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"देश को आर्थिक मंदी से निकालने के लिए प्रधानमंत्री को व्यावहारिक कदम उठाने की ज़रूरत"

योरस्टोरी टीम हिन्दी
24th Jan 2016
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दुनिया के एक जाने-माने अर्थशास्त्री अनातोले कैलेटस्काई ने वर्ष 2010 में ही भविष्यवाणी कर दी थी, "एक ऐसी नई अर्थव्यवस्था उभर कर सामने आ रही है जो न तो पूर्णतः बाजार आधारित होगी और न ही पूरी तरह से सरकार के हाथों में संचालित होने वाली होगी।" यह वह समय था जब समूचा विश्व वर्ष 2008 में मंदी के खतरों से जूझ रहा था। इसके अलावा उनका यह भी कहना था कि आर्थिक विकास के तीन चरण तो गुजर चुके हैं और चौथा बस प्रारंभ ही हुआ है। जैसा कि कैलेटस्काई लिखते हैं- 

‘‘प्रारंभिक 19वीं शताब्दी से लेकर 1920 तक का दौर मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का दौर था और सरकारों को व्यापार में किसी भी प्रकार का दखल देने की अनुमति नहीं थी। इसके बाद ग्रेट डिप्रेशन और सोवियत संघ के कम्युनिस्ट प्रयोगों ने पश्चिमी विश्व के इस पूर्वाग्रह को बदल दिया और एक नया विचार सामने आया जिसका मानना था कि बाजार को सिर्फ उसके दम पर ही नहीं छोड़ा जा सकता और राज्यों को अपने हाथ में अधिक जिम्मेदारी लेते हुए इसे कल्याणकारी राज्य में बदलना होगा।’’

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वह आर्थिक संकट का सामना करने के लिये न्यू डील सिद्धांत, रूज़वेल्ट दृष्टिकोण था। राज्य अचानक ही बड़ा भाई बन गया, ऐसा जिसमें सबको पता था कि यह बड़ा भाई है। लेकिन इसके बाद 70 के दशक में सामने आए तेल संकट ने विचारकों और नीति नियंताओं को मूत बाजार तर्क के बारे में पुर्नविचार करने पर मजबूर कर दिया। रोनाल्ड रीगन और मार्गेट थैचर नई आर्थिक भाषा के मसीहा बनकर उभरे और सामने आए। राज्य एक बार फिर बाजार के हाथों अपनी प्रमुखता से हाथ धो बैठा। शास्त्रीय अबंध नीति एक बिल्कुल नए रूप में सबके सामने आई। आर्थिक विकास के दूसरे चरण के बिल्कुल विपरीत अब राज्य ‘‘खलनायक’’ की भूमिका ले चुका था, विनियमन पीछे रह गया था और बाजार को उसके हाल पर खुला छोड़ दिया गया था। इसके अलावा भी तर्क दिया गया कि व्यापक और जोखिम मुक्त आर्थिक विकास के लिये राज्य और गिरजाघर को अलग करने की तरह ही राज्य और अर्थव्यवस्था को अलग किया जाए। लेकिन वर्ष 2008 की आर्थिक मंदी ने एक बार फिर इस तर्क पर सवालिया निशान लगाए और चिंतकों और नीति नियंताओं को भविष्य के लिये एक नया रास्ता तलाशने को मजबूर किया।

किसी भी नए विचार के आकार न लेने के चलते वर्तमान संकट और भी अधिक जोरदार और खतरनाक प्रतीत हो रहा है। यह हम भारतीयों के लिये और भी अधिक खतरनाक इसलिये भी है क्योंकि वैश्विक इतिहास में पहली बार भारत एक गंभीर साझीदार के रूप में सामने है और आर्थिक पुनरुत्थान एक बड़ा हिस्सा हम पर भी निर्भर करता है। लेकिन सरकार के अड़ियल रवैये के चलते आर्थिक पुनरुत्थान होता हुआ नहीं प्रतीत हो रहा है, जो सबसे अधिक चिंता का विषय है। भारत की जनता ने श्रीमान मोदी को बड़े जोरशोर से देश के प्रधानमंत्री के रूप में चुना था। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा गया था जो मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्षों में सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को एक नया जीवन देने में सफल होंगे और एक बड़ा उलटफेर करने मे सक्षम रहेंगे। लेकिन बड़े दुख की बात है कि ऐसा होता हुआ बिल्कुल भी दिखाई नहीं दे रहा है।

देश की आर्थिक स्थिति का पैमाना माना जाने वाला सेंसेक्स भी बहुत तेजी से नीचे गिरता चला जा रहा है। जब मोदी ने प्रधामंत्री के रूप में शपथ ली थी तब सेंसेक्स 27000 के आसपास था और आज यह गिरकर 24000 के लगभग आ गया है, जो वित्तमंत्री के लिये बहुत दुख की बात है। इसके अलावा रुपया भी हर दिन कमजोर होकर 70 डाॅलर को छूने के बिल्कुल करीब है। द हिंदू अखबार लिखता है - ‘‘नवंबर के महीने में देश के 8 प्रमुख क्षेत्रों का प्रदर्शन बहुत खराब था और उनका उत्पादन गिरकर 1.3 प्रतिशत तक आ गया है, जो पिछले एक दशक में सबसे निम्न है। बीते कुछ वर्षों में तेजी से उभरने के बाद विनिर्माण का क्षेत्र भी नवंबर के महीने में 4.4 प्रतिशत नीचे आ गया।’’ द हिंदू आगे लिखता है - ‘‘बीते वर्ष अक्टूबर में 9.8 प्रतिशत तक आने के बाद औद्योगिक उत्पादन सूचकांक नवंबर में गिरकर 3.2 प्रतिशत पर आ गया, जो वर्ष 2011 के बाद सबसे खराब स्थिति है।’’ द इकनाॅमिक टाईम्स लिखता है, ‘‘हालांकि इस वर्ष भारत के 7 से 7.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने की उम्मीद है, लेकिन भारत में काॅर्पोरेट की वृद्धि भारी कर्जे के बोझ तले दबी हुई है, बैंकिंग का क्षेत्र अत्याधिक तनाव में है और लगातार दो विफल मानसूनों के बाद ग्रामीण मांग में भारी कमी आई है।’’

