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साहित्यकार तो सिर्फ अपनी राह का मुसाफिर

हिन्दी को कई नये शब्द देने वाले साहित्यकार दिविक रमेश को ज़रूरत नहीं किसी पहचान की, उन्हें तो सब पहचानते हैं...

27th Jun 2017
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हमारे समय के शीर्ष साहित्यकार दिविक रमेश कहते हैं- साहित्य में अंधश्रद्धा और अंध विरोध दोनो खतरनाक हो सकते हैं। किसी भी विचार, सोच, पड़ाव, प्रतिष्ठान, या स्वयं के प्रति भी, साहित्यकार की न तो अंधश्रद्धा होनी चाहिए, और न ही अंधविरोध। विचारक और कवि के बीच का रिश्ता नेता और अनुयायी का नहीं है। साहित्यकार अपना रास्ता खुद तय करे। कवि यदि उस विचारधारा के मूल स्रोत के साथ पहचान नहीं कर पाता- वह यदि अपनी संवेदना की राह उस विचारधारा के समानांतर नहीं बना पाता, तो वह कवि और कविता की ही भूमिका नहीं निभाता। इस अर्थ में वह अपनी रचनात्मक भूमिका में बुद्ध, ईसा, पैगम्बर, मार्क्स, गांधी अथवा किसी भी नेता से कम नहीं होता। वह बेलाग ढंग से मौलिक होता है।

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आधुनिक हिंदी कविता में दिविक रमेश का एक जाना-माना नाम हैं, जिन्हें किसी पहचान की ज़रूरत नहीं। उन्होंने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली-पहली बार प्रयोग हुए हैं। ऐसे में उन्हें हिन्दी के नये-नये शब्दों का जन्मदाता कहना अतिश्योक्ति न होगी।

एक विशेष बातचीत में दिविक रमेश कहते हैं कि सबसे पहले तो हमें समझना होगा, भारतीय समाज अन्तत: मनुष्यों का ऐसा समाज है, जिसकी बुनियाद में सांस्कृतिक विरासतों की सहज उत्सुकताओं से परिपूर्ण निर्माण-प्रवृत्तियों का इतिहास मौजूद है। सरल शब्दों में इसे बहुलतावादी संस्कृतियों का समाज कहा जाता है, कुछ विद्वान जिसे आक्रमणों और अतिक्रमणों की निगाह से भी देखते हुए मनुष्यों को बांटते रहने के प्रयासों में जान खपाए रहते हैं। यदि हम किसी भी संस्कृति की गहराई में जाएं तो वह अपने मूल्यों और अवदानों के आधार पर समाज में मनुष्य को मनुष्य से अलग करती नजर नहीं आती, कम से कम आत्मिक आशयों में। इतिहास बताता है कि जब संस्कृतियों में मठाधीशी प्रवेश करती है और वह अपने कट्टरपन के चरम की ओर अग्रसित होती है, तो मनुष्यों को, अर्थात समाज को बांटने की परोक्ष (छल-कपट ) अथवा प्रत्यक्ष ( दादागिरी) सफल-असफल क्रियाएं किया करती है। इस कार्य में (उनके शब्दों में, अनुष्ठान में) वह अपने समय के सत्ता प्रतिष्ठान तथा सत्ता प्रतिष्ठान के अभिलाषियों की ओर भी मुखातिब होती नजर आती है। बहुत बार आंशिक रूप से या काफी हद तक सफल भी हो जाती है। ऐसे में भ्रम की स्थितियां भी जोर मारने लगती हैं। विचार अथवा दर्शन की आड़ में छद्मपूर्ण स्वार्थी लाभकारी उपलब्धियों की लूट मच जाती है।

संस्कृति के उपादान अर्थात कला, साहित्य, संगीत आदि भी राह भटकते अर्थात सत्ता प्रतिष्ठान के अनुचर बने नजर आने लगते हैं। संकेत कर दूं कि अनुचर केवल विरुदावलियां गाकर ही फायदा नहीं उठाया करते हैं, आवश्यकता पड़ने पर तथाकथित असहमतियों के बाने में आंख़ दिखा कर भी फायदा उठाया करते हैं। असल में वे पर उपदेश कुशल बहुतेरे की राह के वाहक हुआ करते हैं। और यह राह लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा सिरजती है। नि:संदेह लोकतंत्र में असहमति और प्रतिरोध की अग्रणी भूमिका होती है लेकिन यह भूमिका तब तक ही सार्थक हुआ करती है जब तक असहमति संवाद के खुले दरवाजे के साथ होती है और प्रतिरोध प्रतिशोध से संबंधविहीन होता है। समकालीन साहित्य अर्थात हमारे समय के साहित्य का ही नहीं बल्कि हर समय के समकालीन साहित्य के सामने सबसे बड़ा सवाल मनुष्यता को बचाए और बांधे रहने का रहा है। उसे उसके इर्द-गिर्द रची जा रही उसकी विभाजक रेखाओं से रचनात्मक स्तर पर बचाए रखने का रहा है। उसे बेहतर बनाने का रहा है। सत्ता प्रतिष्ठान के द्वारा ‘सम्मान’और ‘उपेक्षा’ के जाल में खुद को न फंसने देने का सवाल भी रहा है। सत्ता प्रतिष्ठान का एक सच यह भी है कि वह, भीतर ही भीतर, संस्कृति कर्मियों को बांटने के उपक्रम में भी तल्लीन रहा करता है, स्वयं उनके स्तर पर भी सत्ता प्रतिष्ठान खड़े कर दिया करती है। अपनों के ही द्वारा अपनों के बीच महान और हीन का संसार रच सकती है।

