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कभी किराये के मकान की खोज में निकलकर खुद भी परेशान हुए थे हाउसिंग डॉट काम के अद्वितीय शर्मा

आशियाना ढूंढ रहे लोगों की मदद करके बनायी ख़ास पहचान और किया करोड़ों का कारोबारकिराये के मकान की तलाश में आयी दिक्कतों ने दिखाई नयी मंज़िलदर-दर भटकने के बाद मिला बेमिसाल कामयाबी का रास्ता

Geeta Parshuram
16th Feb 2015
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छोटी-छोटी घटनाएं भी ज़िंदगी में कभी-कभी काफी प्रभाव छोड़ती हैं। कभी कबार तो एक छोटी-सी घटना ज़िंदगी की दशा-दिशा बदल देती है। घटनाओं के क्रम में अचानक एक ऐसी घटना भी हो सकती है जो इंसान को कुछ बिलकुल अलग और अद्वितीय करने के लिए प्रेरित कर देती है ।

"हाउसिंग डॉट कॉम" की कल्पना ऐसे ही छोटी-छोटी घटनाएं के क्रम में हुई थी। रहने के लिए मकान ढूंढ रहे लोगों के बीच बेहद मशहूर इस वेबसाइट की शुरुआत की कहानी बेहद रोचक है। आईआईटी-मुंबई से पढ़ाई पूरी कर महानगर में रहने के लिए मकान ढूंढ रहे कुछ युवकों ने जो तकलीफें झेली, उसी का नतीजा रहा "हाउसिंग डॉट कॉम" का आगाज़। किराए पर रहने को मुंबई में घर नहीं मिला तो इन्हीं कुछ युवाओं ने मिलकर बना ली अपनी वेबसाइट।

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वेबसाइट इतनी लोकप्रिय हुई कि एक दिन में एक लाख से नए ज्यादा लोग वेबसाइट को देखने लगे। वेबसाइट की वजह से इन युवाओं को कमाई भी करोड़ों में होने लगी।

"हाउसिंग डॉट कॉम" की शुरुआत में अद्वितीय शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका है। अद्वितीय मूलतः जम्मू के रहने वाले हैं। उनके दादा मशहूर लेखक और रचनाकार हैं। उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है। अद्वितीय के पिता अनिल शर्मा डाक्टर हैं और जम्मू के पहले न्यूरोसर्जन भी। उनकी माँ अंजना शर्मा भी डाक्टर हैं और बतौर जनरल फिज़िशियन काम कर रही हैं । अद्वितीय के माता-पिता जम्मू में काफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने कई मरीजों का इलाज कर उन्हें नयी ज़िंदगी दी है।

बचपन से ही अद्वितीय पर अपने दादा और पिता का काफी प्रभाव रहा। बचपन की कुछ घटनाओं ने अद्वितीय के दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी थीं। बचपन में अद्वितीय ने देखा था कि दादाजी खुद को एक कमरे में बंद कर लिया करते थे और कई दिनों तक उसी कमरे में रहकर साहित्य-सृजन करते थे।

कई दिनों की मेहनत और कलम से कागज़ पर जद्दोजेहद का नतीजा होता कि एक कहानी बनती। ऐसी कई कहानियाँ अद्वितीय के दादाजी ने लिखीं और इन कहानियों को लोगों ने खूब सराहा। दादाजी के काम करने के तरीके और उनकी मेहनत का अद्वितीय पर काफी प्रभाव पड़ा।

एक बार अद्वितीय के पिता को सड़क-हादसे में घायल दो लोगों की जान बचाने के लिए १८ घंटों तक लगातार काम करना पड़ा। बड़े ही जटिल ऑपरेशन के बाद उन दो मरीज़ों की जान बच पायी। इस ऑपेरशन के बाद अद्वितीय ने अपने पिता से पूछा था कि क्या वे थके नहीं हैं? इस सवाल के जवाब में पिता ने जो कहा उसने अद्वितीय के दिमाग पर बड़ी गहरी छाप छोड़ी। पिता ने अद्वितीय से कहा, "मरीज और उनके रिश्तेदार जिस तरह का विश्वास मुझमें दिखाते हैं और जिस तरह की उम्मीद मुझसे करते है, उससे मेरी थकान हमेशा के लिए दूर हो जाती है " . अद्वितीय ने अपने पिता को मरीज़ों की सेवा में दिन-रात काम करते देखा है।

