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पुराने जूते इकट्ठे करने से लेकर ओलंपिक मशाल थामकर दौड़ने वाली सिमरन दुनिया को बदलने का रखती हैं माद्दा

भारतीय मूल की 17 वर्षीय सिमरन वेदव्यास यूएई में रहकर अपनी एनजीओ सिनर्जी के माध्यम से कर रही हैं जनसेवापुराने जूतों को AMPATH के सहयोग से अफ्रीका के युगांडा और कीनिया में जरूरतमंदों के बीच किया वितरित मानवीय प्रतिबद्धता के लिये ‘हार्ट आॅफ गोल्ड’ और प्रिंसेस डायना इंटरनेशनल अवार्ड से नवाजी जी चुकी हैं सिमरन

24th Oct 2015
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एक 17 वर्ष की लड़की दूसरे लोगों के लिये जूते इकट्ठे करने और ऐसे ही अपनी उम्र से बड़े काम आखिरकार क्यों कर रही है जिनकी इस उम्र में उससे करने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती?

वास्तव में थोड़ा बहुत! अपनी एक बेहद शांत आवाज और अपनी इस उम्र से कहीं बड़ी परिपक्वता के अंदाज़ में सिमरन वेदव्यास मुझे दुबई से फोन पर बताती हैं कि वे जो कुछ भी कर रही हैं वह क्यों कर रही हैं।

पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में हमेशा अव्वल रहकर हमेशा डिस्टिंक्शन पाने के अलावा अपनी मानवीय प्रतिबद्धता के लिये ‘हार्ट आॅफ गोल्ड’ और प्रिंसेस डायना इंटरनेशनल अवार्ड से नवाजी जी चुकी यह युवा तुर्क एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) युवा समूह, सिनर्जी (SynergY) की संस्थापक और अध्यक्ष हैं। अपनी इस एनजीओ के माध्यम से यह स्थिरता, मानवाधिकार, गरीबी और भूख के उन्मूलन, पीने के लिये साफ पानी की उपलब्धता, शिक्षा, स्वस्थ जीवन और सबके लिये बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की पैरवी करती हैं। इन सबके अलावा स्वास्थ्य, शांति, पर्यावरण, युवा सशक्तीकरण, लैंगिक समानता और सभी के लिये शिक्षा जैसे मुद्दे उनके दिल के सबसे करीब हैं।

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याॅरस्टोरी ने सिमरन से बात करके यह जानने का प्रयास किया कि वे क्या कारक हैं जो उन्हें इन मुद्दों को अपनाने और समाज में एक बदलाव लाने के लिये सोचने को प्रेरित करते हैं।

एक प्रारंभिक बढ़त

सिमरन ने बहुत छोटी उम्र में ही अपने कदम आगे बढ़ा दिये थे। मात्र 7 वर्ष की उम्र में ही वे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित मिशनरीज़ आॅफ चैरिटी के केंद्र में आने-जाने लगी थीं। हालांकि उस उम्र में वे खुद को मरीजों के साथ जोड़ने में असमर्थ रहती थीं। उस समय उनकी दादी उन्हें अपने साथ इस केंद्र में लेकर जातीं और वे उन्हें इन सब बातों से अवगत करवातीं। 

‘‘मैं अबतक जितने भी लोगों को जानती हूँ मेरी दादी उन सबमें सबसे अधिक मजबूत व्यक्तित्व की स्वामी हैं और मैंने हमेशा से उनकी ओर ही देखा है। उन्होंने मुझे यह समझने में मदद की कि यह लोग हमसे इतने अलग क्यों हैं और उससे भी अधिक उनकी स्थिति के बारे में। साथ ही उन्होंने मुझे यह भी समझाया कि मैं उनकी मदद करने की स्थिति में हूँ और उन्होंने मेरे अंदर के दया के भाव को भी जगाने में एक अहम किरदार निभाया। इसके अगले वर्ष मेरे परिवार ने यह सुनिश्चित किया कि मैं दोबारा उस केंद्र में जाऊँ और इस बार मैं पहले से अधिक सहज थी। बीते आठ वर्षों से मैं लगातार इस केंद्र का दौरा कर रही हूँ और अब तो कुछ बच्चे मुझे पहचानने भी लगे हैं और मैं खुद भी बड़ी बेसब्री से वहां जाने का इंतजार करती हूँ। इन दौरों ने मुझे आज मैं एक व्यक्ति के तौर पर जो कुछ भी हूँ बनाने में और मेरे द्वारा चुने जाने वाले विकल्पों को बहुत हद तक प्रभावित किया है।’’

