संस्करणों
विविध

कला के लिए जुनून ऐसा कि संग्रहालय बनाकर दम लिया

देश की कलाकृतियों को संग्रहित करने का अनोखा जुनूनकिरण नाडार ने संग्रहकर्ता के रूप में काम शुुरू कियाकला प्रेमियों के लिए वरदान साबित हो सकता है किरण नाडार म्यूजियम आॅफ आर्टहाशिए पर रह गए कलाकारों को तरजीह देने की कोशिश

1st May 2015
Add to
Shares
3
Comments
Share This
Add to
Shares
3
Comments
Share

किरण नाडार ने अपना काम शौकिया कला संग्रहकर्ता के रूप में शुरू किया था। महज कलात्मक वस्तुओं के संग्रह से शुरू करके उन्होंने खुद को भारत के कलात्मक इतिहास और समकालीन कलाकारों के बारे में शिक्षित करना जारी रखा। अपने घर को अधिक ‘‘स्नेहपूर्ण और जीवंत’’ बनाने की आदत से शुरू हुई चीज कला के प्रति सम्मोहन में बन गई और उसने नाडार को एक शौकिया कला पारखी में बदल दिया।

image


जिन कलाकृतियों ने उन्हें प्रभावित किया, उनको पाने और संग्रहित की कोशिश के दो दशकों के बाद नाडार के पास जगह की कमी पड़ गई। लेकिन इससे उनका उत्साह भंग नहीं हुआ और वह अपने संग्रह को लोगों के साथ शेयर करने के लिए प्रेरित हुईं।

‘‘मैं इस विचार से अभिभूत थी कि कला देखने की चीज है, महज संग्रह करने की नहीं’’, किरण जी कहती हैं। इसीलिए उनका अगला बड़ा विचार था ‘‘एक संग्रहालय की स्थापना जो संगम बन सके, जहां कलात्मक वस्तुएं महज सहेजी और प्रदर्शित नहीं की जाएं; उन पर विचार-विमर्श किया जाय, बातचीत की जाए और उनकी सराहना की जाए। मैं कला जगत के साथ जुड़ी रहने के और भी रास्ते तलाशना चाहती थी।’’

image


किरण जी व्यावसायिक कला संग्रहालय भी शुरू कर सकती थीं लेकिन उन्होंने किरण नाडार कला संग्रहालय (किरण नाडार म्यूजियम आॅफ आर्ट) शुरू किया। उनकी दीर्घा में कलात्मक वस्तुएं बिक्री के लिए प्रदर्शित नहीं की जाती हैं। उनकी दीर्घा शिव नाडार फाउंडेशन की लोकोपकारी पहल का एक अंग है।

किरण जी कहती हैं, ‘‘संग्रहालय की कल्पना व्यापक जनसमुदाय के लिए स्थायी संग्रह उपलब्ध कराने तथा कला और संस्कृति, खास कर आधुनिक और समकालीन कला के बारे में जागरूकता फैलाने के मकसद से की गई थी। हमलोगों की दिलचस्पी संग्रहालय तक लोगों के पहुंचने में और संग्रहालय पहुंचने वाले दर्शकों का समूह तैयार करने में है। हमलोग न तो नीलामी घर हैं और न ही व्यावसायिक दीर्घा जहां कलाकृतियां अस्थायी रूप से आती हैं और बिक जाती हैं।’’

image


मुख्यतः समकालीन और संभ्रांत नगरवासी कलाकारों को फोकस करने वाली व्यावसायिक कला दीर्घाओं के चलते ग्रामीण और लोग कलाओं की जारी उपेक्षा पर वह कहती हैं,

‘‘मैं सहमत हूं कि यह देश प्रतिभा और सृजनात्मकता से परिपूर्ण है जो शहरों तक ही सीमित नहीं है। कला रूप अनेक ग्रामीण क्षेत्रों और अंचलों में भी पाए जा सकते हैं। जो चीजें हमारी आंखों के सामने आती हैं, वे तो अस्तित्वमान चीजों के रंच मात्र हैं। सांस्कृतिक अध्ययन, प्रबंधन और अधिसंरचना निर्माण में लगे लोगों को अधिक जवाबदेही लेने की जरूरत है। जरूरी है कि विभिन्न प्रकार के कलारूपों का सह-अस्तित्व हो, खास कर विविधतापूर्ण और समृद्ध संस्कृति वाले हमारे देश में कोई भी चीज दूसरी चीज की जगह नहीं ले सकती है।’’

image


नाडार के संग्रह में उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक से लेकर आधुनिक और समकालीन भारतीय कला के सभी महत्वपूर्ण चरणों की कलाकृतियां मौजूद हैं। इनमें फोकस उन कलाकारों पर है जिन्होंने अपनी कूचियों के सहारे भारतीय आधुनिकता को आकार दिया है।