भारत बहुत भाग्यशाली है कि वैश्विक स्तर पर तेल के दामों में भारी कमी आई है। जब मोदी ने गद्दी संभाली थी तब यह 133 डाॅलर प्रति बैरल की दर पर था जो आज गिरकर 30 डाॅलर प्रति बैरल से भी कम पर आ गया है। इसने मुद्रास्फीति से लड़ने और विदेशी रिज़र्ब को काबू में रखने में काफी मदद की है। लेकिन बाजार की यह ताजा अस्थिरता चीनी संकट की वजह से है, जो बीते 25 वर्षों के सबसे खराब दौर से गुजर रही है और इसी ने यह ताजा अस्थिरता पैदा की है। इस चीनी संकट ने इतना कहर ढाया है कि यह जनवरी बीते कई दशकों में सबसे खराब मानी जा रही है। बैंक आॅफ अमरीका मैरिल लिंच के अनुसार, ‘‘जनवरी के 3 सप्ताहों में ही वैश्विक कंपनियों के शेयरों के मूल्य से करीब 7.8 ट्रिलियन डाॅलर साफ हो गया था।’’ अमरीकी अर्थशास्त्री पहले से ही इस आशंका को व्यक्त करते हुए आ रहे हें कि, ‘‘आने वाले वर्ष में विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के मंदी के दौर में आने की संभावना 15 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है।’’ और यह वैश्विक बाजार के लिये बहुत ही खतरनाक संदेश है।

लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि भारत सरकार इस संकट से निबटने के लिये पूरी तरह से आश्वस्त है। 1985 के बाद की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद मोदी सरकार प्रारंभिक महीनों में सुधार के उपायों का प्रारंभ करने में नाकामयाब रही। इन्होंने यह सोचकर एक बहुत बड़ी भूल की है कि निचले सदन का बहुमत इन्हें तमाम विधायी बाधाओं से निकलने में मदद करेगा। अगर सरकार का रवैया कुछ नरम होता; इनकी सोच कम अभिमानी होती, तो अबतक जीएसटी, एक बेहद आवश्यक बिल जिसे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता माना जा रहा है, अबतक वास्तविक रूप ले चुका होता लेकिन अब यह विधायी गतिरोध में गुम हो गया है। इसके अलावा दिल्ली और बिहार में बीजेपी की जबर्दस्त हार ने भी प्रधानमंत्री को कमजोर किया है। विपक्ष ने अब खून चख लिया है। और अब वे कतई नहीं चाहते कि मोदी सरकार को राहत का कोई मौका मिले।

जब बाजार अपने आप उठने में सक्षम न हो रहा हो तो राज्य को हस्तक्षेप करना चाहिये। उसे एक ऐसा माहौल तैयार करना चाहिये जे उद्योग के दिग्गजों को आश्वस्त करे और कुछ साहसिक कदम भी उठाए जाने चाहिए। लेकिन इसके लिये संस्थागत और विधायी समर्थन की आवश्यकता होती है। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं प्रतीत होता है कि अपनी वर्तमान अकड़ में सरकार इस सच्चाई को मानने के लिये तैयार है। एक नए आर्थिक माॅडल के उद्गम के लिये यह बेहद आवश्यक है कि सरकार और बाजार के बीच एक मजबूत साझेदारी उभरकर सामने आए। वो दिन बीते जमाने की बात हो गए जब दोनों संस्थाएं एक दूसरे के विपरीत काम करती थीं। भारत अभी तक यह नहीं समझ पाया है कि हम एक आदर्श लोकतंत्र नहीं हैं और अभी भी हम पश्चिमी देशों के उलट एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था हैं। ऐसे में हमारे सामने काफी कठिन चुनौती है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भारतीय राज्य को अधिक विनम्र होना होगा, समाज के सभी हितधारकों को साथ लेकर चलना होगा, सभी लोकतांत्रिक संस्थाओ को एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी और विपक्षा को यह समझाने के गंभीर प्रयास करने होंगे कि आर्थिक पुनरुत्थान के लिये यह सबकुछ करना बहुत आवश्यक है।

मैं भारतीय नीति नियंताओं के लिये कैलेटस्काई को उद्धत करना चाहूंगा, ‘‘पूजींवाद 4 को यह मानना होगा सरकारें और बाजार सिर्फ इसलिये गलतियां नहीं करते हैं कि राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं, बैंकरर लालची हैं, व्यवसायी अक्षम हैं और मतदाता बेवकूफ हैं लेकिन ऐसा इसलिये भी होता है क्योंकि निर्णय लेने वाले किसी भी तंत्र को विकसित करने वाले के लिये लगातार सही होने को दुनिया बेहद कठिन और अप्रत्याशित है और ऐसे में व्यवहारिकता सार्वजनिक नीति में एक सांकेतिक शब्द होना वाहिये।’’ श्रीमान मोदी आपको और अधिक व्यवहारिक होने की आवश्यकता है और आपके लिये यह जानना भी बेहद आवश्यक है कि आज की नर्द दुनिया में पुराने साधन काम नहीं करने वाले।


(यह लेख मूलत: अंग्रेजी में लिखा गया है जिसको लिखा है आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने, जिसे अनुवाद किया है पूजा गोयल ने)

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