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ब्रेस्ट कैंसर को हराने वाली रंगकर्मी विभा रानी सैलिब्रेटिंग कैंसर के माध्यम से दे रही कैंसर से लड़ने की प्रेरणा

पंद्रह से अधिक नाटक, दो फिल्में, एक टीवी सीरियल और बीस से अधिक किताबें लिख चुकी विभा को जब पता चला कि उन्हें कैंसर है तो कुछ पल को उनकी दुनिया वहीं ठहर गई, लेकिन फिर उन्होंने उस ठहरी दुनिया में इंद्रधनुषी रंग भर एक नया आकाश बना लिया।

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20th Jun 2017
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कैंसर तो एक खतरनाक बीमारी है, फिर इसे कोई सैलिब्रेट कैसे कर सकता है? क्यों नहीं कर सकता है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मुंबई की विभा रानी। विभा वो मजबूत नाम हैं, जिन्हें ब्रेस्ट कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी भी हरा नहीं पाई। विभा ने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया और अब वो अपनी उसी ताकत को दूसरों की ज़िंदगी में भरने का प्रयास कर रही हैं।

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परिवार का साथ और स्वयं का आत्मविश्वास ज़िंदगी को जीने और बहादुरी से लड़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है, जिसका जीवंत उदाहरण हैं रंगकर्मी और लेखिका विभा रानी।

विभा हिंदी और मैथिली साहित्य की दुनिया का एक जाना माना नाम हैं। बीस से अधिक पुस्तकें लिख चुकी विभा थिएटर में भी अपनी एक खास पहचान रखती हैं। पंद्रह से अधिक नाटक, दो फिल्में, एक टीवी सीरियल और बीस से अधिक किताबें लिख चुकी विभा को जब पता चला कि उन्हें कैंसर है तो कुछ पल को उनकी दुनिया वहीं ठहर गई, लेकिन फिर उन्होंने उस ठहरी दुनिया में इंद्रधनुषी रंग भर एक नया आकाश बना लिया।

'बाबू मोशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' आनंद फिल्म के इस डायलॉग पर हमने जाने कितनी बार तालियां बजाई हैं, कितनी बार खिलखिलाए हैं। कैंसर से डरकर नहीं, लड़कर जीना चाहिए, यही सिखाती है न ये फिल्म। जानी-मानी रंगकर्मी और मैथिली साहित्यकार विभा रानी ने कैंसर के इस 'आनंद' को असल जिंदगी में जिया है। वो एक ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर हैं। उन्होंने न केवल कैंसर से जंग जीती बल्कि उसके प्रति लोगो में जागरूकता फैलाने को अपना मिशन बना लिया। उन्होंने कैंसर पर कविताएं लिखी नाटक लिखे और उनका एकल मंचन भी किया। विभा रानी ने जेल में बंद कैदियों के साथ भी साहित्य और नाटक के ज़रिये बहुत काम किया है। कैंसर से अपने युद्ध के दौरान उन्होंने बहुत-सी कविताएं लिखीं, जो अब एक संग्रह के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं। पुस्तक का शीर्षक है समरथ कैन

कैंसर रोग का विभा राग

तमाम जांच पड़ताल के बाद जब उन्हें कैंसर होने की पुष्टि हुई, तो उनके सामने दो ही स्थितियां थी, या तो वे हालात का मुकाबला रो कर करें या हंस का करें। उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। इसी कारण वे खुद भी हंस सकी और उनके आसपास के लोग भी मुस्कुरा सकें। उन्हें लगा कि कैंसर से वैसे ही माहौल गमगीन हो जाता है, तो क्यों न इससे जूझने जैसे शब्द के बजाय इसे मनाने और सेलिब्रेट करने जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जाये। उन्होंने सेलेब्रटिंग कैंसर नाम से एक लेख भी लिखा। आज सेलेब्रटिंग कैंसर एक मिशन बन चुका है।

सेलिब्रेटिंग कैंसर के जरिये विभा रानी लोगो में कैंसर के प्रति जागरूकता लाने और एक सकारात्मक नजरिया जगाने की कोशिश में लगी हैं। कहना गलत न होगा कि विभा ने अपने रोग को ही राग बना लिया है। यूं तो उनकी सभी कविताएं महत्वपूर्ण हैं लेकिन मन को सबसे ज़्यादा छूती हैं उनकी वो कविताएं जो उन्होंने कैंसर से अपने संघर्ष के दौरान लिखी। इन कविताओं में वो बेहद ज़िंदादिली से कैंसर जैसे भयंकर और डरावने रोग को कभी 'किस्सू डिअर' तो कभी 'केंसू डार्लिंग' कह कर बुलाती हैं।

विभा ने कैंसर पर लिखी अपनी सभी कविताएं उन लोगों को समर्पित की हैं, जिन्होंने कैंसर को कैंसर मानने से इंकार कर दिया है।

विभा रानी का जीवन और करीब से

विभा हिंदी और मैथिली साहित्य की दुनिया का एक जाना माना नाम हैं। बीस से अधिक पुस्तकें लिख चुकी विभा रानी थिएटर की दुनिया की बेहद महत्वपूर्ण हस्ती हैं। वो पंद्रह से अधिक नाटक, दो फिल्में ,एक टीवी सीरियल और बीस से अधिक किताबें लिख चुकी हैं। विभा को मैथिली फिल्म 'मिथला मखान' को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके गीत भी उन्होंने ही लिखे हैं। विलुप्तप्राय कैटेगरी में आ चुके शादी ब्याह में गाए जाने वाली गाली गीतों को भी संजोने में विभा काफी उम्दा काम कर रही हैं। वो कविता भी लिखती हैं, कहानी और नाटक भी। उन्होंने जेल में बंद कैदियों के साथ भी साहित्य और नाटक के ज़रिये बहुत काम किया है। विभा की जन्भूमि बिहार है। इसलिए बिहार की लोक संस्कृति उनके व्यक्तित्व में घुली मिली हुई है। फिलहाल वे मुम्बई में हैं। विभा इंडियन आयल कारपोरेशन में अधिकारी हैं। उनके पति अजय ब्रम्हात्मज वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं।

विभा रानी का अपना एक ब्लॉग है 'छम्मकछल्लो कहिस'। इस ब्लॉग के ज़रिये वो देश दुनिया विशेषकर महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठाती रहती हैं।

विभा अब तक कथा सम्मान, मोहन राकेश सम्मान, घनश्याम दास सर्राफ साहित्य सम्मान, डॉ महेश्वरी सिंह महेश सर्वोत्तम साहित्य सम्मान और साहित्यसेवी सम्मान से सम्मानित हो चुकी हैं। उनके दो नाटकों 'आओ तनिक प्रेम करें' और 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो' को मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। वे भारत से बाहर फिनलैंड और संयुक्त अरब अमीरात में भी अपने नाटकों का प्रदर्शन कर चुकी हैं।

विभा अपने लेख सेलिब्रेटिंग कैंसर में लिखती हैं,

कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में। लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का संग-साथ कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है। यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा)। यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं। यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है। इसे जिएं। भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है। सो, कम एंड लेट्स सेलिब्रेट कैंसर!

"क्या फर्क पड़ता है कि

सीना सपाट है या उभरा

चेहरा सुंदर है या बिगड़ा

सर पर बाल हैं या है यह टकला

जीवन इससे बढ़कर है

यौवनमय, स्फूर्त और ताज़ा,

आइये, मनाएं इसे भरपूर,

जिएं इसे भरपूर !"

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