कि उनका विवाह हो गया.पुलिस की कड़ी ट्रेनिंग और वैवाहिक जीवन के बीच तालमेल की बड़ी चुनौती को अर्चना ने बखूबी निभाया. अर्चना के ससुर भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, उन्होंने और उनकी सास ने इसमें उनका साथ दिया. अर्चना के पति निमेष छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में अधिवक्ता है.

अर्चना बताती हैं –

"विवाह के बाद जब बेटी अन्विता मून इनके जीवन में आई तो पुलिस की दिन रात की ड्यूटी, बच्ची की देखभाल और ससुराल वालों की उम्मीदों पर खरा उतरने की तिहरी ज़िम्मेदारी आई. सास ससुर और पति के भरपूर सहयोग के कारण ही वे ये सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही हैं. लेकिन जब बिटिया काफी छोटी थी तो रात की गश्त में बेटी को गाड़ी में साथ लेकर ड्यूटी करनी पड़ती थी"


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चुनाव के दौरान कड़ी ड्यूटी,आई.पी.एल.मैच के दौरान सुरक्षा की ज़िम्मेदारी और अब क्राइम ब्रांच जैसे अपराधों की विवेचना से जुड़ी शाखा का बेहद मुश्किल और पुरुषों के एकाधिकार वाला दायित्व अर्चना झा बखूबी निभा रही हैं. उनके पुरुष साथी भी उनकी लगन, मेहनत और व्यवहार के कायल हैं.

अर्चना का मानना है कि महिलाओं को ईश्वर ने इतनी शक्ति दी है कि वह किसी भी समस्या के आने पर घबराती नहीं. धैर्य के साथ कठिनाइयों का सामना करना ही नारी की विशेषता होती है. अर्चना कहती हैं,

"किसी भी लडकी को घर और बाहर की जिम्मेदारी निभाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसका नारीत्व खो न जाए. करियर के चक्कर में परिवार और मां बनने की अपनी विशेष नेमत को कभी भूलना नहीं चाहिए"


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अब बेटी बड़ी हो रही है तो काफ़ी समय दादा दादी के साथ गुज़ारने लगी है लेकिन हाईकोर्ट बिलासपुर में होने के कारण उनके पति सिर्फ़ सप्ताहांत में ही रायपुर आ पाते हैं और पुलिस की नौकरी में ऐसा ज़रूरी नहीं होता कि सप्ताहांत में आप खाली रहें. लेकिन अर्चना इसमें भी सूझबूझ से सामंजस्य बिठा लेती हैं.


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अभी कुछ महीने पहले ही दुर्ग ज़िले में हुए एक अपहरण कांड को अर्चना झा की क्राइम ब्रांच टीम ने 24 घंटे में सुलझा लिया था, जिसके लिए छतीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने उन्हें सम्मानित किया है.

अर्चना का कहना है कि वे अपनी बेटी को अपना करियर चुनने की आज़ादी देंगीं, अगर वह पुलिस में जाना चाहे तो रोकेंगी नहीं.

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