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'ज़िंदगी की दौड़ में खुद के लिए दौड़ना शुरू कीजिए, शांति और ऊर्जा मिलेगी'

लोगों को दौडऩे के लिए प्रेरित करता है ग्लोबलरेसर्स। ग्लोबलरेसर्स, जिसने दौडऩे वाले के लिए तैयार की जमीन।

24th Apr 2015
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कई बार हम जिंदगी को लेकर सोचते कुछ हैं और हो कुछ और जाता है। कुछ ऐसा कि उसके बाद जिंदगी की रूपरेखा ही बदल जाती है। कविता कानापार्थी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई करने वे अमेरिका चली गईं। वहां उन्होंने पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उसके बाद कंप्यूटर हार्डवेयर की पढ़ाई और फिर इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स भी कर लिया। पढ़ाई के साथ-साथ कविता ने अपने दौडऩे के शौक को भी बरकरार रखा। जब भी कोई रेस होती कविता उसमें जरूर भाग लेती। दौड़ना हमेशा कविता को पसंद रहा है। दौड़ने से कविता को हमेशा ऊर्जा मिलती रही है। दौड़ कर कविता फ्रीडम महसूस करतीं और मुश्किल रास्तों पर दौड़ने में कविता को ज्यादा मजा आता।

एक बार सुबह 5 बजे कविता अपने दोस्त के घर जा रही थीं रास्ते में कविता का एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे में कविता को काफी चोट आई और उनकी कई हड्डियां भी टूट गईं। इस वजह से उन्हें लगभग तीन हफ्ते कोमा में भी रहना पड़ा। इस वक्त वे 15 साल की थीं और उनकी बोर्ड की परीक्षाएं भी शुरु होने वाली थीं। लेकिन यह कविता के भीतर छिपा आत्मविश्वास ही था जिसने कविता को इस मुश्किल दौर में भी टूटने नहीं दिया।सन 2009 में कविता अमेरिका से भारत वापस आ गईं। यहां एक रेस के दौरान वह एक रनर से मिलीं और दोनों ने तय किया कि वे पहाड़ों में भी दौड़ लगाएंगे लेकिन उसके लिए काफी व्यवस्था करनी थी। कविता ने वहां के स्थानीय लोगों की मदद से उस इलाके का मैप तैयार किया फिर रेस की पूरी प्लानिंग बनाई। यह रेस बहुत कामयाब रही। इस सफलता के बाद कविता को अहसास हुआ कि वे केवल दौड़ ही नहीं सकती बल्कि दौड़ आयोजित भी कर सकती हैं। अपने भीतर छिपे इस गुण का पता जब कविता को लगा तो उन्होंने पूरे उत्साह के साथ ग्लोबलरेसर्स की शुरुआत कर दी।

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इसके बाद कविता ने रेस ऑर्गनाइजिंग पर अपना पूरा ध्यान लगा दिया। इस विषय के विभिन्न पहलुओं को गंभीरता से समझा। खूब किताबें भी पढ़ीं। इसके बाद कविता का रेस को लेकर नजरिया काफी व्यापक हो गया। अब यह केवल एक शौक नहीं रहा बल्कि एक ऐसा कैरियर बन गया जिसमें उन्हें तो बहुत मजा आ ही रहा था साथ ही वह दूसरों को रेस के लिए प्रेरित भी कर रही थीं और दौड़ से जुड़े फायदे भी बता रही थीं। अब वे इस बात पर सोचने लगी थीं कि रेस के लिए क्या इंटरनेशनल स्टैंडर्ड होने चाहिए। रेसर्स को कैसे ट्रेनिंग देनी है? अब यह ऐसे बिंदु थे जिस पर विचार करना बहुत जरूरी हो गया था।ग्लोबलरेसर्स ने अपनी पहली रेस जैसलमेर से पोखरन तक की रखी। इस रेस को बहुत कामयाबी मिली। उसके बाद 210 किलोमीटर की 'द थार रन' का आयोजन किया गया। इस रेस को पांच चरणों में राजस्थान के थार रेगिस्तान में आयोजित कराया। थार रन में भारत के पहले अल्ट्रारनर अरुण भारद्वाज के साथ दो जर्मन धावक, दो सिंगापुर के धावकों और एक कैनेडियन धावक ने भाग लिया।

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ग्लोबलरेसर्स एक ऐसा समूह है जो रेसर्स को प्रमोट करता है। दौड़ और साइकलिंग के लिए चाहे ट्रेनिंग देने का काम हो या फिर किसी भी प्रकार की मदद, यह अपने संपर्क से एथलीटों को स्पॉन्सरशिप भी दिलवाता है। कविता ग्लोबलरेसर्स के माध्यम से लोगों को दौडऩे के फायदे बताती हैं। दौड़ आयोजित कराती हैं। वे कई कंपनियों के साथ पार्टनरशिप में भी यह काम कर रही हैं।

आज कविता अपना काम सफलतापूर्वक कर रही हैं। इस काम में उन्हें बहुत सराहना भी मिल रही है लेकिन उनकी सफलता का यह सफर कई तरह की दिक्कतों से भरा भी रहा। कई बार दिक्कतें ऐसे समय में आईं जब आयोजन के लिए बहुत कम समय बचा होता था। लेकिन कविता ने अपने कौशल से रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को दूर किया और आयोजन को सफल बना दिया। बेशक आज ग्लोबलरेसर्स काफी जान मान नाम हो चुका है लेकिन कविता पहले केवल एक ब्लॉग बनाना चाहती थीं जिसपर वे अपने सभी रेसों का ब्यौरा डाल सकें।

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कविता जिंदगी में जब भी कंफ्यूजन महसूस करती हैं, किसी उलझन में उलझी होती हैं तो वे अपने जूते पहनती हैं और फीते बांधकर दौडऩे निकल पड़ती हैं। दौड़कर उन्हें बहुत शांति और ऊर्जा मिलती है।

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