किरण जी बताती हैं ‘‘संग्रह में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण अनेक कृतियां हैं जिन्हें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया गया है। हमलोग औसतन दस कृतियां राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्य संस्थानों को उधार देते हैं। कहा जाय तो संग्रह की कृत्रियों की विश्व स्तर पर पहचान है और सराहना होती है। वर्तमान प्रदर्शनी संग्रहालय के पांच वर्षों के जीवनकाल का तीसरा सिंहावलोकन है। वरिष्ठ कलाकार रामेश्वर ब्रूटा की अस्सी या उससे भी अधिक कृतियां, संस्थान और निजी संग्रहकर्ता पहली बार व्यापक प्रदर्शन के लिए हमें उधार देने के लिए निश्चित तौर पर आगे आए हैं। मेरी एक प्रिय कृति एस.एच. रजा का सौराष्ट्र है। यह रजा के संकलन की ही महत्वपूर्ण कृति नहीं है, जिस तरह से यह भारतीय संदर्भ में आधुनिकतावाद के विविध पाठों को समृद्ध करती है, उस लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण है। साथ ही, मेरी नजर में संग्रह की कृतियां परस्पर संवाद करने वाली होनी चाहिए।’’

नाडार इस बात जोर देती हैं कि कला संस्थान नए विचारों और कलाकारों के प्रति अधिक ग्रहणशील हों और कलाप्रेमियों के संभ्रांत समाज के अंदर मौजूद कृतियों तक सीमित न रहकर खुद को जनसाधारण के लिए सचमुच खोल दें।

इस मामले में संग्रहालय एक निजी संग्रहालय से बढ़कर कुछ और बनने के लिए इच्छुक है।

‘‘पांच वर्षों की छोटी अवधि में और एक विकसित होते संग्रहालय के बतौर संग्रहालय ने आउटरीच, आर्ट एडुकेशन, कार्यशालाएं, विचारगोष्ठियां आदि अनेक चीजों में निरंतरता लाने की उपलब्धि हासिल की है। संग्रहालय अपनी ओर विद्यार्थियों और कलाकारों को ही नहीं खींच रहा है, यह सभी तरह के कार्यों में लगे लोगों को कलाओं से परिचित करा रहा है। हमलोग जो हैं और जिस समुदाय की सेवा में हैं, उसके संदर्भ में हम खुद को जैसे अभिव्यक्त करते है, ये कार्यक्रम उनके सबसे महत्वपूर्ण भाग बन जाते हैं। हमलोग भारतीय कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर ले जाने का एक माध्यम प्रदान कर रहे हैं। और संग्रहालय की यात्रा संतुष्टिदायक और चुनौतीपूर्ण, दोनो रही है।’’

उनका कहना है कि ‘‘साथ ही, संग्रहालय में हमलोग नवजात भारतीय कलाजगत के अंदर और अपेक्षाकृत व्यापक जन समुदाय के बीच स्थापित करने के लिए अंदर-बाहर देखने की प्रक्रिया में लगातार लगे रहे हैं। मैं चाहती हूं कि संग्रहालय व्यापक चिंतन-मनन, ज्ञान के विकास और आदान-प्रदान का स्थान बने।’’

कला की पहुंच पर किरण जी कहती हैं, ‘‘जिस समय हमारे पास ऐसी सक्रिय संस्थाएं होंगी जो शोधकर्ताओं और आम लोगों के लिए खुली हों, वे संवाद को संभव बनाएंगी और कला को बतौर रोज़मर्रा के जीवन का अंग देखने का मार्ग प्रशस्त करेंगी। कला के निर्माण और विकास के लिए एक किस्म का संरक्षण हमेशा से बहुत जरूरी रहा है। जहां कला की किफायतशारी उसे आभिजात्य के साथ जोड़ती है, वहीं उसकी अभिगम्यता उसे लोगों के करीब लाती है और उसे उनके जीवन का अंग बनाती है।अपने शैक्षिक घटक के अलावा, सृजनात्मकता और सौंदर्यानुभूति को मानव अस्तित्व के केंद्र में होना चाहिए क्योंकि समकालीन जीवन अधिक जल्दबाज और तनावपूर्ण प्रकृति का होता जा रहा है।’’

नाडार यह भी कहती हैं कि मैं ‘‘संग्रहकर्ता और कलामर्मज्ञ इब्राहिम अलकाजी से बहुत प्रेरित रही हूं और किसी दिन मैं उनके उत्कृष्ट संकलन को अपने संग्रहालय में निश्चित रूप से प्रदर्शित करना पसंद करूंगी’’।

‘‘किरण नाडार कला संग्रहालय उन कलाकारों की कृतियों को भी नजर में लाना चाहेगा जिन्होंने विगत सदी में भारतीय कला की चर्चा में योगदान दिया है लेकिन ज्यादातर हाशिए पर रहे हैं और कुछ की तो अभी तलाश ही शेष है।’’

Add to
Shares
3
Comments
Share This
Add to
Shares
3
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags