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कैसे आत्मनिर्भर बनीं वो महिलाएं जो कभी तरसती थीं 5-5 रुपये के लिए...

18th Dec 2015
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वाराणसी के पास प्रहलादपुर गांव में भूमिहीन महिलाओं का ग्रुप...

बुरे वक्त में एक दूसरे की मदद के लिए बनाया ग्रुप...

पहले पांच रुपए के लिए दर-दर भटकने वाली महिलाएं अब हैं आत्मनिर्भर...

प्रहलादपुर का असर आस पास के 22 गांवों में...


कहते हैं ज़िंदगी अपना रास्ता ढूंढती है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि उम्मीदों पर दुनिया कायम है। एक टूटती है तो दूसरी राह दिखने लगती है। बात जीने मरने की हो तो उसकी अहमियत और बढ़ जाती है। वाराणसी के प्रहलादपुर गांव में महिलाओं ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। इन महिलाओं ने वो कर दिखाया है जिससे एवज में कहना ज़रूरी है कि ज़िंदगी चलने का नाम है, रास्ते खुद बनाने होंगे और उसपर चलकर मिसाल कायम करना होगा। 

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वाराणसी के प्रहलादपुर गांव में महिलायें खेती करके न सिर्फ अपना घर चलाती हैं बल्कि महिला सशक्तिकरण का उदाहरण भी पेश कर रही हैं। इन महिलाओं ने खेती करने के साथ ही अपने बुरे वक्त में मदद के लिये ग्रुप भी बना रखा है। इस ग्रुप की मदद से ये बुरे वक्त में खुद के जमा पैसों से ऋण लेती हैं और बाद में ऋण जमा कर इस ग्रुप के अन्य लोगों की मदद में योगदान करती हैं। 10 महिलाओं से शुरू हुआ ये ग्रुप आज 2250 महिलाओं तक पहुँच चुका है और मात्र 200 रुपये से शुरू हुई बचत आज साढ़े तीन करोड़ के रोटेशन तक पहुँच गयी है।

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रोज़ाना ये महिलायें काँधे पर फावड़ा लेकर खेतों की तरफ जाती और फूल की खेती करती हैं और उन फूलों की माला बनाकर बाजार में बेचती हैं, जिससे न सिर्फ इनका घर चलता है बल्कि इनके बच्चों की पढाई और परवरिश में भी मदद मिलती है। इतना ही नहीं इस गांव की महिलाओं द्वारा खुद के बनाये गये ग्रुप का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे महिलाएं किसी महाजन के कर्ज से दूर तो रहती ही हैं ये आपसी सद्भाव के माध्यम से एक दूसरे की मदद भी करती हैं।

प्रहलादपुर गांव की महिलाओं की इस सफलता को देखकर पड़ोसी गांव की महिलाएं भी इनका अनुसरण करने लगी हैं और आज ये अभियान 22 गांवों में फैल गया है। प्रहलादपुर गांव की महिला मीरा का कहना है

“पहले हमारे पति बिनाई करते थे। बिनाई बंद हो गयी। पर ग्रुप बनने के बाद से हमलोगों की स्थिति पहले से बेहतर है। इसके तहत बचत भी होने लगी और खेत में काम भी बढ़ा। पुराना सारा कर्जा खत्म हो गया। अब महाजन घर नहीं आते। इससे बड़ा सुकून क्यो हो सकता है।”
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ग्रुप संचालिका माधुरी का कहना है

“बीस रुपया महीना तैयार किया दस लोगों का समूह बनाया। इस गांव के अलावा लगभग दो दर्जन गांव में चलता है। समूह में बचत के बाद ये पट्टे पर खेत लेती हैं और एक साल के लिये खेती करती हैं और जो बचता है उससे और सारा काम करती हैं। एक वक्त था कि ये महिलायें पांच रूपये के लिये तरसती थी आज दूसरे की मदद करती हैं।”
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वाराणसी के प्रहलादपुर गांव की इन महिलाओं ने वो कर दिखाया जिसके लिए सरकारें तमाम योजनाएं बनाती हैं। उन योजनाओं को बनाने में कई साल गुजर जाते हैं। इससे साबित होता है कि अगर हम आपस में मिलकर कुछ करने की ठान लें तो उसका परिणाम अच्छा ही निकलता है। इन महिलाओं ने एक मिसाल पेश किया है जिसका असर लगातार दूसरी जगहों पर भी दिख रहा है। बड़ी बात ये भी है कि इन महिलाओं ने अनजाने में अर्थशास्त्र के बड़े पंडितों को एक डिजाइन दिया है जिसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है और गरीबी को दूर करने के लिए लागू किया जा सकता है।


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