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स्वच्छ भारत के सपने को साकार कर रही हैं झारखंड की 'रानी मिस्त्री'

6th Jun 2018
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लोग उन्हें 'रानी मिस्त्री' के नाम से जानते हैं। ये 'रानी मिस्त्री' केवल घर ही नहीं बनाती हैं बल्कि एक ऐसा काम करती हैं जिसको लेकर पूरे देश में एक मुहिम छिड़ी हुी है। जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए ये 'रानी मिस्त्री' बेहद ही प्रभावित करने वाला काम कर रही हैं।

(फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)

(फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)


अक्सर, इन रानी मिस्त्रियों को अपना काम पूरा करने के लिए दूसरे गांवों में रहना पड़ता है। कई बार जहां गांवों में कोई सड़कों नहीं होती है, वहां उन्हें पैदल 4 से 5 किमी की यात्रा करनी पड़ती है। 

हम सभी ने 'राज मिस्त्री' के बारे में सुना है, वे लोग जो हमारे सपनों के घर को आकार देते हैं, बिल्डिंग बनाते हैं। लेकिन, झारखंड में, इस पुरुष-वर्चस्व वाले फील्ड में महिलाओं ने सीधी टक्कर दी है। उन्होंने सफलतापूर्वक निर्माण (कंस्ट्रक्शन) के क्षेत्र में प्रवेश किया है। लोग उन्हें 'रानी मिस्त्री' के नाम से जानते हैं। ये 'रानी मिस्त्री' केवल घर ही नहीं बनाती हैं बल्कि एक ऐसा काम करती हैं जिसको लेकर पूरे देश में एक मुहिम छिड़ी हुई है। जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए ये 'रानी मिस्त्री' बेहद ही प्रभावित करने वाला काम कर रही हैं। कह सकते हैं कि ये महिलाएं स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए ही इस मैदान में उतरी हैं। दरअसल स्वस्थ और स्वच्छ भारत को बढ़ावा देते हुए झारखंड में स्वयं सहायता समूह (SHG) के सदस्यों ने घरों में शौचालयों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

गांवों में शौचालयों निर्माण उन योजनाओं में से एक है जहां अनुदान के तौर पर 2,000 रुपये एडवांस में दिए जाते हैं। ये पैसे एडवांस में इसिलए दिए जाते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि धन की कमी शौचालयों के निर्माण में बाधा न बने। चूंकि पुरुष खेतों में व्यस्त रहते हैं, इसलिए महिलाओं ने इस पहल को अपने हाथों में लिया है। सिमडेगा जिले के जलडेगा ब्लॉक में स्वयं सहायता समूह की दो सदस्या रानी मिस्त्री के रूप में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं। मोइलिन दांग बुंदुपानी गांव की रहने वाली हैं तो आश्रिति लुगुन कोनमुरैला पंचायत के तहत आने वाले कोलेमेदेगा गांव में रहती हैं। वर्ष 2016 में मोइलिन 'रोज (Rose)' स्वयं सहायता समूह में शामिल हुईं। वहीं एश्राती ने रोशनी स्वयं सहायता समूह ज्वाइन किया।

(फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)

(फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)


अपने अनुभव को साझा करते हुए, 32 वर्षीय मोइलिन कहती हैं, 'स्वयं सहायता समूह में शामिल होने से पहले हम वास्तव में असहाय महसूस कर रहे थे। हालांकि, अब हम जानते हैं कि किसी भी आपात स्थिति में हमारे पास सपोर्ट है।' अपनी यात्रा के बारे में बोलते हुए, आश्रिति लुगुन कहती हैं, "इससे पहले, हमारे इलाके में लोग हमारा मजाक उड़ाते थे और टिप्पणी करते थे कि महिलाएं पुरुषों के काम कैसे कर सकती हैं, लेकिन अब वे स्वीकार करते हैं कि एक औरत कुछ भी कर सकती है।"

इन महिलाओं को झारखंड राज्य लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा दो दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया था। उन्हें राज्य सरकार द्वारा मुफ्त में उपकरण भी दिए गए थे। प्रत्येक शौचालय के निर्माण के लिए, सरकार 2,100 रुपये देती है, जिसे रानी मिस्त्री समान रूप से बांट देती हैं। औसतन, दो रानी मिस्त्री तीन दिनों में एक शौचालय पूरा कर लेती हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि मोइलिन और आश्रिति लुगुन ने एक साथ मिलकर 26 शौचालयों का निर्माण किया है। जिनमें 9 शौचालय अपने गांवों में और शेष अन्य गांवों में बनाए हैं। यही नहीं पिछले दो महीनों में, उन दोनों ने 20,000 रुपये से लेकर 25,000 रुपये तक कमाए हैं।

रानी मिस्त्री (फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)

रानी मिस्त्री (फोटो साभार- एसबीएम वर्डप्रेस)


अक्सर, इन रानी मिस्त्रियों को अपना काम पूरा करने के लिए दूसरे गांवों में रहना पड़ता है। कई बार जहां गांवों में कोई सड़कों नहीं होती है, वहां उन्हें पैदल 4 से 5 किमी की यात्रा करनी पड़ती है। उनके इस मेहनत भरे काम ने लोगों को प्रभावित किया है। इसी साल महिला दिवस पर, उन्हें जिला प्रशासन द्वारा सम्मानित भी किया गया था। रानी मिस्त्री सिर्फ शौचालयों का निर्माण ही नहीं कर रही हैं, बल्कि वे यह भी सुनिश्चित कर रही हैं कि लोग इन शौचालयों का उपयोग करें। इसके लिए, वे शौचालयों का उपयोग न करने के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता पैदा करती हैं।

इन दोनों महिलाओं के काम का असर इस कदर पड़ा कि अब झारखंड के सिमडेगा, रांची, लोहरदगा, लातेहार, पलामू, चाईबासा जैसे जिलों के गांवों में महिलाओं की बड़ी तादाद अब मर्दों के इस एकाधिकार वाले राजमिस्त्री का काम संभालने लगी हैं। साथ ही स्वच्छ भारत कार्यक्रम के तहत शौचालय बनाने का काम मिलने से उनकी आर्थिक तंगी भी जाने लगी है। 

यह भी पढ़ें: इस महिला वन अधिकारी ने आदिवासी इलाके में बनवाए 500 टॉयलेट

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