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सवाल स्पष्ट हो तो जवाब भी स्पष्ट होता है। जवाब इतना ही है कि साहित्यकार की किसी भी विचार, सोच, पड़ाव, प्रतिष्ठान या स्वयं के प्रति भी न तो अंधश्रद्धा होनी चाहिए और न ही अंधविरोध। बहुत पहले 29 फरवरी, 1976 के धर्मयुग में मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था ‘कविता की सही भूमिका’ (जो बाद में मेरी पुस्तक ‘कविता के बीच से’ में संकलित हुआ) जिसकी मुझे याद आ रही है। मैंने लिखा था कि विचारक और कवि के बीच का रिश्ता नेता और अनुयायी का नहीं है। कवि यदि उस विचारधारा के मूल स्रोत के साथ पहचान नहीं कर पाता- वह यदि अपनी संवेदना की राह उस विचारधारा के समानांतर नहीं आ पाता, तो वह कवि और कविता की ही भूमिका नहीं निभाता। इस अर्थ में वह अपनी रचनात्मक भूमिका में बुद्ध, ईसा, पैगम्बर, मार्क्स, गांधी अथवा किसी भी नेता से कम नहीं होता। वह बेलाग ढंग से मौलिक होता है। इस कथन का यह आशय कतई न लिया जाए कि निजी या तथाकथित स्वतंत्रता के नाम पर अनाप-शनाप लिखने वालों को छूट दी जा रही है।

अपेक्षा यह है, कि साहित्यकार अपना रास्ता खुद तय करे ताकि उसके लेखन में आरोपण के स्थान पर सहजता आ सके। अभिव्यक्तिगत स्पष्टता आ सके। रचनाकार नि:संदेह सामाजिक प्राणी ही होता है। संवेदना व्यक्ति-विशेष विचार- विशेष की पहचान न होकर व्यक्ति-आत्म की पहचान होती है, उसकी सही तलाश होती है। यही कारण है कि कि बहुधा ‘मिथक’ और इतिहास को भी एक रचनाकार अपनी तरह का स्वर और समझ देने की क्षमता रखता है। बुनियादी तौर पर रचनाकार मनुष्य और मनुष्यता के अस्तित्व का पक्षधर होता है।

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इन दिनो दिविक रमेश की एक कविता- 'बेटी ब्याही गई है', इन दिनों सोशल मीडिया की सुर्खियों में हैं-

बेटी ब्याही गई है, गंगा नहा लिए हैं माता-पिता

पिता आश्वस्त हैं स्वर्ग के लिए,

कमाया हॆ कन्यादान का पुण्य।

और बेटी ?

पिता निहार रहे हैं, ललकते से निहार रहे हैं वह कमरा

जो बेटी का है, कि था

निहार रहे हैं वह बिस्तर जो बेटी का है, कि था

निहार रहे हैं वह कुर्सी, वह मेज़, वह अलमारी

जो बंद है, पर रखी हैं जिनमें किताबें बेटी की

और वह अलमारी भी जो बंद है

पर रखे हैं कितने ही पुराने कपड़े बेटी के।

पिता निहार रहे हैं, ऒर माँ निहार रही है पिता को,

जानती है पर टाल रही है, नहीं चाहती पूछना

कि क्यों निहार रहे हैं पिता।

कड़ा करना ही होगा जी, कहना ही होगा

कि अब धीरे धीरे ले जानी चाहिए चीज़ें घर अपने बेटी को

कर देना चाहिए कमरा खाली, कि काम आ सके,

पर जानती है माँ कि कहना चाहिए उसे भी धीरे-धीरे पिता को।

टाल रहे हैं पिता भी, जानते हुए भी

कि कमरा तो करना ही होगा खाली बेटी को, पर टाल रहे हैं

टाल रहे हैं कुछ ऎसे प्रश्न, जो हों भले ही बिन आवाज़

पर उठते होंगे मन में ब्याही बेटियों के।

सोचते हैं, कितनी भली होती हैं बेटियाँ

कि आँखों तक आए प्रश्नों को खुद ही धो लेती हैं

और वे भी असल में टाल रही होती हैं।

टाल रही होती हैं इसलिए तो भली भी होती हैं।

सच में तो टाल रहा होता है घर भर ही।

कितने डरे होते हैं सब ऐसे प्रश्नों से भी

जिनके यूँ तय होते हैं उत्तर, जिन पर प्रश्न भी नहीं करता कोई।

माँ जानती है और पिता भी कि ब्याह के बाद

बेटी अब मेहमान होती है, अपने ही उस घर में

जिसमें पिता,माँ और भाई रहते हैं।

माँ जानती है कि उसी की तरह बेटी भी शुरू-शरू में

पालतू गाय-सी जाना चाहेगी अब तक रह चुके अपने कमरे ।

जानना चाहेगी कहाँ गया उसका बिस्तर,

कहाँ गई उसकी जगह।

घर करते हुए हीले-हवाले समझा देगा धीरे-धीरे

कि अब तुम भी मेहमान हो बेटी

कि बैठो बैठक में, और फिर ज़रूरत हो तो आराम करो

किसी के भी कमरे में।

माँ जानती है, जानते पिता भी हैं कि भली है बेटी

जो नहीं करेगी उजागर और टाल देगी तमाम प्रश्नों को।

पर क्यों, सोचते हैं पिता !


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