लगभग उसी दौरान सिमरन के मन में पर्यावरण के प्रति रुझान भी उनके दादी-दादा के फार्महाउस पर विकसित हुआ। वह बचपन से पौधों की ओर आकर्षित रहती थी और उन्हें बढ़ते देखकर काफी खुश होती थी। ‘‘घर के बाहर प्रकृति के बीच खड़े होना मुझे हमेशा से ही शांत और सौहार्द की भावना प्रदान करता रहा है और आज भी स्थितियां इससे भिन्न नहीं हुई हैं। मैंने घर पर ही कागज, पुराने डिब्बो और अन्य सामान को रीसाईकिल करना प्रारंभ किया और उसके बाद मैं इस सामान को विभिन्न संगठनों के हवाले कर देती।’’

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बीतते हुए वर्षों के साथ स्थिरता की ओर सिमरन के रुझान में वृद्धि ही हुई है। उन्होंने अबतक समाज और पर्यावरण के लाभ के लिये बेहद सफलतापूर्वक 60 से भी अधिक सुनियोजित अभियानों का नेतृत्व किया है जिनमें युवाओं ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया है। उनके इन अभियानों में सबसे अधिक असाधारण अभियान के दौरान उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के विभिन्न स्कूलों और संस्थानों में अध्ययनरत 300 से भी अधिक छात्रों के सहयोग से यूएई के विभिन्न लैंडफिल में 2 हजार से भी अधिक पौधों को उगाने में सफलता पाई है।

सिनर्जी (SynergY)

आधिकारिक तौर पर वर्ष 2012 में शुरू होने के बाद से सिनर्जी के माध्यम से यूएई के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के छात्र स्वास्थ्य, पर्यावरण, शिक्षा और कल्याण के क्षेत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए सामाजिक उत्थान और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के एकमात्र उद्देश्य को लेकर काम कर रही है। सिनर्जी भारत में स्थित काॅस्मो फाउंडेशन के अंतर्गत संचालित होती है और इसका कार्यक्षेत्र भारत और यूएई में फैला हुआ है।

पुराने जूते इकट्ठे करना

सिमरन 30 दिनों से भी कम समय में 3 हजार जोड़ी से भी अधिक जूते सफलतापूर्वक एकत्रित कर चुकी हैं। बाद में इन जूतों को अमरीकी सहायता प्राप्त AMPATH के सहयोग से अफ्रीका के युगांडा और कीनिया में जरूरतमंदों के बीच वितरित किया गया।

एबाॅट डायबिटीज केयर कांफ्रेंस के दौरान सिमरन के पिता की मुलाकात अफ्रीका के मधुमेह के रोगियों के लिये जूते इकट्ठे कर रही लू नामक एक महिला से हुई। उनके पिता ने उन्हें लू के इस प्रयास से अवगत करवाया। दुर्भाग्य से इस कांफ्रेंस के केवल दो दिन बाद अपने घर वापस जाते समय लू की असामयिक मौत हो गई क्योंकि वे टाइप 2 के मधुमेह से पीडि़त थीं। हालांकि सिमरन कभी भी लू से नहीं मिली थीं लेकिन उन्होंने उनकी इस परियोजना को अपने हाथों में लेने का फैसला किया और जूतों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। सिमरन ने अपने इस अभियान में सोशल मीडिया का भी सहयोग लिया। इसी दौराल गल्फ न्यूज़ ने उनके इस अभियान को आगे बढ़ाया और उन्होंने इनकी ईमेल भी साझा की। सिमरन यह देखकर आश्चर्यचकित रह गईं कि उनका ईमेल योगदान करने के तत्पर यूएई के लोगों के मेल से भर गया। बहुत ही कम समय में जूतों को एकत्रित करके अफ्रीका भिजवा दिया गया।