चूँकि माता-पिता दोनों डॉक्टर हैं, इसलिए अद्वितीय से भी परिवारवाले यही उम्मीद कर रहे थे कि वो भी डाक्टर बनेंगे । माता-पिता ने भी ऐसा ही सोचा था। लेकिन , अद्वितीय के मन में कुछ और ही चल रहा था। वे अपना अलग सपना देख रहे थे। सपना माता-पिता से सपने से जुदा था।

ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई के दौरान अद्वितीय एक अन्य शख्सियत से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। और, इस शख्सियत का नाम था कल्पना चावला। भारतीय मूल की इस अंतरिक्ष यात्री से अद्वितीय इतने ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने भी अंतरिक्ष यात्री बनने की ठान ली। मन बना लिया कि नासा जाना है और नासा की मदद से अंतरिक्ष की सैर करनी है ।

अद्वितीय ने खूब मेहनत कर आईआईटी में दाखिले की योग्यता हासिल की और फिर आईआईटी-मुंबई में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कोर्स में नामांकन करवाया। आईआईटी में पढ़ाई के दौरान अद्वितीय को अहसास हुआ कि आईआईटी की शिक्षा से वे अंतरिक्ष यान और विमान तो बना सकते हैं लेकिन अंतरिक्ष की यात्रा नहीं कर सकते। अद्वितीय को ये भी समझ में आ गया कि आईआईटी में अंतरिक्ष यान बनाना ही सिखाया जाता है न कि उसे उड़ाना।

कुछ समय के लिए तो उन्हें लगा कि उनका सपना पूरा नहीं होगा। लेकिन, आईआईटी-मुंबई में उन्होंने जो कुछ देखा-सुना और समझा था वो जीवन को सफल बनाने के लिए काफी था।

अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना धुंधला पड़ने पर अद्वितीय की पढ़ाई में दिलचस्पी कम हो गयी। उन्होंने फुटबॉल को अपना नया शौक बनाया। वे लगातार चार साल तक इंटर आईआईटी टूर्नामेंट में कॉलेज टीम के कप्तान रहे।

कालेज की पढ़ाई के दौरान ही अद्वितीय को कैंपस प्लेसमेंट में ही नौकरी मिल गयी. नौकरी मुंबई महानगर में ही मिली थी। चूँकि अब कॉलेज या फिर छात्रावास में नहीं रहा जा सकता था , अद्वितीय ने रहने के लिए मुंबई में मकान ढूंढ़ना शुरू किया।

किराये पर मकान ढूंढने की प्रक्रिया में ही अद्वितीय की ज़िंदगी बदल गयी। ज़िंदगी को नयी दशा-दिशा मिली। ज़िंदगी के मायने भी बदले। कारोबार का नया नज़रिया मिला। लोगों की मदद करने का रास्ता भी नज़र आया।

दिलचस्प बात ये थी कि बड़ा शहर होने के बावजूद अद्वितीय को मनचाहा मकान नहीं मिला। किराये का मकान खोज पाना उनके लिए सबसे बड़ी मुश्किल वाला काम बन गया। वे कई जगह गए, शहर का चप्पा-चप्पा छान मारा लेकिन वो नहीं मिला जिसकी तलाश थी। पसीना खूब बहा , मेहनत खूब लगी , समय भी बहुत खराब हुआ लेकिन मकान नहीं मिला। मकान की खोज में अद्वितीय ने एक ऑनलाइन रियल एस्टेट फर्म से भी मदद ली, लेकिन बात नहीं बनी। इस फर्म ने अपने एक विज्ञापन ने तीन बेडरूम वाले फ्लैट के १० हज़ार रुपये महीना किराये पर दिए जाने की बात कही थी। अद्वितीय को लगा कि इस बार उनका काम हो जाएगा। लेकिन , संपर्क करने पर फर्म के लोगों ने बताया कि फ्लैट किसी और को दिया जा चुका है। फर्म के लोगों ने इसी कीमत पर दूसरा फ्लैट दिलवाने की बात कही। लेकिन, अद्वितीय नहीं माने।

