संस्करणों
प्रेरणा

एक अर्थशास्त्री, जिन्होंने बच्चों को साक्षर और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छोड़ दी आराम की ज़िंदगी

Harish Bisht
26th Feb 2016
Add to
Shares
2
Comments
Share This
Add to
Shares
2
Comments
Share

अकसर कहा जाता है कि जिन माहौल में आप रहते हैं उसके आदि हो जाते हैं, उसकी आदत आपकी दिनचर्या में रच-बस जाती है। यही वजह है कि आमतौर पर लोग अपनी आदतों के मोहपाश में इतना बंध जाते हैं कि उसको छोड़ना मुश्किल हो जाता है। लेकिन कई बार कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन आदतों को त्याग देते हैं, ऐशो-आराम की ज़िंदगी को छोड़ देते हैं और पहुंच जाते हैं बिलकुल विपरीत स्थितियों में। वो इंसान, जिसने अपनी ज़िंदगी का ज्यादातर वक्त मुंबई जैसे महानगर में गुजारा, वो आज एक छोटे से गांव में रह रहा है। वो शख्स जो करीब 40 सालों तक बड़े अर्थशास्त्री की भूमिका में था, वो आज गरीब और निरक्षर बच्चों को ना सिर्फ शिक्षित कर रहा है बल्कि महिलाएं आर्थिक रूप से कैसे अपने पैरों पर खड़ी हों, ये बात उनको सीखा रहा है। गोपाल कृष्ण स्वामी, ये नाम है उस इंसान का, जो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून और मसूरी के बीच एक गांव पुरकुल में रहकर अपनी संस्था ‘पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी’ और ‘पुरकल स्त्री शक्ति’ के जरिये समाज को अपनी ओर से कुछ देने की कोशिश कर रहा है।


image


गोपाल कृष्ण स्वामी पेशे से अर्थशास्त्री हैं और करीब 40 साल मुंबई में रहकर विदेशी मुद्रा विनियम में, आयातकों और निर्यातकों के साथ सलाहकार के तौर पर काम किया। जब उन्होंने अपने इस काम से रिटायरमेंट के बारे में सोचा तो उन्होंने फैसला लिया वो अपने नवी मुंबई के अपने घर को बेच कर हिमालय क्षेत्र में रहेंगे और समाज के लिए कुछ काम करेंगे। बस उनकी यही सोच उनको अपने परिवार के साथ देहरादून खींच लाई और आज पिछले 20 सालों से वो यहां रहकर निरक्षर बच्चों को ना सिर्फ साक्षर बनाने का काम कर रहे हैं, बल्कि यहां की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी जुटे हैं।


image


स्वामी का कहना है कि उन्होंने 20 सालों से उत्तराखंड के देहरादून में रहकर समाज के लिये कुछ करने की कोशिश है। यहां पर स्वामी ‘पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी’ के लिये काम कर रहे हैं। पुरकल यूथ डेवलपमेंट सोसायटी शिक्षा से जुड़ा काम करती है। जहां पर चार सौ से ज्यादा बच्चे मुफ्त में पढ़ाई कर रहे हैं और इस साल अप्रैल के बाद ये संख्या 5सौ को पार करने की उम्मीद है। ये प्री क्लास से लेकर 12 तक है दो सीबीएससी से मान्यता प्राप्त है। खास बात ये है कि उनकी संस्था भले ही स्कूल के तौर पर काम करती हो लेकिन यहां पर बच्चों को पढ़ाई के साथ नैतिक शिक्षा और दूसरी तरह की विधाओं में पारंगत किया जाता है। स्कूल में पढ़ाई के अलावा कई तरह की एक्टिविटीज करवाई जाती हैं। जिसमें डांस, योग, खेल और बेकिंग सिखाई जाती है। पिछले 16 सालों से स्वामी और उनकी पत्नी इन बच्चों के लिए विकास के लिए पूरी तरह समर्थित है।


image


गोपाल कृष्ण स्वामी ने जब इस स्कूल की शुरूआत की थी तब यहां पर दूर दूर तक कोई स्कूल नहीं था और गांव वालों की हालत काफी बदतर थी, लेकिन आज इस स्कूल के खुलने से आसपास के बच्चों को ना सिर्फ मुफ्त शिक्षा दी जाती है बल्कि, कपड़े, खाना और बस की सुविधा भी दी जाती है। स्वामी ने योरस्टोरी को बताया, 

