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सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने लाखों की नौकरी छोड़ गांव में शुरू किया डेयरी उद्योग

बैंगलोर की एक बड़ी आईटी कंपनी में कार्यरत जावा डेवलपर (सॉफ्टवेयर इंजीनियर) ने लाखों की नौकरी छोड़ गांव में शुरु किया डेयरी और फार्मिंग उद्योग। आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं को बना रहे हैं आत्मनिर्भर।

15th Jun 2017
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उत्तराखंड के हरिओम नौटियाल बैंगलोर की मोटी सैलरी वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़ खुद के फार्म हाउस से उत्पादित दूध, अंडे और चिकन की दूर-दूर तक सप्लाई कर हर महीने में 4 से 5 लाख रुपये के आसपास प्रॉफिट कमा रहे हैं। 'धन्‍यधेनु' नाम से उनका बिज़नेस मॉडल जरा हटकर है। हरिओम डेयरी, बकरी पालन और कुक्कुटशाला के साथ मशरूम की खेती भी कर रहे हैं। सबसे अच्छी बात है, कि अपने उद्योग के माध्यम से हरिओम उन महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं, जो घरों में रह कर सिर्फ घर परिवार संभालने का काम करती थीं और एक-एक रुपये के लिए किसी और पर निर्भर रहती थीं...

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हरिओम नौटियाल अपनी गौशाला में बछड़ों के साथ बतियाते हुएa12bc34de56fgmedium"/>

हरिओम ने 'धन्यधेनु' की शुरुआत 25 लाख की लागत से की थी, जिसके लिए उन्होंने परिवार की मदद और खुद की जमा पूंजी का इस्तेमाल किया। इस काम को शुरू करने के पीछे हरिओम का मुख्य उद्देश्य था अपने आसपास की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी मुद्रा के पीछे न भाग कर अपने देश में युवाओं को रोज़गार के बेहतर अवसर प्रदान करना।

बेटा हमारा ऐसा काम करेगा! और बेटे का नाम है हरिओम नौटियाल। हरिओम रानीपोखरी, देहरादून (उत्तराखंड) के ग्राम बड़कोट के रहने वाले हैं। माता-पिता की जैसी चाह थी, हरिओम ने वही राह पकड़ी और हुनर से ऐसा कुछ कर दिखाया है, कि आज हर महीने लाखों रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। खुद का डिजायन इनका बिज़नेस मॉडल भी अनोखा है। खूब कमाई हो रही है।

हरिओम आज से कुछ साल पहले बंगलुरु में अच्छी-खासी सैलरी वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। उस नौकरी से एक झटके में नाता तोड़कर अपनी माटी-मशक्कत के हो गए। अपने घर पर ही दो मंजिला फार्म स्थापित कर पिछले चार साल से 'धन्‍यधेनु' नाम से एक दर्जन से अधिक सायवाल, हरियाणवी, जर्सी, रेड सिंधी नस्लों की गाय-भैंसें तो पाल ही रहे हैं, देसी मुर्गी पालन और मशरूम का भी उत्पादन कर रहे हैं। उनके यहां से एक साथ उत्पादित दूध, अंडे और चिकन की दूर-दूर तक सप्लाई हो रही है।

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शहरी जीवन से हरिओम का मन तभी से उचट गया था, जब वो बंगलुरु की चकाचौंध में पहुंचे। यहां आकर देखा कि हर आदमी पैसे के पीछे भाग रहा है। हर कोई एक दूसरे की टांग खींचने में लगा है। दूसरे की मेहनत का फायदा कोई और लूट ले रहा है, तो हरिओम ने उस गांव की मिट्टी की ओर रुख करने का सोचा, जो उनके ज़ेहन से कभी मिटी ही नहीं थी। आईटी की लाखों की नौकरी छोड़कर गांव की ओर लौट जाने के उनके खयाल का परिवार ने विरोध तो नहीं किया, लेकिन कुछ खास दिलचस्पी भी नहीं दिखाई। दोस्त-रिश्तेदारों ने तो उनकी इस शुरुआत को हल्के में लेते हुए इसे एक मूर्खतापूरअम कदम बताया। लेकिन हरिओम कहां रुकने वाले थे, एक बार जो सोच लिया उसे करके दिखाया।

हरिओम ने किसी की नहीं सुनी और अपने बिजनेस का अंक गणित जरा हटकर बनाया। उनका मानना है, कि व्यवसाय की दृष्टि से जर्सी गायों की अपेक्षा देसी गायें पालना ज्यादा मुनाफेदार है। एक तो जर्सी के मुकाबले देसी गायें कम समय में दूध देने के लिए तैयार हो जाती हैं। इसके गोबर से अगरबत्ती, वर्मी कंपोस्ट और बायोगैस तैयार हो जाती है। इसका गोबर जीवाणु निरोधक भी होता है। पिछले कुछ समय से इसका मूत्र भी अच्छे दाम पर बिकने लगा है। इतने तरह के फायदे विदेशी नस्ल की गायों से संभव नहीं है।

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हरिओम का बिज़नेस डेयरी से शुरू होकर आज पॉल्‍ट्री, कंपोस्टिंग और जैम-अचार-शर्बत बनाने की फैक्‍ट्री तक पहुंच गया है। जब उन्‍होंने डेयरी काम शुरु किया था, रोजाना सिर्फ नौ रुपए की बचत होती थी। परिवार और नाते-रिश्ते के लोग भी नाक-भौह सिकोड़ने लगे, कि ये कैसा काम शुरू कर दिया है। यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा। वह हिम्मत नहीं हारे। कुक्कुटशाला भी खोल ली। बकरी पालन के साथ मशरूम की खेती भी करने लगे। इसके बाद स्थितियों ने तेजी से करवट ली। आज उनका काम-काज तेजी से चल निकला है। आज की तारीख में उनके व्यवसाय से लगभग 40-50 के बीच महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो उनके काम को काफी अच्छे से कर रही हैं। जो कल तक 1-1 रुपये के लिए किसी और का मुंह ताकती थीं, उनकी आर्थिक मदद से अब उनके घर परिवार चल रहे हैं। हरिओम बताते हैं, कि 'कितने ऐसे परिवार हैं, जिनमें लोग घर की महिलाओं के लिए पहले इस काम को करने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन अब उन औरतों के पति भी अपनी नौकरी छोड़ कर हमसे जुड़ने को तैयार हैं। हमारे साथ वही महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो आर्थिक रूप से काफी कमज़ोर स्थिति में थीं, लेकिन वे अब अपने घर को अच्छे से चलाने में तत्पर हैं।'

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हरिओम ने इंजीनियरिंग पढ़ाई-लिखाई देहरादून के ग्राफिक ऐरा से की। उसके बाद बीआईटी, फिर जयपुर राजस्थान जेएनयू से एमसीए किया है। उनका कारोबार चल निकला है। वह इन दिनो सैकड़ों बेरोजगारों को काम-धंधा देने के मिशन में जुटे हुए हैं। वह चाहते हैं कि एक हजार लोग उनके सहयोग से अपनी रोजी-रोटी अपने बल पर कमाएं। अपने घर-गांव में रहते हुए बिजनेस करने के इच्छुक क्षेत्रीय युवाओं को वह ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। साथ ही मिनी स्टोरों के जरिये अपने बिजनेस का उत्तराखंड में विस्तार करने में जुटे हुए हैं। हिरओम भविष्य में भारत के अधिकतर शहरों में मिनी स्टोर खोलना चाहते हैं और साथ ही अपने उत्पाद को अॉनलाईन भी लाने की कोशिश में हैं, जिससे कि दूसरे शहरों में बैठे लोगों के अच्छा सामान आसानी से उपलब्ध हो सके।

हरिओम ने अपना काम-काज स्वयं ही डिजाइन किया है। भूतल में डेयरी फार्म है। उसके ऊपर दो बड़े मुर्गी पालन हॉल हैं। देसी मुर्गियों के लिए अलग बाड़ा है। डेयरी परिसर में ही वह मशरूम का उत्पादन भी करने लगे हैं। अपने यहां स्थाई रूप से काम करने वाले कर्मचारियों को उन्होंने आवासीय सुविधा भी दे रखी है। अपने यहां उत्पादित दूध, अंडे और चिकन की वह बाजार भाव से कम रेट पर होम डिलवरी कराते हैं। इस कारोबार से प्रतिमाह उन्हें 4-5 लाख के करीब प्रॉफिट मिल जाता है।

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