युवा और परिवर्तन की शक्ति

‘‘जी हाँ मुझे इस बात का यकीन है कि आज के युवाओं के पास शक्ति, प्रेरणा और दुनिया को बदलने का माद्दा है।’’

एक युवा और प्रतिभाशाली स्वप्नदर्शी के रूप में सिमरन स्वप्रेरित हैं और उनके लिये सफलता का सिर्फ एक सीधा सा मतलब है, ‘‘सिर्फ यह विश्वास कि आखिरकार दिन के अंत में मेरे कार्यों के चलते दुनिया में कम से कम एक व्यक्ति पर तो सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।’’

अबतक अपने इन कामों के लिये मिली पहचान और पुरस्कारों के बीच वे वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक की मशाल को लेकर चलने के लिये खुद के चुने जाने को सबसे विशेष मानती हैं।

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भारतीय मूल की होने के बावजूद सिमरन की पैदाइश और लालन-पालन दुबई में हुआ। वे प्रतिवर्ष भारत की यात्रा करती हैं और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रयास करती हैं। इस युवा महिला के अनुसार, ‘‘विश्व शांति में सबसे बड़ी बाधा विचारकों की कमी और अलगाव, सच्चे प्रेम और विश्वास की कमी के अलावा ‘सभी की समानता’ के विचार में विश्वास की कमी है। हमें बीते हुए कल से सीखने के अलावा आज के लिये जीने और आने वाले कल के लिये उम्मीद करने की आवश्यकता है।’’

बहरहाल अगर एक 17 वर्ष की युवा विश्वशांति की कल्पना कर सकती है तो इसका सीधा मतलब है कि हम भविष्य के लिये कल्पना कर सकते हैं।

अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने और माॅल घूमने जाने के साथ ही उन्होंने अपने मित्रों को इन प्रयासों और अभियानों में प्रभाव छोड़ने के लिये भी एक हिस्सा बना रखा है। ‘‘हमारे द्वारा किया जा रहा यह काम इतना प्रभावशाली है कि अपने मित्रों के साथ इसपर ध्यान केंद्रित हुए सप्ताहांत बिताना वास्तव में बहुत बेहतरीन अनुभव रहता है।’’

पाँच वर्ष आगे की सोच

सिमरन के आसपास के लोगों और उनकी परेशानियों की गहरी समझ है और यह एक परिवर्तन निर्माता होने की उनकी क्षमता को प्रतिबिंबित भी करती है। अबसे पांच वर्ष बाद वे चिकित्सा और सर्जिकल साइंस का अध्ययन करने का इरादा रखती हैं। वे पूर्ण स्पष्टता और अपनी बात पर जोर देते हुए कहती हैं, ‘‘मेरी दिलचस्पी हमेशा से ही स्वास्थ्य विज्ञान में रही है और मैं आने वाले समय में इसी का अध्ययन करना चाहती हूँ। चिकित्सा के क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ नया हो रहा है और स्थिरता इसका एक बड़ा हिस्सा है और मैं इस परिवर्तन की एक भागीदार होना चाहती हूँ।’’

वे अमीरात्स यंग एचीवर्स अवार्ड को लेकर काफी उत्साहित हैं जिसके लिये उन्हें मनोनीत किया गया है और उन्हें इस बात की उम्मीद है कि भारी जनसमर्थन और उनकी साख उन्हें विजेता के रूप में सामने आने में मदद करेगी।

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