“बच्चे हफ्ते में 6 दिन और दिन के 10 घंटे हमारे साथ रहते हैं। इसलिए हम कोशिश करते हैं कि बच्चों को शिक्षा के साथ उनके स्वास्थ्य, न्यूट्रिशन और प्रोटीन पर ध्यान दें। इसके पीछे आइडिया ये है कि बच्चों का विकास सही तरीके से हो।” 

यही वजह है कि आज करीब 15-16 सालों से बच्चे इनके साथ रह रहे हैं। स्वामी का कहना है कि जब उन्होंने स्कूल की शुरूआत की थी तब वो सिर्फ 10 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को अपने यहां रखते थे लेकिन अब 3 से 4 साल के बच्चे भी उनके यहां पढ़ने के लिए आ रहे हैं। इनमें से कई बच्चे काफी अच्छा काम कर रहे हैं। स्वामी की कोशिश है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों को हॉस्टल की सुविधा भी दें ताकि बच्चों का विकास बेहतर तरीके से हो। 


image


‘पुरकल स्त्री शक्ति’ के जरिये महिलाओं में कौशल को निखारने का काम किया जाता है। यहां पर महिलाएं पेचवर्क से जुड़ा काम करती हैं और 45 से ज्यादा उत्पाद तैयार करती हैं। महिलाओं के बनाये इन उत्पाद को ऑर्डर दिलाने में ये उनकी मदद करते हैं साथ ही महिलाओं के बनाये उत्पादों के लिये नया बाजार तैयार करते हैं। आज करीब 180 महिलाएं इनके साथ जुड़ी हैं। जिनको ये ना सिर्फ काम करने की जगह मुफ्त में देते हैं बल्कि दूसरी कई तरह की सुविधाएं भी मुहैया कराते हैं ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसके अलावा महिलाओं ने इनकी मदद से सेल्फ हेल्प ग्रुप भी तैयार किये हैं जहां मिलकर ये कई तरह के उत्पाद बनाती हैं।


image


इसके अलावा पुरकल से करीब 10 किलोमीटर दूर दो दूसरे सेंटर भी हैं जहां पर 90 महिलाएं काम करती हैं। यहां आने जाने के लिए महिलाओं को मुफ्त में बस की सुविधा मिली है। साथ ही यहां आने वाली नई महिलाओं को मुफ्त में काम सीखाया जाता है। महिलाओं को रियायत दर पर खाना मिलता है और मेडिकल सुविधाएं भी मुहैया कराती है। यहां आने वाली महिलाओं के बच्चों को स्कूल में मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की गई है।


image


स्वामी ना सिर्फ शिक्षा और महिलाओं के क्षेत्र में काम कर रहे हैं बल्कि जिन गांव में टॉयलेट की सुविधा नहीं है वहां पर उसे बनवाने का काम कर रहे हैं। ये अब तक उत्तराखंड में 50 से ज्यादा घरों में टॉयलेट की सुविधा दे चुके हैं। इस साल इनका लक्ष्य पास के शिवली गांव में 20 से ज्यादा टॉयलेट बनाने की है। 

वेबसाइट : www.purkal.org


ऐसी ही और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे Facebook पेज को लाइक करें

अब पढ़िए ये संबंधित कहानियाँ:

देश का भविष्य संवारने में जुटे हैं 66 साल के श्याम बिहारी प्रसाद, सातों दिन पढ़ाते हैं गरीब बच्चे को फुटपाथ पर

12वीं में पहली बार फेल होने के बाद भी मोहसिन खान ने कायम रखा समाज की तासीर और तस्वीर बदलने का जुनून

जज़्बा और जुनून का दूसरा नाम 'गोदावरी सिंह', 35 साल से जुटे हैं काशी की अनोखी कला को बचाने में

Add to
Shares
2
Comments
Share This
Add to
Shares
2
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags