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कविता मेरे घर में पहले से थी - केदारनाथ अग्रवाल

प्रगतिशील काव्य-धारा के शीर्ष कवि केदारनाथ अग्रवाल की पुण्यतिथि पर विशेष... 

जय प्रकाश जय
22nd Jun 2017
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'काल पड़ा है बँधा, ताल के श्याम सलिल में, ताब नहीं रह गई, देश के अनल-अनिल में...' ये शब्द हैं, प्रगतिशील काव्य-धारा के शीर्ष कवि केदारनाथ अग्रवाल के। आज के दिन ही वह हमारे बीच से सदा के लिए चले गए थे। उनके पिता हनुमान प्रसाद अग्रवाल भी कवि थे, जिनका एक काव्य संकलन ‘मधुरिम’ प्रकाशित हुआ था। स्वयं के बारे में केदारनाथ लिखते हैं- 'कवि चेतन सृष्टि के कर्ता हैं। हम कवि लोग ब्रह्मा हैं। कवि को महाकाल मान नहीं सकता। मैं उसी की लड़ाई लड़ रहा हूँ।'

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केदारनाथ अग्रवाल की करीब ढाई दर्जन कृतियों में 23 कविता संग्रह, एक अनूदित कविताओं का संकलन, तीन निबंध संग्रह, एक उपन्यास, एक यात्रा-वृत्तांत, एक साक्षात्कार संकलन और एक पत्र-संकलन है। उनका पहला काव्य-संग्रह 'युग की गंगा' देश की आज़ादी के पहले मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ था। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार आदि से समादृत किया गया था।

बाँदा (उत्तर प्रदेश) के गाँव कमासिन में जनमे नवगीतकार केदारनाथ अग्रवाल पेशे से वकील थे। अपने सृजन-सरोकारों पर प्रकाश डालते हुए कभी उन्होंने कहा था - "कविता मेरे घर में पहले से थी। मेरे पिता ब्रजभाषा और खड़ी बोली में कविता लिखते थे। मेरी चौपाल में आल्हा संगीत होता था। मेरे मैदान में रामलीला खेली जाती थी। उसका प्रभाव मन-मस्तिष्क पर पड़ता था। कविता में मेरी रुचि बढ़ने लगी और मैंने पद्माकर, जयदेव और गीत गोविंद पढ़ा। इसी तरह की मानसिकता बनने लगी। गाँव में और कोई सुख नहीं था, खाओ, पीओ और स्कूल जाओ। इस तरह कविता मेरे अंदर पैठ गई और वह मेरे इंद्रियबोध को संवेदनशील बनाने लगी और अपने को व्यक्त करने की लालसा जागृत करने लगी कि मैं भी कुछ लिख सकूँ तो अच्छा लगेगा। गाँव का वातावरण, चार-चार गाँव का तालाब, हिरन का दौड़ना, देखना, खेत-खलिहान में जाना। नगर-दर्शन भी होता था। मिडिल तक स्कूल था। टीचर मेरे घर आते थे। भीतर-बाहर इस तरह कविता का संसार, मोहक संसार लगने लगा। सौंदर्य को, मानवीय सौंदर्य को, प्रकृति के सौंदर्य को देखने की लालसा जगी। उस समय नौतिकता-अनैतिकता का बोध तो था नहीं, यह तो बाद की चीजें थीं।"

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केदारनाथ अग्रवाल जब 1930 के दशक में अपनी रचनाओं से हिंदी साहित्य को संपन्न कर रहे थे, वह आजादी के आंदोलन का जमाना था। उन्हीं दिनो वर्ष 1936 में हिंदुस्तान के हिंदी साहित्य में प्रगतिशील धारा मुखरित हो रही थी। लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन भी हुआ था। प्रारंभ में उन्होंने प्रेमपरक गीत रचे थे। बाद में क्रमोत्तर उनके शब्द प्रगतिशील चेतना के अग्रणी संवाहक बनते चले गए।