मकान की खोज में पेश आयी दिक्कतों ने अद्वितीय के मन में एक नए विचार को जन्म दिया। यही विचार कारोबार की शुरुआत की वजह बना।

अब अद्वितीय अच्छी तरह से समझ गए थे कि लोगों को मकान ढूंढने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किस तरह लोग रियल एस्टेट के कुछ कारोबारियों और दलालों के हाथों शोषण का शिकार होते हैं। अद्वितीय ने बड़ा फैसला लिया। फैसला लिया कि मकान की तलाश कर रहे लोगों की मदद की जाय। फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए अद्वितीय ने अपने दोस्तों की मदद ली। 11 दोस्तों के साथ मिलकर अद्वितीय ने एक रियल एस्टेट कंपनी बनाई। नाम रखा - "हाउसिंग डॉट कॉम" । चूँकि अद्वितीय और उनके साथ आईआईटी से थे , शिक्षा का भरपूर फायदा उठाते हुए उन सभी ने नया बिज़नेस मॉडल अपनाया। शुरू में बड़े पैमाने पर मकानों की जानकारियाँ इक्कठा की और अपना खुद का डेटा बनाया। मकानों के साफ़ और हाई क्वालिटी की तस्वीरें भी लीं। सारे डेटा की जांच के बाद सच्ची जानकारियाँ तस्वीरों के साथ वेबसाइट पर डाली गयीं। वेबसाइट कुछ ही दिनों में बेहद लोकप्रिय हो गयी। मकान की खोज में लगे लोगों को अद्वितीय और उनके साथियों की वेबसाइट से काफी मदद मिली। पसंद के मुताबिक मकान ढूंढ रहे लोगों को अब एक वेबसाइट की वजह से दर-दर भटकने की ज़रुरत नहीं रह गयी। घर बैठे लोग इंटरनेट और इस वेबसाइट के ज़रिये आसानी से अपनी ज़रूरतों और पसंद के मुताबिक मकान ढूंढने लगे।

वेबसाइट का प्रयोग कामयाब हुआ। कारोबार दौड़ पड़ा। मुनाफा लगातार बढ़ता गया। अद्वितीय की गिनती देश के सबसे होनहार और प्रतिभाशाली युवा उद्यमियों में होने लगी। "हाउसिंग डॉट कॉम" के मॉडल की ख्याति दुनिया-भर में फ़ैल गयी। "हाउसिंग डॉट कॉम" को सॉफ्ट बैंक से 554 करोड़ रुपए की फंडिंग भी मिली। अद्वितीय अपनी और अपनी वेबसाइट की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह विश्वसनीयता को बताते हैं। उनके अनुसार, वेबसाइट पर सच्ची और पक्की जानकारी ने ही उसे लोगों का विश्वासपात्र और लोकप्रिय बनाया। ख़ास बात ये भी है कि अद्वितीय और उनके साथ वेबसाइट पर ही नयी-नयी जानकारियां और सुविधाएं उपलब्ध करने के लिए अपनी कोशिशें जारी रखे हुए हैं। कुछ ही दिनों पहले वेबसाइट पर मैप बेस्ड प्लेटफार्म उपलब्ध कराया गया है। इस प्लेटफार्म की मदद से लोग मकानों के आसपास के माहौल , अस्पताल-स्कूल, होटल-पार्क, पुलिस स्टेशन जैसी सुविधाओं के बार में भी जान सकेंगे।

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