आजकल की तो बौद्धिक कविताओं की संरचना जितनी जटिल और उसके अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया जितनी अबूझ, अमूर्त और अर्थहीन है, वह उतनी ही श्रेष्ठ कविता मानी जा रही है। जो कविता पाठकों की समझ में नहीं आये, वह भला प्रभावशाली, कलात्मक और सोद्देश्य कैसे हो सकती है? जिस कवि से जनता सीधे संवाद करती हो, उसे आज की अबूझ और निरी गद्यात्मक कविता, जो व्यापक जन-जीवन से पूरी तरह विस्थापित हो चुकी है, से प्यार कैसे हो सकता है। इसलिए आज की अबूझ गद्य कविता की वर्तमान स्थिति को देखेते हुए केदारनाथ अग्रवाल ने क्षुब्ध स्वर में कहा है- 

'आज कविता को नंगा कर दिया गया है, उसकी रीढ़ तोड़ दी गई है, उसे हर तरह से अपंग कर दिया गया है, उसकी स्वर और ध्वनियां छीन ली गई हैं। उसे भाषायी संकेतबद्धता से वंचित कर दिया गया है, उसे कवि के अचेतन मस्तिष्क में ले जाकर ऊलजलूल में भरपूर भुला-भटका दिया गया है। अब आज जब सब दफ्तर के बाबू हो गए हैं, छोटे, बड़े नगरों में खोए हुए हैं, जनता से कट चुके हैं, बोलने में बुदबुदाते हैं, लिखने को कविता लिखते हैं मगर कविता नहीं लिवर लिखते हैं, नये-नये वाद-विवाद के चक्कर में डालडा के खाली डिब्बे पीटते हैं। करते कुछ नहीं, काफी हाउस में बकवास करते हैं। पराये (विदेशी कविता) की नकल में अकल खर्च करते हैं और कविता को अपनी तरह बेजान बनाते हैं। भाषा को चीर-फाड़कर चिथड़े-चिथड़े कर देते हैं।'

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केदारनाथ अग्रवाल की करीब ढाई दर्जन कृतियों में 23 कविता संग्रह, एक अनूदित कविताओं का संकलन, तीन निबंध संग्रह, एक उपन्यास, एक यात्रा-वृत्तांत, एक साक्षात्कार संकलन और एक पत्र-संकलन है। उनका पहला काव्य-संग्रह 'युग की गंगा' देश की आज़ादी के पहले मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ था। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार आदि से समादृत किया गया था।

केदार बाबू के नवगीत की सार्थक पहलकदमी ने पारंपरिक गीत की विषयवस्तु को ही नहीं बदला, उसकी अनुभूति की संरचना (भाषा, शिल्प, विचारधरा और अनुभूति का सम्मिलित रूप), अभिव्यक्ति-भंगिमा और रूपाकार को भी बदल दिया और, यह अचानक किसी एक वर्ष में घटित नहीं हुआ; धीरे-धीरे और सामाजिक परिवर्तन को कदम-ताल देते हुए घटित हुआ। सहजता उनके गीत-नवगीतों की एक विशेष शक्ति थी। 'वसंती हवा हूं', उनकी एक कालजयी रचना है, जिसकी बोधगम्यता किसी को भी पाठ के लिए आमंत्रित कर लेती है -

हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ।

सुनो बात मेरी - अनोखी हवा हूँ।

बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला,

नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ।

जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ,

मुसाफिर अजब हूँ, न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा,

न इच्छा किसी की, न आशा किसी की,

न प्रेमी, न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ।

जहाँ से चली मैं, जहाँ को गई मैं -

शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन,

हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं।

झुमाती चली मैं, चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया;

गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर,

उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू',

उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची -

वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं!

खड़ी देख अलसी, लिए शीश कलसी,

मुझे खूब सूझी - हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी!

इसी हार को पा, हिलाई न सरसों,

झुलाई न सरसों, मुझे देखते ही अरहरी लजाई,

मनाया-बनाया, न मानी, न मानी;

उसे भी न छोड़ा - पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला;

हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ,

हँसे लहलहाते हरे खेत सारे,

हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी;

बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी!

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